योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम प्रकरण । ७४७
वाञ्छा नहीं करता। वह सबको आनन्दवान् करता है और आप किसी से आनन्दवान् नहीं होता। वह न किसी को देता है, न लेता है, न किसी की स्तुति करता, न निन्दा करता है, न किसी उत्तम पदार्थ को पाकर उदय होता है और न अनिष्ट को पाकर नष्ट होता है और हर्ष-शोक से रहित है। उसने सब फल का त्याग किया है और उपाधि से रहित है और कर्तृत्व भोक्तृत्व से आपको न्यारा मानता है। ऐसा जो पुरुष है वह जीवन्मुक्त है। हे रामजी ! जब तुम सब इच्छा त्यागकर मौन हो तब निर्विशेषभाव को प्राप्त होगे। जैसे मेघ जल का त्यागकर मौनभाव को प्राप्त होता है तैसे ही तू मौनभाव को प्राप्त होगा। हे रामजी ! जैसे कामी पुरुष स्त्री को कण्ठ में लगाकर आनन्दवान् होता है पर उसको ऐसा आनन्द नहीं होता जैसा आनन्द निर्वासनिक पुरुष को होता है, फूल के गुच्छे से वसन्तऋतु ऐसी नहीं शोभती जैसे उदारबुद्धि आत्म मौनवान् शोभता है, हिमालय पर्वत में प्राप्त हुआ भी ऐसा शीतल नहीं होता जैसा निर्वासनिक पुरुष का मन शीतल होता है, मोतियों की माला से और केले के बन को प्राप्त हुआ भी ऐसा सुख नहीं पाता और चन्दनों के पान करनेवाला भी ऐसा शीतल नहीं होता जैसा शीतल निर्वासनिक मन होता है और चन्द्रमा के स्पर्श से भी ऐसा शीतल नहीं होता जैसे निर्वासनिक पुरुष शीतल होता है। चन्द्रमा बाहर की तप्तता मिटाता है परन्तु भीतर की तप्तता निवृत्त नहीं करता पर निराशता से हृदय की तप्तता मिट जाती है और परम शान्ति को प्राप्त होता है। जैसी शीतलता निर्वासनिक पुरुष के संग से होती है तैसी और किसी उपाय से नहीं प्राप्त होती। हे रामजी ! ऐसा सुख स्वर्ग में नहीं प्राप्त होता और न सुन्दर स्त्रियों के स्पर्श मे होता है जैसा सुख निर्वासनिक को प्राप्त होता है। निर्वासनिक पुरुष उस सुख को प्राप्त होता है जिस सुख में त्रिलोकी के सुख तृणवत् भासते हैं। हे रामजी ! आशारूपी कुञ्ज के वृक्ष के काटने को उपशमरूपी कुल्हाड़ा है जो पुरुष निर्वासनिक हुआ है उसको सब पृथ्वी गोपद के समान तुच्छ भासती है, मेरु पर्वत एक टूटे वृक्ष के समान भासता है और दिशा डिब्बी के समान भासती है, क्योंकि वह उत्तम पद को प्राप्त हुआ है और