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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 735, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 735

७४४ योगवाशिष्ठ ।

अधिक अभिमान होता है-जैसे ज्यों ज्यों मद्यपान करता है त्यों-त्यों उन्मत्त होता है । हे रामजी ! यह नाना प्रकार का दृश्य अज्ञान से भासता है । जैसे सूर्य की किरणों से मरुस्थल में जल भासता है तैसे ही असम्यक् ज्ञान से आत्मा में जगत् भासता है । एक कल्पना के फुरने से मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, इन्द्रियाँ और देह भासती हैं, एक फुरने की ही इतनी संज्ञा है । जैसे एक जल की अनेक संज्ञा होती हैं तैसे ही एक फुरने की अनेक संज्ञा हुई हैं । जो चित्त है सो अहंकार है, जो अहंकार है वही मन है और जो मन है वही बुद्धि है । इसमें कुछ भेद नहीं । जैसे वरफ और शुक्लता और शीतलता में कुछ भेद नहीं तैसे ही मन, बुद्धि आदिक में कुछ भेद नहीं, एक के नाश हुए दोनों का नाश हो जाता है । इससे मन में जो कुछ कल्पना है उसका त्याग कर मोक्ष की इच्छा का भी त्याग करो और बन्धनवृत्ति का भी त्याग करो। हे रामजी! वैराग्य और विवेक का अभ्यास करके मन को निर्मल करो । जब मन निर्मल होगा तब मन का मनभाव नष्ट हो जावेगा । जब यह फुरना फुरता है कि 'मैं मुक्त होऊँ' तब भी मन जग आता है और मन के जागे से मनन भी हो आता है । जब मनन हुआ तब अपने साथ शरीर भी भासि आता है अनेक दुःख भी भासि आते हैं । हे रामजी ! आत्मतत्त्व सबसे अतीत है और सर्वरूप भी वही है तब कौन बन्ध है और कौन मोक्ष है ? जब मन का मनन निवृत्त हुआ तब न कोई बन्ध है और न कोई मुक्त है-आत्मा सर्वक्रिया से अतीत है । क्रिया भी इस प्रकार होती है जैसे कि वायु के हिलने से वृक्ष के पत्र और फूल हिलते हैं तैसे ही प्राणों के फुरने से हाथ पाँव आदिक इन्द्रियाँ चेष्टा करती हैं । हे रामजी ! चैतन्यशक्ति सर्वव्यापी, सूक्ष्म और अचल है, वह न आपही चलती है, न और किसी की प्रेरी हुई चलती है, सदा स्थितरूप है । जैसे मेरु पर्वत न आपही चलता है और न वायु से चलाया चलता है । हे रामजी ! जितने पदार्थ भासते हैं सो आत्मरूपी दर्पण में प्रतिबिम्बित भासते हैं । जैसे सर्वपदार्थों को दीपक प्रकाशता है तैसे ही सब पदार्थों को आत्मा प्रकाश करता है। सब पदार्थों में एक आत्मा अनुस्यूत प्रकाशता है और अहं त्वं आदिक कल्पना से रहित है जहाँ अहं त्वं आदिक