सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 760, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 760

उपशम प्रकरण ।

७६६

प्रकाश के नष्ट हुए वर्णज्ञान नहीं रहता तैसे ही चित्त के नाश हुए इच्छा आदिक नहीं रहते। अब चित्त नष्ट हुआ, तृष्णा नष्ट हो गई और मोह का पिंजड़ा टूट पड़ा अब मैं निरहंकार बोधवान् हूँ, सब जगत् शान्तरूप आत्मा है और नानात्व कुछ नहीं। मैं निराभास, आदि-अन्त से रहित आनन्दपद को प्राप्त हुआ हूँ। मेरा सर्वगत सूक्ष्म आत्मतत्त्व अपना आप है और उसमें मैं स्थित हूँ। इन विचारों से अब क्या प्रयोजन है ? जब तक आपको मैं देह जानता था तब तक ये विचार मूर्ख अवस्था में थे अब मैं अमित, निराकार और केवल परमानन्द सच्चिदानन्द को प्राप्त हुआ हूँ। आगे मैं चित्तरूपी वैताल को आप ही जगाता था और आप ही दुःखी होता था, अब विचाररूपी मन्त्र से मैंने इसको नष्ट किया है और निर्णय से अपने स्वरूप को प्राप्त हुआ हूँ। मैं शान्तात्मा अपने आपमें स्थित हूँ। हे रामजी ! जिसको यह निश्चय प्राप्त हुआ है वह निर्द्वन्द्व रागद्वेष से रहित होकर स्थित होता है और प्रकृत कर्म करता है पर मानमद से रहित आनन्द करके पूर्ण होता है जैसे शरत्काल की रात्रि को पूर्णमासी का चन्द्रमा अमृत से पूर्ण होता है तैसे ही प्रकृत आचार कार्यकर्त्ता ज्ञानवान् का हृदय शान्तपूर्ण आत्मा है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे चित्तशान्तिप्रतिपादन-नाम षट्सप्ततितमसर्गः ॥ ७६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह विचार वेदविदों ने कहा है पूर्व मुझसे ब्रह्माजी ने यही विचार विन्ध्याचल पर्वत पर कहा था। इसी विचार से मैं परमपद में स्थित हुआ हूँ। इसी दृष्टि का आशय करके आत्मविचार होकर तमरूपी संसारसमुद्र से तर जाओ। हे रामजी ! इस पर एक और परम दृष्टि सुनो वह दृष्टि परमपद के प्राप्त करनेवाली है। जिस प्रकार वीतव मुनीश्वर विचार करके निःशङ्क स्थित हुआ है सो सुनो। महातेजवान् वीतव मुनीश्वर ने संसार के आधिव्याधि रोग से वैराग्य किया और नंगा होके पर्वतों की कन्दराओं में विचरने लगा। जैसे सूर्य सुमेरु पर्वत के चौफेर फिरता है तैसे ही वह विचरने लगा और संसार की क्रिया ॥ दुखरूप विचारता था कि बड़े भ्रम देनेवाली है। ऐसे जानकर वह दृग