योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
७७२ योगवाशिष्ठ ।
भाव कैसे हो और जो तू जड़ और असतरूप है तो कर्त्ता भोक्ता कैसे हो और जो चेतन और सतरूप है तो भी तेरे में कर्तृत्व भोक्तृत्व नहीं हो सकता, क्योंकि तू मिथ्या है और मैं प्रत्यक्ष चैतन्य हूँ । तू कर्तृत्व भोक्तृत्व मिथ्या अपने में स्थापन करता है, तू मिथ्या है । जब मैं तुझको सिद्ध करता हूँ तब तू होता है तू निश्चय करके जड़ है, तुझको कर्तृत्व भोक्तृत्व कैसे हो ? जैसे पत्थर की शिला नृत्य नहीं कर सकती तैसे ही तुझको कर्तृत्व की सामर्थ्य नहीं। तेरे में जो कर्तृत्व है सो मेरी शक्ति है-जैसे हसुआ घास, तृण आदिक को काटता है सो केवल आपसे नहीं काटता पुरुष की शक्ति से काटता है और खङ्ग में जो हनन क्रिया होती है वह भी पुरुष की शक्ति है, तैसे ही तुम्हारे में कर्तृत्व भोक्तृत्व मेरी शक्ति से है । जैसे पात्र से जलपान करते हैं तो पात्र नहीं करता, पान पुरुष ही करता है और पात्र करके पान करता है तैसे ही तुम्हारे में कर्तृत्व भोक्तृत्व मेरी शक्ति करती है और मेरी सत्ता पाकर तुम अपनी चेष्टा में विचरते हो । जैसे सूर्य का प्रकाश पाकर लोग अपनी अपनी चेष्टा करते हैं तैसे ही मेरी शक्ति पाकर तुम्हारी चेष्टा होती है । अज्ञान करके तुम जड़ से रहते हो और ज्ञान करके लीन हो जाते हो । जैसे सूर्य के तेज से बरफ का पुतला गल जाता है। इससे हे चित्त ! अब मैंने निश्चय किया है, तू मृतकरूप और मूढ़ है । परमार्थ से न तू है और न इन्द्रियाँ हैं । जैसे इन्द्रजाल की बाजी के पदार्थ भासते हैं सो सब मिथ्या हैं । मैं केवल विज्ञानस्वरूप अपने आप में स्थित निरामय, अजर, अमर, नित्य, शुद्ध, बोध, परमानन्द रूप हूँ और मैं ही नानारूप होकर भासता हूँ, परन्तु कदाचित् द्वैतभाव को नहीं प्राप्त होता सदा अपने आपमें स्थित हूँ। जैसे जल में तरङ्ग बुद्बुदे दृष्टि आते हैं सो जलरूप हैं तैसे ही सब पदार्थ मेरे भासते हैं सो मुझसे भिन्न नहीं । हे चित्त ! तू भी चिन्मात्रभाव को प्राप्त हो, जब तू चिन्मात्रभाव को प्राप्त होगा तब तेरा भिन्नभाव कुछ न रहेगा और शोक से रहित होगा । आत्मतत्त्व सर्व भाव में स्थित और सर्वरूप है, जब तू उसको प्राप्त होगा तब सब कुछ तुझको प्राप्त होगा । न कोई देह है और न जगत् है सब ब्रह्म ही है, ब्रह्म
उपशम प्रकरण । ७७३
ही ऐसे भासता है, वास्तव में अहं त्वं कल्पना कोई नहीं। हे चित्त ! आत्मा चैतन्यरूप और सर्वगत है, आत्मा से भिन्न कुछ नहीं तो भी तुझको संताप नहीं और अनात्मा, जड़ और असतरूप है तो भी तू न रह। जो कुछ परिच्छिन्न सा तू बनता है सो मिथ्या भ्रम है, आत्म-तत्त्व सर्वव्यापकरूप है द्वैत कुछ नहीं और सर्व वही है तो भिन्न अहं त्वं की कल्पना कैसे हो ? असत् से कार्य की सिद्धता कुछ नहीं होता । जैसे शशे के सींग असत् हैं और उनके मारने का कार्य सिद्ध नहीं होता तैसे ही तुमसे कर्तृत्व भोक्तृत्व कार्य कैसे हो और जो तू कहे कि मैं सत्-असत् और चेतन-जड़ के मध्यभाव में हूँ-जैसे तम और प्रकाश का मध्य-भाव छाया है-तो सूर्यरूप परमात्मा निरञ्जन के विद्यमान रहते मन्दभावी