योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 732, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपशम प्रकरण । ७४१
मानते हैं। महात्मा पुरुषों को कालकलनारूप जगत् सब आत्मरूप है। कल्प से आदि लेकर अन्तपर्यन्त सब आत्मा का चमत्कार है, ऐसे जानकर तुम अपने स्वरूप में स्थित हो और संसारसमुद्र से तर जाओ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे मोक्षस्वरूपोपदेशो नाम सप्तषष्टितमसर्गः ॥ ६७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह जो मैंने तुमको द्वैत के त्याग की विचारदृष्टि कही है इस विचार से अपना जो आत्मस्वभाव है सो प्राप्त होता है, जैसे बुद्धिमान् को खोजने के अभ्यास से चिन्तामणि प्राप्त होती है। इसके उपरान्त एक और भी परम दृष्टि सुनो जिससे मनुष्य अचल आत्मस्वरूप को देखता है वह यह है कि मैं ही आकाश, दिशा, सूर्य, अधः, ऊर्ध्व, देवता, दैत्य, प्रकाश, तम, मेघ, पर्वत, पृथ्वी, समुद्र, पवन, धूलि, अग्नि आदिक स्थावर जङ्गम जगत् हूँ। हे रामजी ! सर्वजगत् आत्मा ही है तो अहं और त्वं से भिन्न और अनेक और एक कैसे हो। जिसके हृदय में ऐसा निश्चय होता है उसको सब जगत् आत्मरूप भासता है और वह पुरुष हर्षशोक नहीं पाता। सब जगत् मनोमात्र है तो अपना और पराया क्या कहिये ? ज्ञानवान् को आत्मा से भिन्न कुछ नहीं भासता इससे वह हर्ष विषाद को नहीं प्राप्त होता। हे रामजी ! अहंकार भी तीन प्रकार के हैं। दो प्रकार का तो सात्त्विक निर्मल है, तत्त्वज्ञान से प्रवर्त्तता और मोक्षदायक परमार्थरूप है, और तीसरा संसार दिखाता है। एक तो अहं जो तुमको कहा है कि सर्व मैं ही हूँ-मुझसे अन्य कुछ नहीं और दूसरा यह है कि परम अणु जो सूक्ष्म से भी अतिसूक्ष्म है सो साक्षीभूत अव्यक्तरूप मैं हूँ-ये दोनों मोक्षदायक हैं और तीसरा यह कि आपको नख-शीशपर्यन्त देहरूप जानना सो दुःखदायक और संसार का कारण है शान्तिसुख का कारण नहीं। अथवा इन तीनों को त्यागकर स्थित हो यह सर्वसिद्धान्त का कारण है। जैसी तुम्हारी इच्छा हो तैसे करो पर आत्मा सबसे अतीत और सबसे परे है तो भी अपनी सत्ता से जगत् को पूर्ण कर रहा है और सबका प्रकाशक वही है। वह अपने अनुभव से सदावस्तु उदयरूप है और