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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 739, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 739

७४८ | योगवाशिष्ठ


त्रिलोकी की विभूति तृण की नांई तुच्छ देखता है । जो पुरुष निर्वा- सनिक हुआ है वह जगत् को देखकर हँसता और कदाचित् उसे जगत् के पदार्थों की कल्पना नहीं फुरती । तृणवत् जानकर उसने जगत् को त्याग दिया है और सदा आत्मतत्त्व में स्थित है उसको किसकी उपमा दीजिये उस पुरुष के उदय, अस्त, अहं, त्वं आदिक कलना नष्ट हो गई है और केवल आत्मस्वभाव को भास हुआ है । उस ईश्वर आत्मा को कौन तौल सकता है, जब दूसरा उसके समान हो तब तोले। हे रामजी ! वह पुरुष सब सङ्कटों के अन्त को प्राप्त हुआ है । यह जगत् मिथ्या भ्रम- रूप है । जैसे आकाश में भ्रम से दूसरा चन्द्रमा, मरुस्थल में नदी और मद्यपान से नगर भ्रमता भासता है, तैसे ही यह मिथ्या जगत् भ्रम से भासता है इसकी आशा मत करो । तुम तो बुद्धिमान् पंडित हो मूर्खों की नांई मोह को क्यों प्राप्त होते हो ? यह मैं और यह मेरा अज्ञान से भासता है, इस कलना को चित्त से दूर करो । यह वास्तव में कुछ नहीं, सब जगत् आत्मरूप है और नानात्व कुछ नहीं है जो सम्यग्दर्शी पुरुष है वह जगत् को एकरूप जानकर धैर्यवान् रहता है कदाचित् खेद नहीं पाता । हे रामजी ! जो पुरुष निर्वासनिक हुआ है आत्मविचार से आत्मपद को प्राप्त हुआ है उसको देखकर मोहनेवाली माया भी भाग जाती है और निकट नहीं आती । जैसे सिंह के निकट मृग नहीं आता तैसे ही ज्ञानवान् के निकट माया नहीं आती । सुन्दर स्त्रियाँ, मणि, कञ्चनादिक धन और पत्थर, काष्ठ सब उसको तुल्य भासता है, भोगों से उसको सुख नहीं होता और आपदा से खेद नहीं होता, वह सदा ज्यों के त्यों रहता है । जैसे पर्वत वायु से चलायमान नहीं होता तैसे ही वह पुरुष सुख दुःख से चलायमान नहीं होता । सुन्दर बाला स्त्री उसके चित्त को खींच नहीं सकती, कामदेव के चलाये बाण उसके ऊपर टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं और रागद्वेष उसको खींच नहीं सकते । वह सदा आपको निराकार, अद्वैत, निष्क्रिय और निर्गुण जानता है और सुन्दर बगीचे, ताल, बेलि, शय्या, इन्द्रियों के विषयभोग और दुःख देनेवाले उसको तुल्य हैं रागद्वेष को नहीं प्राप्त करते । जैसे ऋतु के अनुसार मीठा और कटु फल होता