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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 749, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 749

७५८ योगवाशिष्ठ ।

पाप नहीं, ग्रहण में ग्रहण नहीं और त्याग में त्याग नहीं, वह न बन्ध है, न मुक्त है और न उसे आकाश में कार्य है न पाताल में कार्य है, वह यथावस्तु और यथादृष्टि आत्मा को देखता है उसको द्वैतभाव कुछ नहीं फुरता और न उसको बन्ध मुक्त के निमित्त कुछ कर्त्तव्य है, क्योंकि सम्यक्ज्ञान से उसके सब संदेह जल गये हैं। जैसे पिंजरे से छूटा पक्षी आकाश में उड़ता है तैसे ही शङ्का से रहित उसका चित्त आत्मप्रकाश को प्राप्त हुआ है। हे रामजी ! जिसका मन संसारभ्रम से मुक्त हुआ है और जो समरस आत्मभाव में स्थित है उसको इष्ट अनिष्ट में कुछ रागद्वेष नहीं होता, वह आकाश की नाईं सबमें सम रहता है। जैसे पालने में बालक अभिमान से रहित अङ्ग हिलाता है तैसे ही ज्ञानी की चेष्टा अभिमान से रहित होती है और जैसे मद्यपान करनेवाला उन्मत्त हो जाता है तैसे ही आत्मानन्द में ज्ञानी घूमै हो जाता है और द्वैत की सँभाल उसको कुछ नहीं रहती, हेयोपादेय बुद्धि से रहित होता है। हे रामजी ! वह सबंकी सर्व-प्रकार ग्रहण करता है और त्याग भी करता है परन्तु हृदय से ग्रहण त्याग कुछ नहीं करता। जैसे बालकों को ग्रहण त्याग की बुद्धि नहीं होती तैसे ही ज्ञानी को नहीं होती और न उसको सब कार्यों में रागद्वेष ही फुरता है वह जगत् के पदार्थों को न सत् जानकर ग्रहण करता है और न असत् जानकर त्याग करता है, सबमें एक अनुस्यूत आत्मतत्त्व देखता है, न इष्ट में सुखबुद्धि करता है और न अनिष्ट में द्वेषबुद्धि करता है। हे रामजी ! जो सूर्य्य शीतल हो जावै, चन्द्रमा उष्ण हो जावै और अग्नि अधो को धावै तो भी ज्ञानी को कुछ आश्चर्य नहीं भासता। वह जानता है कि सब चिदात्मा की शक्ति फुरती है वह न किसी पर दया करता है, और न निर्दयता करता है, न लज्जा करता है, न निर्लज्ज है, न दीन होता है, न उदार होता है, न सुखी होता है, न दुःखी होता है, और उसे न हर्ष है, न उद्वेग है, वह सब विकारों से रहित शुद्ध अपने आपमें स्थित है। जैसे शरदकाल का आकाश निर्मल होता है तैसे ही वह भी निर्मल भाव में स्थित है और जैसे आकाश में अंकुर नहीं उदय होता तैसे ही उसको रागद्वेष उदय नहीं होता। हे रामजी ! ऐसा पुरुष सुख दुःख को