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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 763, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 763

७७२ योगवाशिष्ठ ।

भाव कैसे हो और जो तू जड़ और असतरूप है तो कर्त्ता भोक्ता कैसे हो और जो चेतन और सतरूप है तो भी तेरे में कर्तृत्व भोक्तृत्व नहीं हो सकता, क्योंकि तू मिथ्या है और मैं प्रत्यक्ष चैतन्य हूँ । तू कर्तृत्व भोक्तृत्व मिथ्या अपने में स्थापन करता है, तू मिथ्या है । जब मैं तुझको सिद्ध करता हूँ तब तू होता है तू निश्चय करके जड़ है, तुझको कर्तृत्व भोक्तृत्व कैसे हो ? जैसे पत्थर की शिला नृत्य नहीं कर सकती तैसे ही तुझको कर्तृत्व की सामर्थ्य नहीं। तेरे में जो कर्तृत्व है सो मेरी शक्ति है-जैसे हसुआ घास, तृण आदिक को काटता है सो केवल आपसे नहीं काटता पुरुष की शक्ति से काटता है और खङ्ग में जो हनन क्रिया होती है वह भी पुरुष की शक्ति है, तैसे ही तुम्हारे में कर्तृत्व भोक्तृत्व मेरी शक्ति से है । जैसे पात्र से जलपान करते हैं तो पात्र नहीं करता, पान पुरुष ही करता है और पात्र करके पान करता है तैसे ही तुम्हारे में कर्तृत्व भोक्तृत्व मेरी शक्ति करती है और मेरी सत्ता पाकर तुम अपनी चेष्टा में विचरते हो । जैसे सूर्य का प्रकाश पाकर लोग अपनी अपनी चेष्टा करते हैं तैसे ही मेरी शक्ति पाकर तुम्हारी चेष्टा होती है । अज्ञान करके तुम जड़ से रहते हो और ज्ञान करके लीन हो जाते हो । जैसे सूर्य के तेज से बरफ का पुतला गल जाता है। इससे हे चित्त ! अब मैंने निश्चय किया है, तू मृतकरूप और मूढ़ है । परमार्थ से न तू है और न इन्द्रियाँ हैं । जैसे इन्द्रजाल की बाजी के पदार्थ भासते हैं सो सब मिथ्या हैं । मैं केवल विज्ञानस्वरूप अपने आप में स्थित निरामय, अजर, अमर, नित्य, शुद्ध, बोध, परमानन्द रूप हूँ और मैं ही नानारूप होकर भासता हूँ, परन्तु कदाचित् द्वैतभाव को नहीं प्राप्त होता सदा अपने आपमें स्थित हूँ। जैसे जल में तरङ्ग बुद्बुदे दृष्टि आते हैं सो जलरूप हैं तैसे ही सब पदार्थ मेरे भासते हैं सो मुझसे भिन्न नहीं । हे चित्त ! तू भी चिन्मात्रभाव को प्राप्त हो, जब तू चिन्मात्रभाव को प्राप्त होगा तब तेरा भिन्नभाव कुछ न रहेगा और शोक से रहित होगा । आत्मतत्त्व सर्व भाव में स्थित और सर्वरूप है, जब तू उसको प्राप्त होगा तब सब कुछ तुझको प्राप्त होगा । न कोई देह है और न जगत् है सब ब्रह्म ही है, ब्रह्म

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