योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 737, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें७४६ | योगवासिष्ठ ।
हे रामजी ! जैसे केशरी सिंह पिंजड़े को तोड़कर निकलता है तैसे ही ज्ञानवान् पुरुष भोगवासना के बन्धन को तोड़ डालता है । हे रामजी ! जैसे रङ्क को त्रिलोकी का राज्य मिलने से वह आनन्द को प्राप्त हो तैसे ही ज्ञानवान् को आत्मा के साक्षात्कार हुए आनन्द प्राप्त होता है और वह परम निर्मल लक्ष्मी से शोभता है जब हृदय से आशारूपी मैल जाता है तब जैसे शरत्काल का आकाश निर्मल शोभता है तैसे ही वह शोभता है । हे रामजी ! ज्ञानवान् पुरुष अपने आपमें नहीं समाता-जैसे महाकल्प का समुद्र नहीं समाता और जैसे मेघ जल को त्यागकर मौन हो जाता है तैसे ही ज्ञानवान् आशा को त्यागकर आत्ममौन हो जाता है । जैसे अग्नि लकड़ी को जलाकर धुएँ से रहित अपने आपमें स्थित हो जाती है तैसे ही चित्त की वृत्ति से रहित हुआ आत्मपद में निर्वाण हो जाता है जैसे दीपक निर्वाण हो जाता है तैसे ही निर्वाण हुआ परमानन्द को प्राप्त होता है । जैसे अमृत को पानकर पुरुष आनन्दवान् होता है तैसे ही वह परमानन्द से पूर्ण अपने आपमें प्रकाशता है जैसे वायु से रहित दीपक प्रकाशता है और शुद्ध मणि अपने प्रकाश से प्रकाशती है तैसे ही ज्ञानवान् अपने आप-से प्रकाशता है । मैं सर्वात्मा, सर्वगत, ईश्वर, सर्वाकार, निराकार, केवल चिदानन्द आत्मा हूँ और सदा अपने आपमें स्थित हूँ । हे रामजी ! ज्ञानी अपने आपको ऐसे जानते हैं और पूर्व के व्यतीत हुए दिन को हँसते हैं । मैं तो अनन्त आत्मा हूँ माया के भ्रम से आपको कर्त्ता भोक्ता मानता था । ऐसे जानकर जो रागद्वेष से रहित परम शान्ति को होता है उसके सब ताप निवृत्त हो जाते हैं, उसकी सदा आत्मा में प्रीति रहती है, उसका चित्त सब ओर से पूर्ण हो जाता है, वह सबको पवित्र करनेवाला होता है, वह कामरूपी चक्र से मुक्त होकर जन्मों के बन्धन काट डालता है, राग द्वेष आदिक द्वन्द्व और सर्वभय से मुक्त होता है, अविद्यारूपी संसारसमुद्र से तर जाता है, उत्तम लक्ष्मी को प्राप्त होता है अर्थात् परमपद पाता है और फिर संसार के जन्म-मरण को नहीं प्राप्त होता और उसके कर्मों का अन्त हो जाता है । हे रामजी ! ज्ञानवान् की क्रिया को देखकर और सब वाञ्छा करते हैं परन्तु औरों की क्रिया को देखकर ज्ञानवान् किसी की