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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 736, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 736

उपशम प्रकरण। ७४५

कलना नहीं फुरती वहाँ सुख दुःख भी नहीं फुरता। जैसे वृक्षों और पहाड़ों से अहं त्वं शब्द नहीं फुरता तैसे ही आत्मा में भी नहीं फुरते इससे ज्ञानवान् में कर्तृत्व भोक्तृत्व नहीं फुरते। हे रामजी! आत्मा निरहं-कार और निराकार उसमें कर्तृत्व भोक्तृत्व कैसे होवे? आत्मा में कर्तृत्व भोक्तृत्व अज्ञान से भासता है—जैसे मरुस्थल में जल भासता है। हे रामजी! अज्ञानरूप मदिरा-पान करके मनरूप मृग मत्त हुआ है उससे वह सत् असत् का विचार नहीं कर सकता—जैसे मृगतृष्णा की नदी असत् ही सत् भासती है और मृग उसको सत् जानकर पान करने के निमित्त दौड़ता है, तैसे ही यह जीव अरूप संसार को रूप जानकर दौड़ता है। जब आत्म-सत्ता का सम्यक्बोध होता है तब यह अविद्या नष्ट हो जाती है। जैसे ब्राह्मणों के मध्य चाण्डाली आन बैठे और जब ब्राह्मण उसको पहिचाने कि यह चाण्डाली है तो वह छिप जाती है तैसे ही जब अविद्या को जाना तब वह नष्ट हो जाती है। हे रामजी! जब अविद्या को ज्यों की त्यों जाना तब अविद्यारूपी जगत् मन को नहीं खेंच सकता जैसे मृगतृष्णा की नदी को जब जाना तब तृषा हो तो भी मन को वह जल नहीं खेंच सकता। हे रामजी! जब परमार्थसत्ता का बोध होता है तब मूल से वासना नष्ट हो जाती है, जैसे सूर्य के उदय से अन्धकार नष्ट हो जाता है तैसे ही आत्मज्ञान से अविद्या वासनासहित नष्ट हो जाती है। हे रामजी! अविद्या अविचार से सिद्ध है जब सत्शास्त्रों की युक्ति से विचार प्राप्त होता है तब अविद्या नष्ट हो जाती है। जैसे वरफ का कणका धूप से गलकर जलमय हो जाता है तैसे ही विचार से अज्ञान नष्ट हो जाता है। हे रामजी! देह जड़ है और आत्मा सदा चेतनरूप है, फिर जड़ देह के निमित्त भोगों की वाञ्छा करनी बड़ी मूर्खता है। जो ज्ञानवान् पुरुष हैं वे इस बन्धन को तोड़ डालते हैं। हे रामजी! आशारूपी फाँसी को हृदय से काटो जब आशारूपी आवरण दूर होगा तब पूर्णमासी के चन्द्रमावत् हृदय शीतल हो जावेगा। तैसे ही यह पुरुष भी तीन तापों से मुक्त शीतल हो जाता है—जैसे पर्वत में अग्नि लगे और उसके ऊपर जल की बहुत वर्षा हो वह तप्तता से मुक्त हो शान्तिमान् होता है।