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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 762, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 762

उपशम प्रकरण । ७७१

मृगतृष्णा की नदी असत् होती है तैसे ही ये भी असतरूप हैं। हे मन ! ये सब असाररूप हैं तू भी इन्द्रियों सहित जड़रूप है, तू कर्तृत्व का अभिमान क्यों करता है ? सबका कर्त्ता चिदानन्द आत्मभगवान् सदा साक्षी है तैसे ही आत्मा भी साक्षी है तू क्यों वृथा तपायमान होता है ? जैसे सूर्य सबकी क्रियाओं को कराता साक्षी है तैसे ही आत्मा साक्षी है और सब जगत् भ्रान्तिमात्र है। जैसे अज्ञान से रस्सी में सर्प भासता है तैसे ही अज्ञान से आत्मा में जगत् भासता है। जैसे आकाश और पाताल का सम्बन्ध कुछ नहीं होता, ब्राह्मण और चाण्डाल का संयोग नहीं होता और सूर्य और तम का सम्बन्ध नहीं होता, तैसे आत्मा चित्त और इन्द्रियों का सम्बन्ध नहीं होता। आत्मा सत्तामात्र है और ये जड़ और असतरूप हैं इनका सम्बन्ध कैसे हो ? आत्मा सबसे न्यारा साक्षी है। जैसे सूर्य सब जनों से न्यारा रहता है तैसे ही आत्मा सबसे न्यारा साक्षी है। हे चित्त ! तू तो मूर्ख है विषयरूपी चबेने में राग करके सब ओर से भक्षण करता भी कदाचित् तृप्त नहीं होता और तू विचार के मिथ्या कूकर की नाईं चेष्टा करता है। तेरे साथ हमको कुछ प्रयोजन नहीं। हे मूर्ख ! तू तो मिथ्या अहं अहं करता है और तेरी वासना अत्यन्त असतरूप है और जिन पदार्थों की तू वासना करता है वे भी असतरूप हैं। तेरा और आत्मा का सम्बन्ध कैसे हो ? आत्मा चैतन्यरूप है और तू मिथ्या जड़रूप है। यह मैंने जाना है कि जन्ममरण आदिक विकार और जीवत्व भाव को तूने मुझको प्राप्त किया है। मैं तो केवल चैतन्य परब्रह्म हूँ मिथ्या अहंकार करके जीवत्वभाव को प्राप्त हुआ हूँ और देहमात्र आपको जानता हूँ। मैं तो संवित्मात्र नित्यशुद्ध आदि अन्त से रहित परमानन्द चिदाकाश अनन्त आत्मा हूँ। अब मैं स्वरूप में जागा हूँ और सद्भाव मुझको कुछ नहीं दृष्टि आता। हे मूर्ख मन ! जिन भोगों को तू सुखरूप जानकर धावता है वे अविचार से प्रथम तो अमृत की नाईं भासते हैं और पीछे विष की नाईं हो जाते हैं और वियोग से जलाते हैं। आपको तू कर्त्ता भोक्ता भी मिथ्या मानता है, तू कर्त्ता भोक्ता नहीं और इन्द्रियाँ कर्त्ता भोक्ता नहीं, क्योंकि जड़ हैं। जो तुम जड़ हुए तो तुम्हारे साथ मित्र