योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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उपशम प्रकरण ।
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सदाशिव के शृङ्गीगण अपना रक्त मांस माता को देते थे परन्तु धैर्य में
थे इससे खेद को न प्राप्त हुए और नाना प्रकार की क्रिया करते थे परन्तु
जीवन्मुक्त थे इससे सदा सुखी थे। नारद मुनि सदा मुक्तस्वभाव हैं और
सदा जगत् की क्रियाजाल में रहते हैं परन्तु क्षोभ नहीं पाते इससे जीव-
न्मुक्त हैं। मनमौन जो विश्वामित्र हैं वे वेदोक्त कर्म करते फिरते रहते हैं
इससे जीवन्मुक्त हैं। सूर्य भगवान् को दिन प्रकाश करते हैं और फिरते
रहते हैं परन्तु जीवन्मुक्त और सदासुखी रहते हैं। यह सदा जीवों को
दण्ड करते रहते हैं और क्षोभ में रहते हैं परन्तु जीवन्मुक्त हैं। इन्द्र कुबेर से
आदि लेकर त्रिलोकी में बहुत जीवन्मुक्त हैं जो व्यवहार में शीतल हैं।
कोई मूढ़ शिलावत् हो रहे हैं, कोई परम बोधवान् वन में जा स्थित हुए
हैं—जैसे भृगु, भारद्वाज और विश्वामित्र, बहुतेरे चिरकालपर्यन्त राज-
पालन करते रहते हैं—जैसे जनक, मान्धाता आदि, कोई आकाश में
बड़ी कान्ति धारकर बृहस्पति, चन्द्रमा, शुक्र, सप्तर्षि आदि का स्थित हुए
हैं, कोई स्वर्ग में अग्नि, वायु, कुबेर, यम, नारदादिक हैं, पाताल में
जीवन्मुक्त प्रह्लादादिक हुए हैं। कोई देवतारूप धारकर आकाश में स्थित
हैं कोई मनुष्यरूप धारकर मनुष्यलोक में स्थित हैं और कोई तिर्यक्यौनि
में स्थित हैं उनको सर्वथा सर्वप्रकार सर्व में सर्वात्मारूप हो भासता है, कुछ
भिन्न नहीं भासता। नाना प्रकार का व्यवहार है सो भी अद्वैत से किया
है। हे रामजी ! दिव्य विष्णु, विधाता, सर्व ईश्वर और शिव आदिक सब
आत्मा के ही नाम हैं। वस्तुरूप में जो अवस्तु है और अवस्तु में जो
वस्तु है सो अवस्तु से वस्तु तब निकलता है जब युक्ति होती है और
वस्तु से अवस्तु भी युक्ति से ही दूर होती है। जैसे अवस्तुरूप, रेत से
सुवर्ण युक्ति से निकलता है और वस्तुरूपी सोने से मैल युक्ति से दूर
होता है तैसे ही अवस्तुरूप देहादिकों में वस्तुरूप आत्मा शास्त्रों की
युक्ति से पाता है और वस्तुरूप आत्मा से दृश्यरूप अवस्तु भी शास्त्रों
की युक्ति से दूर होती है। हे रामजी ! जो पापों से भय करता है वह
जब धर्म में प्रवर्तता है तब निर्भय होता है और दुःखों के भय से जीव
आत्मपद की ओर प्रवर्तता है तब भावना के वश से असत् से सत् पाता