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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 752, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 752

उपशम प्रकरण । ७६१

रोकना किस प्रकार होता है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! सन्तजनों के संग, सत्शास्त्रों के विचार और विषयों के वैराग्य से योगाभ्यास होता है। प्रथम जगत् में असत्बुद्धि करनी चाहिये और वाञ्छित जो अपना इष्टदेव है उसका ध्यान करना चाहिये । जब चिरकाल ध्यान होता है तब एक तत्त्व का अभ्यास होता है उससे प्राणों का स्पन्दन रोका जाता है। रेचक, पूरक और कुम्भक जो प्राणायाम हैं उनका जब अखेदचित्त होकर अभ्यास दृढ़ करे और एक ध्यानसंयुक्त हो उससे भी प्राणों का स्पन्द रोका जाता है । ऊकार का उच्चार करने से ऊर्ध्व उसकी जो सूक्ष्मध्वनि होती है तो प्रथम शब्द बड़ी ध्वनि से होता है और फिर सूक्ष्मध्वनि शेष रहती है उसमें चित्त की वृत्ति लगावे तो सुषुप्तिरूप अवस्था में वृत्ति तद्रूप हो जाती है तभी प्राणस्पन्द रोका जाता है । रेचक प्राणायाम के अभ्यास से विस्तृत प्राण वायु से शून्यभाव आकाश में जाय लीन होता है तब भी प्राण स्पन्द रोका जाता है। कुम्भक के अभ्यास के बल से भी प्राणवायु रोका जाता है। तालूमूल के साथ यत्न से जिह्वा का तालुघण्टा से लगा खेचरीमुद्रा से वायु ऊर्श्वरन्ध्र को जाती है और ऊर्श्वरन्ध्र में गये से भी प्राणवायु का स्पन्द रोका जाता है । नासिका के अग्र में जो द्वादश अंगुल पर्यन्त अपान-रूपी चन्द्रमा का निर्मल स्थान आकाश में है उसको ज्यों का त्यों देखे तो भी प्राणस्पन्द रोका जाता है। तालु के द्वादश अंगुल ऊर्श्वरन्ध्र का अभ्यास हो तो उसके अन्त में जब प्राणों को लगावे तब उस संवित् में प्राणों का फुरना नष्ट हो जाता है । जो भ्रूमध्य त्रिपुटी में प्रकाश को त्यागकर जहाँ चेतनकला रहती है वहाँ वृत्ति लगावे तो उससे भी प्राण कला रोकी जाती है । जो सब वासनाओं को त्यागकर हृदय आकाश में चेतनसंवित् का ध्यान करे तो भी चिरकाल के अभ्यास से प्राणस्पन्द रोका जाता है। रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! जगत् के भूतों का हृदय क्या कहाता है जिस महाआदर्श में सब पदार्थ प्रतिबिम्बित हो जाता है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जगत् के भूतों के दो हृदय हैं—एक ग्रहण करने योग्य है और दूसरा त्यागने योग्य । नाभि से जो दश अंगुल ऊर्ध्व है वह त्यागने योग्य है परिच्छिन्नभाव से जो देह के एक स्थान में स्थित है