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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 764, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 764

उपशम प्रकरण । ७७३

ही ऐसे भासता है, वास्तव में अहं त्वं कल्पना कोई नहीं। हे चित्त ! आत्मा चैतन्यरूप और सर्वगत है, आत्मा से भिन्न कुछ नहीं तो भी तुझको संताप नहीं और अनात्मा, जड़ और असतरूप है तो भी तू न रह। जो कुछ परिच्छिन्न सा तू बनता है सो मिथ्या भ्रम है, आत्म-तत्त्व सर्वव्यापकरूप है द्वैत कुछ नहीं और सर्व वही है तो भिन्न अहं त्वं की कल्पना कैसे हो ? असत् से कार्य की सिद्धता कुछ नहीं होता । जैसे शशे के सींग असत् हैं और उनके मारने का कार्य सिद्ध नहीं होता तैसे ही तुमसे कर्तृत्व भोक्तृत्व कार्य कैसे हो और जो तू कहे कि मैं सत्-असत् और चेतन-जड़ के मध्यभाव में हूँ-जैसे तम और प्रकाश का मध्य-भाव छाया है-तो सूर्यरूप परमात्मा निरञ्जन के विद्यमान रहते मन्दभावी छाया कैसे रहे जिससे कर्तृत्व भोक्तृत्व तुझको नहीं होता, क्योंकि तू जड़ है। जैसे हसुआ अपने आप कुछ नहीं काट सकता जब मनुष्य के हाथ की शक्ति होती है तब कार्य होता है, तैसे ही तुमसे कुछ कार्य नहीं होता जब आत्मसत्ता तुमसे मिलती है तब तुमसे कार्य होता है। तुम क्यों अहंकार करके वृथा तपायमान होते हो ? हे चित्त ! जो तू कहे कि ईश्वर का उपकार है तो ईश्वर जो परमात्मा है उसको करने न करने में कुछ प्रयोजन नहीं। सबका कर्त्ता भी वही है और अकर्त्ता भी वही है । जैसे आकाश पोल से सबको वृद्धता देनेवाला है परन्तु स्पर्श किसी से नहीं करता तैसे ही परमात्मा सब सत्ता देनेवाला है और अलेप है। हे मूर्ख मन ! क्यों भोगों की वाञ्छा करता है ? तू तो जड़ और असत्-रूप है और देह भी जड़ असतरूप है, भोग कैसे भोगोगे और जो पर-मात्मा के निमित्त इच्छा करते हो तो परमात्मा तो सदा तृप्त है और इच्छा से रहित है। सर्व में वही पूर्ण है और दूसरे से रहित एक अद्वैत प्रकाशरूप अपने आपमें स्थित है-तुझको किसकी चिन्ता है ? इससे वृथा कल्पना को त्यागकर आत्मपद में स्थित हो-जहाँ सर्व क्लेश शान्त हो जाते हैं। जो तू कहे कि परमात्मा के साथ मेरा कर्तृत्व भोक्तृत्व सम्बन्ध है तो भी नहीं बनता-जैसे फूल और पत्थर का सम्बन्ध नहीं होता। तैसे ही परमात्मा के साथ तेरा सम्बन्ध नहीं होता । समान अधि-