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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 745, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 745
७५४योगवाशिष्ठ ।

है । ध्यान और योग भी सूक्ष्म है यत्न के बल से उनसे सत् को पाता है और जो असत् है वह उदय होकर सत् भासता है । जैसे बाजीगर की बाजी और शश के सींग भासि आते हैं तैसे ही आत्मा में अद्रूप जो जगत् है सो अज्ञान से दृढ हो भासता है परन्तु कल्प के अन्त में यह भी नष्ट हो जाता है । हे रामजी ! वह जो सूर्य, चन्द्रमा, इन्द्रादिक हैं उनके नाम भिन्न-भिन्न रहेंगे और बड़े सुमेरु आदिक पर्वत, समुद्र और भाव पदार्थ जो उत्तम, मध्यम, कनिष्ठ भासते हैं वे सब नाश हो जावेंगे, क्योंकि सब मायामात्र है, कोई न रहेगा । ऐसे विचार करके इनके भाव अभाव में हर्ष शोक मत करो और समताभाव को प्राप्त हो । हे रामजी ! जो असत् है वह सत् की नाईं भासता है और जो सत् है वह असत् की नाईं भासता है इससे यथार्थ विचारकर सद्रूप आत्मपद में स्थित हो रहो और असद्रूप जगत् की आस्था त्याग के समताभाव को ग्रहण करो । इस लोक में जो अविवेक मार्ग में विचरता है वह मुक्त नहीं होता । इस प्रकार कोटि जीव संसारसमुद्र में डूबते हैं और जो विवेक में प्रवर्तते हैं वे मुक्त होते हैं । हे रामजी ! जिसका मन क्षय हुआ है उनको मुक्तरूप जानो और जिसका मन क्षय नहीं हुआ वह बन्धन में है । इससे जिसको सर्व दुःख से मुक्ति की इच्छा हो सो आत्मा का विचार करे उसी से सब दुःख नष्ट हो जावेंगे । हे रामजी ! दुःखों का मूल चित्त है और जब तक चित्त है तब तक दुःख है, जब चित्त नष्ट हो जाता है तब दुःख सब मिट जाते हैं । हे रामजी ! जब आत्मज्ञान होता है तब चित्त का अभाव हो जाता है, दुःख सब मिट जाता है और राग, इच्छा सब भय मिटकर केवल शान्तरूप होता है । जनक आदि जो जीवन्मुक्त हुए हैं सो निराग और निसन्देह होकर महाबोधवान् व्यवहार भी करते रहे परन्तु सदा शीतल चित्त रहे । इससे तुम भी विवेक से चित्त को लीन करो। हे रामजी ! मुक्त भी दो प्रकार की है-एक जीवन्मुक्ति है और दूसरी विदेहमुक्ति । जो पुरुष सब पदार्थों में असंसक्त है और जिसका मन शान्त हुआ है वह मुक्ति कहाता है और जिस पुरुष का ज्ञान से सब पदार्थों में स्नेह नष्ट हुआ है और व्यवहार करता दृष्ट आता है तो भी शीतलचित्त है वह जीवन्मुक्त