योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम प्रकरण । ७५७
रामजी ने पूछा, हे मुनीश्वर ! तत्त्ववेत्ता के लक्षण संक्षेप मे फिर कहिये और जिनको तत्त्व का चमत्कार हुआ है उनकी वृत्ति उदारवाणी से कहिये। ऐसा कौन है जो आपके वचन सुनके तृप्त न हो ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जीवन्मुक्त के लक्षण मैंने तुमको बहुत प्रकार से आगे कहे हैं पर अब फिर भी सुनो। हे महाबाहो। संसार को ज्ञानवान् सुषुप्ति की नाईं जानता है और सब एषणा उसकी नष्ट हो जाती है। वह सब जगत् को आत्मरूप देखता है और कैवल्यभाव को प्राप्त होता है। संसार उसे सुषुप्तिरूप हो जाता है और आत्मानन्द से घूर्म्म रहता है वह देता है परन्तु अपने जाने में किसी को नहीं देता । और लोकदृष्टि से प्रत्यक्ष हाथोंहाथ ग्रहण करता है परन्तु अपनीदृष्टि से कुछ नहीं लेता ऐसा जो आत्मदर्शी ज्ञानवान् उदार आत्मा है वह यन्त्र की पुतलीवत् चेष्टा करता है। जैसे यन्त्र की पुतली अभिमान से रहित चेष्टा करती है तैसे ज्ञानवान् अभिमान से रहित चेष्टा करता है। देखता, हँसता, लेता, देता है परन्तु हृदय से सदा शीतलबुद्धि रहता है। वह भविष्यत् का कुछ विचार नहीं करता भूत का चिन्तन नहीं करता और वर्त्तमान में स्थिति नहीं करता । सब कामों में वह अकर्त्ता है, संसार की ओर से सो रहा है और आत्मा की ओर जाग्रत् है। उसने हृदय से सबका त्याग किया है, बाहर सब कार्यों को करता है और हृदय में किसी पदार्थ की इच्छा नहीं करता । बाहर जैसे प्राकृत आचार प्राप्त होता है उसे अभिमान से रहित करता है द्वेष किसी में नहीं करता और सुख दुःख में पवन की नाईं होता है। एवम् भ्रम को त्यागकर उदासीन की नाईं सब कार्य करता है न किसी की वाञ्छा है और न किसी में खेदवान् है। बाहर से सब कुछ करता दृष्टि आता है पर हृदय से सदा असंग है। हे रामजी ! वह भोक्ता में भोक्ता है, अभोक्ता में अभोक्ता है, मूर्खों में मूर्खवत् स्थित है, बालकों में बालकवत्, वृद्धों में वृद्धवत्, धैर्यवानों में धैर्यवान्, सुख में सुखी, दुःख में धैर्यवान् है। वह सदा पुण्यकर्त्ता, बुद्धिमान्, प्रसन्न, मधुरवाणी संयुक्त और हृदय से तृप्त है उसकी दीनता निवृत्त हुई है, वह सर्वथा कोमलभाव चन्द्रमा की नाईं शीतल और पूर्ण है। शुभ कर्म करने में उसे कुछ अर्थ नहीं और अशुभ में कुछ