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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 769, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 769

७७८ योगवाशिष्ठ ।

कोई नहीं। जैसे समुद्र उष्णता से रहित है तैसे ही परमात्मा सर्वकल्पना से रहित है और जैसे आकाश में वन नहीं होता तैसे ही परमात्मा में कल्पना नहीं होती, वह संवेदन से रहित, संवित्मात्र सर्वात्मा है, जब उसका साक्षात्कार होता है तब अहं त्वं आदिक कल्पना का अभाव हो जाता है। वह अनादि, अरूप, सर्वगत, सदा अपने आपमें स्थित है, ऐसा जो अद्वैत तत्त्व है उसको द्वैतकल्पना आरोपने को कौन समर्थ है। ऐसा कौन है जो आकाश में ऋग्वेद लिखे ? नित्य उद्यति, सर्व का सार, अद्वैत आत्मा है उसमें द्वैत का अभाव है और सबमें पूर्ण, निर्मल, नित्य आनन्दरूप है ऐसे आत्मा को अब मैं प्राप्त हुआ हूँ, जगत् का सुख-दुःख अब नष्ट हुआ है सम शान्तरूप हुआ हूँ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे वीतहव्योपाख्याने अनुशासनयोगोपदेशो नामाष्टसप्ततितमसर्गः ॥ ७८ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार वीतहव्य मुनि श्रेष्ठ विचार करता था फिर जो कुछ वह निर्मल बुद्धि से विचारने लगा सो भी सुनो। हे इन्द्रिय-रूप मन ! तुम क्यों अपने अर्थों की ओर धावते हो ? तुमको तो विषयों से शान्ति नहीं होती—जैसे मृग मरुस्थल की नदी देखकर दौड़ता है और शान्तिमान नहीं होता। इससे तुम भी विषयों की ओर तृष्णा करने से शान्तिमान न होगे। इनकी इच्छा त्यागकर जो परमात्मतत्त्व अविनाशी सर्व अवस्था में एकरस और सत्य है उसको ग्रहण करो तब सब दुःख तुम्हारे मिट जावेंगे। तुम्हारे साथ में मिला था तब मैंने भी दुःख पाया। तुम अज्ञान से उत्पन्न हुए हो और जो तुम्हारे साथ मिलता है उसको भी दुःख प्राप्त होता है। जैसे तपी हुई लाख जिसके शरीर से स्पर्श करती है उसको जलाती है तैसे ही जिसको तुम्हारा संग हुआ है वह दुःख पाता है। हे मन ! यह जीव तुम्हारे संग से काल के मुख में जा पड़ता है। जैसे नदी जल सहित होती है तब समुद्र की ओर चली जाती है—जल से रहित हो तो क्यों जावे, तैसे ही तुम्हारे संग करके जीव काल के मुख में जा पड़ता है, तुम्हारा संग न हो तो क्यों पड़े ? जैसे मेघ कुहिरे मे सूर्य को घेर लेता है, तैसे ही मनरूपी मेघ इच्छारूपी कुहिरे मे