योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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लग आत्मपद नहीं प्राप्त हो सकता, इससे कल्याण के निमित्त आत्मपद पाने का अभ्यास करो। जबतक जीव मन और इन्द्रियों के गुणों के साथ आपको मिला जानता है तबतक अपने स्वरूप की विशुद्धता और सिद्धता नहीं भासती, जब आत्मा का साक्षात्कार हो जावेगा तब रागद्वेषादिक विकार नष्ट होंगे। जैसे सूर्य के उदय हुए निशाचरों का अभाव हो जाता है तैसे ही आत्मा के साक्षात्कार हुए विकारों का अभाव होता है। जिसके देखे से इनका अभाव हो जाता है उसका आत्मा के साथ सम्बन्ध कैसे हो। जैसे प्रकाश और तम का सम्बन्ध नहीं होता तैसे ही सत् असत् का सम्बन्ध नहीं होता और जैसे जीव से मृतक का सम्बन्ध नहीं होता तैसे ही आत्मा अनात्मा का सम्बन्ध नहीं होता। आत्मा सर्वकल्पना से रहित है और मन आदिक सर्व कल्पनारूप हैं। कहाँ यह मूक, जड़ और अनात्मारूप और कहाँ नित्य, चेतन, प्रकाश, निराकार, आत्मारूप, इनका परस्पर विरोध रूप है तो सम्बन्ध कैसे कहिये-ये तो निश्चय करके अनर्थ के कारण हैं। जब तक इनका अभिमान है तबतक जगत् दुःखरूप है और जब इनका वियोग हो तब जगत् परमात्मारूप होता है। जबतक आत्मा का अज्ञान है तबतक मनुष्य आपको इनमें मिला देखता है और दुःख पाता है और जब आत्मा का ज्ञान होता है तब अपने साथ इनका संयोग नहीं देखता यह मैंने निश्चय करके जाना है कि इन्द्रियाँ और मन के संयोग से जगत् भासता है और जब इन्द्रियों का ग्राम नष्ट हो जाता है तब जगत् परमात्मारूप हो जाता है। मैं जो आत्मा, मन और इन्द्रियों को इकट्ठा जानता था सो प्रमादरूपी मद्य के पान से मत्त हुआ मन से जानता था। अब आत्मविचार से मन नष्ट हुआ तब सुखी हुआ हूँ। जो विष को पान करके मूर्च्छित हो सो तो बनता है परन्तु पान किये बिना मूर्च्छित हो सो आश्चर्य है। इससे यदि अनात्मा का इसके साथ संयोग होता हो तो सुख दुःख करके राग द्वेषवान् होना भी बनता पर आत्मा तो सुख दुःख का साक्षीभूत है। सुख का संयोग ही जिससे नहीं और रागद्वेष से जलता है तो महामूर्खता है। आत्मा तो सुख दुःख का साक्षीभूत है जैसे उसके आगे अभ्यास होता है तैसा ही भासता है, कदाचित् विपर्ययभाव को