योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 766, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपशम प्रकरण ।
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नहीं । जिनका परस्पर विरोध है उनका सम्बन्ध कैसे हो ? तुम तो परमात्मा के अज्ञान से मन इन्द्रियाँ और देहादिक सहित उदय हुए हो और आत्मा के ज्ञान से अभाव हो जाते हो फिर सम्बन्ध कैसे हो ? हे मन ! जो कुछ जगत् है वह सब ब्रह्मस्वरूप है-द्वैत नहीं और अहं त्वं की कल्पना भी कोई नहीं । ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है, सब कलना तेरे में थी और तू तबतक था जबतक स्वरूप का अज्ञान था । जब स्वरूप का ज्ञान होता है और अज्ञान नष्ट होता है तब तू कहाँ है । जैसे रात्रि के अभाव से निशाचरों का अभाव हो जाता है तैसे ही अज्ञान के नाश हुए तेरा अभाव हो जाता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे वीतवोपाख्याने चित्तानुशासन-नाम सप्तसप्ततितमस्सर्गः ॥ ७७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार वीतहव्य मुनीश्वर विन्ध्याचल पर्वत की कन्दरा से तीक्ष्णबुद्धि से विचारने लगे और भी जो कुछ उससे कहा है सो सुनो । अनात्मा जो देह इन्द्रियाँ मनादिक हैं वे संकल्प से उपजे हैं, जब ज्ञान उदय होता है तब इनका अभाव हो जाता है । हे मन ! जैसे सूर्य के उदय हुए तम नष्ट हो जाता है तैसे ही नित्य उदित-रूप अनुभवस्वरूप परमात्मज्ञान के उदय हुए तुम्हारा अभाव हो जाता है। वासना से उसका आवरण होता है और जब वासना का अभाव हो जाता है तब आवरण का भी अभाव हो जाता है । जैसे मेघ के नष्ट हुए सूर्य प्रकाशता है तैसे ही वासना के अभाव हुए आत्मतत्त्व प्रकाशता है । वासना का मूल अज्ञान है, जब अज्ञान सहित वासना नष्ट होती है तब चिदानन्द ब्रह्म प्रकाशता है । वासना ही का नाम बन्ध है और वासना की निवृत्ति का नाम मोक्ष है । जब वासनारूपी रस्सी काटोगे तब परमात्मा का साक्षात्कार होगा । जैसे प्रकाश बिना अन्धकार का नाश नहीं होता तैसे ही मन, इन्द्रियाँ, देहादिक आत्मविचार बिना नाश नहीं होतीं । जब विचार करके आत्मपद प्राप्त हो तब मन सहित षट् इन्द्रियों का अभाव हो जाता है अर्थात् इनका अभिमान नष्ट होता है और इनके धर्म अपने में नहीं भासते । जब तक देह इन्द्रियों के साथ आवरण है तब