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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 750, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 750

उपशम प्रकरण । ७५६

कैसे ग्रहण करे ? उसको जगज्जाल ऐसे भासता है जैसे जल में तरङ्ग । ऐसे जानकर तुम भी अपने स्वभाव में स्थित हो । हे रामजी ! जैसे जाग्रत् के एक निमेष में स्वप्नसृष्टि फुर आती है और एक ही क्षण में नष्ट हो जाती है, तैसे ही जाग्रत् में भी सृष्टि उपज आती है और लीन हो जाती है । जो कुछ इच्छा, अनिच्छा, दुःख, सुख, शोक, मोह आदिक विकार हैं वे सब मन में फुरते हैं, जहाँ मन होता है वहाँ विकार भी होते हैं । जैसे जहाँ समुद्र होता है वहाँ तरङ्ग भी होते हैं तैसे ही जहाँ मन होता है वहाँ विकार भी होते हैं और जहाँ चित्त का अभाव है वहाँ विकारों का भी अभाव है । जबतक चित्त फुरता है तबतक जगद्भ्रम होता है और जब विचार-रूपी सूर्य के तेज से मनरूपी बरफ का पुतला गल जाता है तब आनन्द होता है । तब सुख दुःख की दशा शान्त हो जाती है और जब सुख दुःख का अभाव हुआ तब ग्रहणत्याग भी मिट जाता है और इष्ट अनिष्ट वाञ्छित नष्ट हो जाते हैं । जब ये नष्ट हो जाते हैं तब शुभ अशुभ भी नहीं रहते और जब शुभ अशुभ न रहे तब रमणीय अरमणीय भी नष्ट हो जाते हैं और भोगों की इच्छा भी नष्ट हो जाती है । जब भोगों की इच्छा नष्ट हो जाती है तब मन भी निराशापद में लीन हो जाता है । हे रामजी ! जब मूल से मन नष्ट हुआ तब मन में जो सङ्कल्प हैं वे कहाँ रहे ? जैसे तिलों के जले से तेल नहीं रहता तैसे ही मन में सङ्कल्प विकल्प नहीं रहते तब केवल शान्त आत्मा ही शेष रहता है । जैसे मन्दराचल के क्षोभ मिटे से क्षीरसमुद्र शान्तिमान होता है तैसे ही चित्त शान्त होता है । हे रामजी ! इससे भाव में अभाव की भावना दृढ़ करो और स्वरूप का अभ्यास करो । जैसे शरत्काल का आकाश निर्मल होता है तैसे ही कल्पना को त्यागकर महात्मा पुरुष निर्मल हो जाता है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे जीवन्मुक्तवर्णनन्नाम द्विसप्ततमस्सर्गः ॥ ७२ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जैसे जल में द्रवता से चक्र (आवर्त) होते हैं सो असत् ही सत् होकर भासते हैं तैसे ही चित्त के फुरने से असत् जगत् सत् हो भासता है और जैसे नेत्रों के दुखने से आकाश में तरुवरे