योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम प्रकरण । ७५३
उसको आदि से लेकर अन्तपर्यन्त भली प्रकार विचार देखो और इस युक्ति से शोक का त्याग करो-मूर्खों के समान लोगों में शोक मत करो । हे सुमते ! बन्धमोक्ष की कल्पना का त्याग करो । न बन्ध के त्याग की इच्छा करो और न मोक्ष के प्राप्ति की इच्छा करो, यन्त्री का पुतलावत् अभिमान से रहित चेष्टा करो-इसका नाम आत्ममौन है । हे रामजी ! मोक्ष आकाश में नहीं और न पाताल में है, न भूमिलोक में है-चित्त का निर्मल होना ही मोक्ष है । अनात्मा के साथ आपको मिलाना और उसमें आत्माभिमान करना यह मल है और इसका त्याग करना और शुद्ध आत्मा में चित्त का लगाना इसका नाम मोक्ष है । जब चित्त से गुणों में वृत्ति का त्याग हो और सम्यक् आत्मज्ञान हो उसी को तत्त्वदर्शी मोक्ष कहते हैं । हे रामजी ! जब तक आत्मबोध नहीं होता तब तक यह दीन दुःखी होता है और जब आत्मा का निर्मल बोध होता है तब दुःखों से मुक्त होता है इससे और उपायों को त्याग भक्ति करके मोक्ष की वाञ्छा करो और चिरकाल से जब इस बोध को साध चित्त विस्तृत पद को प्राप्त हुआ तब दश मोक्ष की भी इच्छा नहीं रहती एक मोक्ष तो क्या है । हे रामजी ! जीव को और कोई उपाय मोक्ष का नहीं, आत्मबोध को ही पाकर सुखी होगे । जब चित्त अचित्त होता है तब सब जगत्भ्रम मिट जाता है और जगत् भी कुछ दूसरी वस्तु नहीं, अद्वैत आत्मतत्त्व ही है और जो वही है तो बन्ध किसको कहिये और मोक्ष किसको कहिये ? बन्ध मोक्ष की कल्पना तुच्छ है उसका त्याग कर चक्रवर्ती हो पृथ्वी की पालना करो तो तुमको कर्तृत्व का स्पर्श कुछ न होगा ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे आत्मविचारो नामाष्टषष्टितमसर्गः ॥ ६८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! संकल्प से ही जगत् उपजा है । अज्ञान से आपको शरीर जानता है और अपने संकल्प को उपजा के अपना स्वरूप जानता है । जैसे कोई सुन्दर पुरुष हो और उसको देखे बिना कुरूप जाने तैसे ही आत्मा के साक्षात्कार बिना देहरूप आत्मा को जानता है कि मैं देह हूँ । ज्यों-ज्यों आत्मा का प्रमाद होता है त्यों-त्यों देह में