सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 761, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 761

७७० | योगवाशिष्ठ ।

वान् हुआ और निर्विकल्प समाधि की इच्छा कर अपने व्यवहार को त्याग दिया और अपनी गौरकुटी त्यागकर और केले के पत्तों की बनाकर बैठा। जैसे भँवरा कमल को त्यागकर नीलकमल पर जा बैठता है तैसे ही गौरकुटी को त्यागकर वह श्यामकुटी में जा बैठा। नीचे उसने कुश बिछाया उस पर मृगछाला बिछाया और उस पर पद्मासन कर बैठा और जैसे मेघ जल त्यागकर शुद्धमौन स्थित होता है तैसे ही और क्रिया को त्यागकर शान्ति के निमित्त मौन स्थित हुआ। हाथों को तले कर मुख ऊपर कर और ग्रीवा को सूधा करके स्थित हुआ और इन्द्रियों की वृत्ति को रोक फिर मन की वृत्ति को भी रोका। जैसे सुमेरु की कन्दरा में सूर्य का प्रकाश बाहर से मिट जाता है तैसे ही इन्द्रियों की रोकी वृत्ति बाहर से भी मिट जाती है और हृदय से भी विषयों की चिन्तना का उसने त्याग किया। इस प्रकार वह क्रम करके स्थित हुआ। जब मन निकल जावे तब वह कहे कि बड़ा आश्चर्य है मन महाचञ्चल है कि जो मैं स्थित करता हूँ तो फिर निकल जाता है। जैसे सूखा पत्ता तरङ्ग में पड़ा नहीं ठहरता तैसे ही मन एक क्षण भी नहीं ठहरता सर्वदा इन्द्रियों के विषयों की ओर धावता है। जैसे गेंद को ज्यों-ज्यों ताड़ना करते हैं त्यों-त्यों उछलता तैसे ही इस मूर्ख मन को जिस-जिस ओर से खैंचता हूँ, उसी ओर फिर धावता है और उन्मत्त हाथी की नाईं झूमता है, जो गन्ध की ओर से खैंचता हूँ तो रस की ओर निकल जाता है और जो रस की ओर से खैंचता हूँ तो गन्ध की ओर धावता है स्थित कदाचित् नहीं होता। जैसे वानर कभी किसी डाल पर कभी किसी डाल पर जा बैठता है इसी प्रकार मूर्ख मन भी शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध की ओर धावता है स्थिर नहीं होता। इसके ग्रहण करने के पञ्चस्थान हैं जिन मार्गों से विषयों को ग्रहण करता है सो पञ्चज्ञान इन्द्रियाँ हैं। अरे मूर्ख, मन ! तू किस निमित्त विषयों की ओर धावता है यह तो आप जड़ और असतरूप भ्रान्तिमात्र है तू इनसे शान्ति को कैसे पावेगा ? इनमें चपलता से इच्छा करना अनर्थ का कारण है। ज्यों-ज्यों इनके अर्थों को ग्रहण करेगा त्यों-त्यों दुःख के समुद्र को भास होगा। ये विषय जड़ और असतरूप हैं और तू भी जड़ है जैसे

योगवाशिष्ठ महारामायण · पृष्ठ 761, कुल 1734 में से · BharatKosha