योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 751, कुल 1734 में से
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मोर के पुच्छवत मुक्तमाला हो भासते हैं सो असत् ही सत् भासते हैं तैसे ही चित्त के फुरने से जगत् भासता है। जैसे बादलों के चलने से चन्द्रमा चलता दृष्टि आता है तैसे ही चित्त के फुरने से जगत् भासता है। रामजी बोले, हे भगवन् ! जिससे चित्त फुरता है और जिससे अफुर होता है वह प्रकार कहिये कि उसका मैं उपाय करूँ। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जैसे वरफ में शीतलता, तिलों में तेल, फूलों में सुगन्ध और अग्नि में उष्णता होती है तैसे ही चित्त में फुरना होती है। चित्त और फुरना दोनों एक अभेद वस्तु हैं, दोनों में जब एक नष्ट हो तब दोनों नष्ट हो जाते हैं। जैसे शीतलता और श्वेतता के नष्ट हुए वरफ नष्ट हो जाती है तैसे ही एक के नाश हुए दोनों नष्ट होते हैं। इसलिये चित्त के नाश के दो क्रम हैं—योग और ज्ञान। चित्त की वृत्ति के रोकने को योग कहते हैं और सम्यक् विचारने का नाम ज्ञान है। रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! वृत्ति का विरोध किस युक्ति से होता है और प्राण, अपान पवन क्योंकर रोके जाते हैं किस योग से अनन्त सुख और सम्पदा प्राप्त होती है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस देह में जो नाड़ी हैं उनमें प्राणवायु फिरता है—जैसे पृथ्वी पर नदियों का जल फिरता है। वह प्राणवायु एक ही है पर स्पन्द के वश से नाना प्रकार की विचित्र क्रिया को प्राप्त होता है उससे अपान आदिक संज्ञा पाता है। योगीश्वरों की कल्पना है कि जैसे पुष्प में सुगन्ध और वरफ में श्वेतता अभेद हैं और आधार आधेय एकरूप हैं तैसे ही प्राण और चित्त अभेदरूप हैं। जब भीतर प्राणवायु फुरती है तब चित्तकला फुरकर जो संकल्प के सम्मुख होती है उसी का नाम चित्त है। जैसे जल द्रवीभूत होता है और उसमें लहर और चक्र फुर आते हैं तैसे ही प्राणों से चित्त फुर आता है। चित्त के फुरने का कारण प्राणवायु ही है जब प्राणवायु का निरोध होता है तब निश्चय करके मन भी शान्त होता है और मन में लीन हुए संसार भी लीन हो जाता है—जैसे सूर्य का प्रकाश के अभाव हुए रात्रि में मनुष्यों का व्यवहार शान्त हो जाता है। रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! यह जो सूर्य और चन्द्र निरन्तर आगमन करते हैं तो देहरूपी गृह में प्राणवायु का