योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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चक्र हैं उनसे जो तर जाता है वही पुरुष है । स्त्रियाँ जो सुन्दर लगती हैं उनके महाबलवान् नेत्र हैं जिनसे पहाड़ों को भी खींच सकती हैं और मोतियों की नाईं दाँत इत्यादिक जो सुन्दर अङ्ग हैं वे महादुःख के देने वाले बड़वाग्नि की नाईं हैं । जो इनसे तर जाता है वही पुरुष है । हे रामजी ! जो जहाज और मल्लाहों के होते भी इनको नहीं तरते उनको धिक्कार है । जहाज और मल्लाह कौन हैं सो सुनो । जिस मनुष्य के शरीर में विचारसहित बुद्धि है वही जहाज है और सन्तरूपी मल्लाह है । इनको पाकर जो संसारसमुद्र से नहीं तरते उनको धिक्कार है । ऐसे संसारसमुद्र को जो तर गया है उसी को पुरुष कहते हैं । हे रामजी ! जिस पुरुष ने आत्मविचार में बुद्धि लगाई है वह तर जाता है अन्यथा कोई नहीं तर सकता । जिसको आत्मअभ्यास दृढ़ हुआ है वह तर सकता है । हे रामजी ! प्रथम ज्ञानवान् पुरुषों के साथ विचार और बुद्धि से संसार-समुद्र को देखो । जब तुम इसको ज्यों का त्यों जानोगे तब विलास और क्रीड़ा करने योग्य होगे । हे रामजी ! तुम तो भगवान् हो प्रबोध संसारसमुद्र से तर जाओ । तुम तो समर्थ हो तुम्हारे पीछे और तुम्हारे स्वभाव को विचार के और भी संसारसमुद्र से तर जावेंगे । जो इस शुभ मार्ग को त्यागकर विषयमार्ग की ओर जाते हैं, वे संसारसमुद्र में डूबे हैं । हे रामजी ! ये जो विषयभोग हैं वे विषरूप हैं, जो इनको सेवेगा वह नष्ट होगा परन्तु जिसको ज्ञान प्राप्त हुआ है उसको यह जैसे गारुड़ मन्त्र पढ़नेवाले को सर्प दुःख नहीं दे सकता तैसे ही दुःख दे नहीं सकते । जिसका हृदय शुद्ध हुआ है वह विभूतिमान है बल, वीर्य और तेज यह तीनों तत्त्व के साक्षात्कार से बढ़ते हैं जैसे वसन्त ऋतु के आये से रस, फूल, फल सब प्रकट हो आते हैं । हे रामजी ! जिसे ज्ञानलक्ष्मी प्राप्त भई है वह पूर्ण अमृततुल्य, शीतल, शुद्ध और सम प्रकाशरूप है । इस लक्ष्मी को पाकर विदितवेद में स्थित हो रहते हैं ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे संसारसागरयोगोपदेशो नामैकसप्ततितमसर्गः ॥ ७१ ॥