योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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करण और द्रव्य का सम्बन्ध होता है-जैसे जल औरमृत्तिका का सम्बन्ध होता है, जैसे ओषध में चन्द्रमा की सत्ता प्राप्त होती है, जैसे सूर्य की तपन से शिला तप जाती है, जैसे बीज अंकुर का सम्बन्ध होता है, पिता और पुत्र का सम्बन्ध होता है और द्रव्य और गुण का सम्बन्ध होता है। आकार सहित वस्तु का सम्बन्ध निराकार निर्गुण वस्तु से कैसे हो ? परमात्मा चैतन्य है, तू जड़ है, वह प्रकाशरूप है, तू तमरूप है, वह सत्-रूप है, तू असतरूप है, इस कारण सम्बन्ध तो किसी के साथ नहीं बनता है तो तू क्यों वृथा जलता है ? तू अमनरूप है परमात्मा सर्वकल्पना से रहित है । तेज की एकता तेज से होती है और जल की एकता जल से होती है । तू कलङ्करूप है; परमात्मा निष्कलङ्क है तेरी एकता उससे कैसे हो ? जिसका कुछ अङ्ग होता है उसका सम्बन्ध भी होता है सो सम्बन्ध तीन प्रकार का है-सम, अर्धसम और विलक्षण । जैसे जल से जल की एकता और तेज से तेज की एकता होती है यह सम सम्बन्ध है पर तेरा आत्मा के साथ सम सम्बन्ध नहीं । दूसरा अर्ध सम्बन्ध यह है कि जैसे स्त्री और पुरुष के अङ्ग समान होते हैं परन्तु कुछ विलक्षणरूप हैं सो अर्ध सम सम्बन्ध भी तेरा और आत्मा का नहीं । कुछ अन्य की नाईं भी तेरा सम्बन्ध नहीं-जैसे जल और दूध का सम्बन्ध होता है तैसे भी तेरा सम्बन्ध नहीं-और अत्यन्त जो विलक्षण हैं उनकी नाईं भी तेरा सम्बन्ध नहीं-जैसे काष्ठ और लाख, पुरुष और हाथी, घोड़ा आदिक का सम्बन्ध नहीं । आधार-आधेयवत् भी तेरा सम्बन्ध नहीं-जैसे बीज और अंकुर, पिता और पुत्र आदिक का जो सम्बन्ध है तैसे भी तेरा और आत्मा का सम्बन्ध नहीं, क्योंकि सम्बन्ध उसका होता है जिसके साथ कुछ भी अङ्ग मिलता है, जिसका कोई अङ्ग नहीं मिलता और परस्पर विरोध हो उसका सम्बन्ध कैसे कहिये ? जैसे कहिये कि शश के सींग पर अमृत का चन्द्रमा बैठा है वा तम और प्रकाश इकट्ठे हैं तो जैसे यह नहीं बनता, तैसे ही आत्मा के साथ देह, मन और इन्द्रियों का सम्बन्ध नहीं बनता क्योंकि आत्मा सर्वकल्पना से अतीत, नित्य शुद्ध, अद्वैत और प्रकाश-रूप है और मनादिक जड़ असत्, मिथ्या और तमरूप है इनका सम्बन्ध