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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 746, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 746

उपशम प्रकरण | ७५५

कहाता है। जो पुरुष सर्वभाव अभाव पदार्थों को त्यागकर केवल अद्वैत तत्त्व को प्राप्त हुआ है और जिसकी शरीर आदि कोई क्रिया दृष्टि नहीं आती वह विदेहमुक्त कहाता है जिसका स्नेह पदार्थों से दूर नहीं हुआ वह मुक्ति के अर्थ भी यत्न करता है तो भी बन्ध कहाता है जो युक्तिपूर्वक यत्न करता है उसको दुस्तर भी सुगम हो जाता है और जो युक्ति से रहित यत्न करता है उसको गोपद भी समुद्र हो जाता है। हे रामजी ! जिन्होंने आत्मविचार किया है उनको विस्तृत जगत्समुद्र गोपद हो जाता है और अज्ञानी को गोपद भी दुस्तर हो जाता है उसे कोई इष्ट अनिष्ट अल्प भी प्राप्त होता है तो उसमें डूब जाता है निकल नहीं सकता । उसको गोपद भी समुद्र है। ज्ञानी को अत्यन्त विभूति और ऐश्वर्य मिले अथवा उसका अभाव हो जावे तो भी वह उसमें रागद्वेष करके नहीं डूबता । हे रामजी ! अपने प्रयत्न के बल सब होता है, जो कोई प्रधान हुआ है वह प्रयत्न-रूपी वृक्ष के फल से ही हुआ है आत्मपद की प्राप्ति भी प्रयत्नरूपी वृक्ष का फल है । इससे और उपाय त्यागकर आत्मपद की प्राप्ति का प्रयत्न करो ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे उपशमप्रकरणे युक्तायुक्तविचारो नाम सप्ततितमस्सर्गः ॥ ७० ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जो कुछ जगज्जाल है वह सब आत्मा ब्रह्म का आभासरूप है, अज्ञान से स्थिरता को प्राप्त हुआ है और विवेक से शान्त हो जाता है । ब्रह्मरूपी समुद्र में जगतरूपी आवर्त्त जो फुरते हैं उनकी संख्या कोई नहीं कर सकता । आत्मरूपी सूर्य के जगतरूपी त्रसरेणु हैं । हे रामजी ! असम्यक्दर्शन ही जगत् की स्थिति का कारण है और सम्यक्दर्शन से शान्त हो जाता है—जैसे मरुस्थल में असम्यक् दर्शन से जल भासता है और सम्यकदृष्टि से अभाव हो जाता है । हे रामजी ! संसाररूपी अपार समुद्र से युक्ति और आत्मअभ्यास बिना तरना कठिन है। मोहरूपी जल से वह पूर्ण है, मरणरूपी उसमें आवर्त्त है, पापरूपी झाग है; बड़वाग्नि इसके अङ्गों में नरक समान है तृष्णारूपी भँवर है, इन्द्रियाँ और मनरूपी तेंदुए और मच्छ हैं, क्रोधरूपी सर्प है, जीवरूपी नदियाँ हैं उसमें प्रवेश करती हैं, और जन्ममरणरूपी आवर्त्त-