योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम प्रकरण । ७७७
नहीं प्राप्त होता सुख दुःख में मूर्ख मन राग द्वेषवान् होता है । आत्मा तो सदा साक्षीभूत जीववृत्ति है उसके साथ इन्द्रियों का संयोग कैसे हो ? अब जो संयोग का अभाव सिद्ध हुआ तो आत्मा में कर्तृत्व भोक्तृत्व कैसे कहिये ? जहाँ चित्तकल्पना होती है वहाँ कर्तृत्व भोक्तृत्व भी होता है और जहाँ चित्तकल्पना का अभाव है वहाँ कर्तृत्व भोक्तृत्व का भी अभाव है । ऐसा निष्कलङ्क आत्मतत्त्व में हूँ कि न कर्त्ता हूँ, न भोक्ता हूँ, न मेरे बन्ध है, न मोक्ष है, न हन्ता है, न अहन्ता है, मैं सर्वात्मा अलेपरूप हूँ। हे मन ! तू भी मैं हूँ और पृथ्वी, अप्, तेज वायु, आकाश पाँचों तत्त्व भी मैं ही हूँ। इस प्रकार निर्णय करके जिसने धारा है वह मोह को नहीं प्राप्त होता । जो अहं अभिमान करनेवाला आत्मा से आपको भिन्न जानता है वह दुःखी होता है और जब अपने स्वभाव में स्थित होता है तब परमसुखी होता है । इससे जिसको कल्याण की इच्छा हो उसको एक आत्म (परमात्म) परायण होना योग्य है । जब स्वरूप को त्यागकर संकल्प की ओर धावता है तब दुःखों के समूह को प्राप्त होता है। हे चित्त ! जो तू अपने में कर्तृत्व देखता था सो इन्द्रियों सहित जड़रूप पत्थर के समान है-जैसे आकाश में पवन नहीं लगता तैसे ही तुमसे कर्तृत्व नहीं होता । जब स्वरूप का प्रमाद होता है तब जीव चित्त आदिक से आपको मिला जानता है और चित्तादिक आत्मा की सत्ता पाकर चेतन होता है । जैसे अग्नि की सत्ता पाकर लोहा भी जला सकता है तैसे ही तुम आत्मा की सत्ता पाकर कर्तृत्व भोक्तृत्व में समर्थ होते हो । जब आत्मविचार करके स्वरूप का साक्षात्कार होता है, अज्ञानवृत्ति निवृत्त हो जाती है और मनादि का वियोग होता है तब सर्वकल्पना से रहित हुआ केवल मोक्षरूप आत्मा होता है और कर्तृत्व भोक्तृत्व का अभाव हो जाता है । जैसे आकाश में लाली का अभाव है तैसे ही आत्मा में कर्तृत्व का अभाव है । सब जगत् आत्मस्वरूप भासता है । जैसे समुद्र तरङ्ग आदिक नाना प्रकार मे होता है सो सब जलरूप है-भिन्न नहीं, तैसे ही सर्वजगत् आत्मारूप है-आत्मा से भिन्न नहीं । सच्चिदानन्द आत्मा में अपने आपमें स्थित हूँ और द्वैतकल्पना मेरे में