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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 733, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 733

७४२ योगवाशिष्ठ ।

किसी प्रणाम का विषय नहीं, अनुमान आदि प्रमाणों से रहित है और सर्वकाल सबको अपने प्रकाश से प्रकाशता है। यह जो दृश्यजगत् है वह सब आत्मा भगवान् है और दृश्य, दर्शन, सत्, असत्, सूक्ष्म, स्थूल सबसे आत्मा रहित है। वही सर्वरूप, सबकी वाणी कहने में भी वही आता है और किसी से कहा भी नहीं जाता। जो नानात्व भासता है वह भी उससे अन्य नहीं। आत्मा आदिक संज्ञा भी शास्त्रों ने उपदेश के निमित्त कल्पी हैं। वह सर्वत्र, तीनों कालों में स्थित और प्रकाशरूप है। सूक्ष्मभाव और स्थूलभाव से वही है और सब ठौर व्यापक अपने फुरने से जीवरूप हो भासता है। जब चित्तसंवित् स्फूर्तिरुप होती है तब जीवरूप हो भासता है और फुरने से रहित द्वैतकल्पना मिट जाती है—जैसे आकाश में पवन फुरता है तब उष्ण शीत हो भासता है तैसे ही फुरने से जीवादिक भासते हैं। आत्मा चेतन सर्वत्र व्यापकरूप है और कभी किसी भाव को प्राप्त नहीं होता। जैसे पदार्थ अपने भाव में स्थित है तैसे ही परमेश्वर आत्मा अपने स्वभाव में स्थित है परन्तु उसका भासना पुर्यष्टका में होता है। जैसे वायु बिना धूलि नहीं उड़ती और अन्धकार में प्रकाश बिना पदार्थ नहीं भासता तैसे ही पुर्यष्टका बिना आत्मा नहीं भासता पुर्यष्टका में प्रतिबिम्बित भासता है। जैसे सूर्य के उदय हुए सर्वजीवों का व्यवहार होता है सूर्य के अस्त हुए से लीन हो जाता है पर सूर्य दोनों से अलेप है, तैसे ही आत्मा सबका प्रकाशक और निर्लेप है। शरीरों के व्यवहार होने और इष्टता में वह ज्यों का त्यों है, न उपजता है न विनाशता है, न वाञ्छा करता है, न त्यागता है, न मुक्त है, न बन्ध है, सर्वदा सर्वप्रकार ज्यों का त्यों एकरूप है। उस के अज्ञान से जीव अनात्माभाव को प्राप्त होता है—जैसे रस्सी में सर्प भासता है—और केवल दुःखों का कारण होता है। आत्मा आदि अन्त से रहित और अज-अविनाशी है और अपने आपसे भिन्न नहीं हुआ इससे देश, काल, वस्तु के परिच्छेद से रहित है बन्ध नहीं और जो बन्ध नहीं तो मुक्त कैसे हो ? सर्वकल्पना से रहित आत्मा सबको अपना आप है पर अविचार से मूढ़ रुदन करते हैं, इससे मैंने जो तुमको उपदेश किया है