सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 758, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 758

उपशम प्रकरण । | ७६७

दृष्टि नहीं आता । हे मूर्ख चित्त ! तू बहुत काल इस देहरूपी गृह में रहा है और तू वैतालरूप है । जैसे अपवित्र और शमशान आदिक स्थानों में वैताल रहता है तैसे ही सत्संग से रहित देहरूपी गृह शमशान के समान सदा अपवित्र है वहाँ तेरे रहने का स्थान है । जहाँ सन्तों का निवास होता है यहाँ तुझ सरीखे ठौर नहीं पाते सो अब मेरे हृदयरूपी गृह में सत् विचार सन्तोषादिक सन्तजन आन स्थित हुए हैं तेरे बसने का ठौर नहीं । हे चित्त पिशाच ! तू पूर्वरूपी तृष्णा पिशाचिनी और काम क्रोधा-दिक गुह्यक अपने साथ लेकर चिरपर्यन्त विचरा है अब विवेकरूपी मन्त्र से मैंने तुझको निकाला है तब कल्याण हुआ । हे चित्त ! पिशाचरूप तू प्रमादरूपी मद्य पानकर मत्त हुआ था और चिरपर्यन्त नृत्य करता था । अब मैंने विवेकरूपी मन्त्र से तुझको निकाला है तब देहरूपी कन्दरा शुद्ध हुई है और शुद्धभाव पुरुषों ने निवास किया है । हे चित्त ! मैंने तुझको विवेकरूपी मन्त्रद्वारा वश किया है । अब तेरा क्या पराक्रम है ? तब तक दुःख देता था जबतक विचाररूपी मन्त्र न पाया था । अब तेरा बल कुछ नहीं चलता । अब मैं महाकेवल भाव में स्थित हूँ । आगे भी मैं तुझको जगाता था, आपसे ही तू सब रूप है । जैसे कच्चे मन्त्रवाला सिंह को जगाता है और आप कष्ट पाता है तैसे ही मैं तुझको जगाकर कष्ट पाता था । अब मैंने आत्मविचार से परिपक्व मन्त्र से तुझे वश किया है तब शान्ति-मान् हुआ हूँ । अब ममता और मान मेरे कुछ नहीं रहे । मोह अहंकार सब नष्ट हो गये हैं और इनका कलत्र भी नष्ट हो गया है मैं निर्मल और चैतन्य आत्मा हूँ । मेरा मुझको नमस्कार है । न मेरे में कोई आशा है, न कर्म है, न संसार है, न कर्तृत्व है, न मन है, न भोक्तृत्व है और न देह है, ऐसा मेरा निर्गुणरूप आत्मा है । मेरा मुझको नमस्कार है। न कोई आत्मा है, न अनात्मा है, न अहं है, न त्वं है, किसी शब्द का वहाँ प्रवेश नहीं ऐसा निगशब्द है । प्रकाशरूप, निर्मल आत्मा मैं अपने आपमें स्थित हूँ । ऐसा जो मैं आत्मा हूँ मेरा मुझको नमस्कार है । मैं विकारी नहीं हूँ, मैं तो नित्य हूँ, निराश हूँ, सर्वकार्यों में अनुस्यूत हूँ, अंशांशीभाव से रहित हूँ । ऐसा सर्वात्मा जो मैं हूँ सो मेरा तुझको