छाया कैसे रहे जिससे कर्तृत्व भोक्तृत्व तुझको नहीं होता, क्योंकि तू जड़ है। जैसे हसुआ अपने आप कुछ नहीं काट सकता जब मनुष्य के हाथ की शक्ति होती है तब कार्य होता है, तैसे ही तुमसे कुछ कार्य नहीं होता जब आत्मसत्ता तुमसे मिलती है तब तुमसे कार्य होता है। तुम क्यों अहंकार करके वृथा तपायमान होते हो ? हे चित्त ! जो तू कहे कि ईश्वर का उपकार है तो ईश्वर जो परमात्मा है उसको करने न करने में कुछ प्रयोजन नहीं। सबका कर्त्ता भी वही है और अकर्त्ता भी वही है । जैसे आकाश पोल से सबको वृद्धता देनेवाला है परन्तु स्पर्श किसी से नहीं करता तैसे ही परमात्मा सब सत्ता देनेवाला है और अलेप है। हे मूर्ख मन ! क्यों भोगों की वाञ्छा करता है ? तू तो जड़ और असत्-रूप है और देह भी जड़ असतरूप है, भोग कैसे भोगोगे और जो पर-मात्मा के निमित्त इच्छा करते हो तो परमात्मा तो सदा तृप्त है और इच्छा से रहित है। सर्व में वही पूर्ण है और दूसरे से रहित एक अद्वैत प्रकाशरूप अपने आपमें स्थित है-तुझको किसकी चिन्ता है ? इससे वृथा कल्पना को त्यागकर आत्मपद में स्थित हो-जहाँ सर्व क्लेश शान्त हो जाते हैं। जो तू कहे कि परमात्मा के साथ मेरा कर्तृत्व भोक्तृत्व सम्बन्ध है तो भी नहीं बनता-जैसे फूल और पत्थर का सम्बन्ध नहीं होता। तैसे ही परमात्मा के साथ तेरा सम्बन्ध नहीं होता । समान अधि-
७७४ योगवाशिष्ठ ।
करण और द्रव्य का सम्बन्ध होता है-जैसे जल औरमृत्तिका का सम्बन्ध होता है, जैसे ओषध में चन्द्रमा की सत्ता प्राप्त होती है, जैसे सूर्य की तपन से शिला तप जाती है, जैसे बीज अंकुर का सम्बन्ध होता है, पिता और पुत्र का सम्बन्ध होता है और द्रव्य और गुण का सम्बन्ध होता है। आकार सहित वस्तु का सम्बन्ध निराकार निर्गुण वस्तु से कैसे हो ? परमात्मा चैतन्य है, तू जड़ है, वह प्रकाशरूप है, तू तमरूप है, वह सत्-रूप है, तू असतरूप है, इस कारण सम्बन्ध तो किसी के साथ नहीं बनता है तो तू क्यों वृथा जलता है ? तू अमनरूप है परमात्मा सर्वकल्पना से रहित है । तेज की एकता तेज से होती है और जल की एकता जल से होती है । तू कलङ्करूप है; परमात्मा निष्कलङ्क है तेरी एकता उससे कैसे हो ? जिसका कुछ अङ्ग होता है उसका सम्बन्ध भी होता है सो सम्बन्ध तीन प्रकार का है-सम, अर्धसम और विलक्षण । जैसे जल से जल की एकता और तेज से तेज की एकता होती है यह सम सम्बन्ध है पर तेरा आत्मा के साथ सम सम्बन्ध नहीं । दूसरा अर्ध सम्बन्ध यह है कि जैसे स्त्री और पुरुष के अङ्ग समान होते हैं परन्तु कुछ विलक्षणरूप हैं सो अर्ध सम सम्बन्ध भी तेरा और आत्मा का नहीं । कुछ अन्य की नाईं भी तेरा सम्बन्ध नहीं-जैसे जल और दूध का सम्बन्ध होता है तैसे भी तेरा सम्बन्ध नहीं-और अत्यन्त जो विलक्षण हैं उनकी नाईं भी तेरा सम्बन्ध नहीं-जैसे काष्ठ और लाख, पुरुष और हाथी, घोड़ा आदिक का सम्बन्ध नहीं । आधार-आधेयवत् भी तेरा सम्बन्ध नहीं-जैसे बीज और अंकुर, पिता और पुत्र आदिक का जो सम्बन्ध है तैसे भी तेरा और आत्मा का सम्बन्ध नहीं, क्योंकि सम्बन्ध उसका होता है जिसके साथ कुछ भी अङ्ग मिलता है, जिसका कोई अङ्ग नहीं मिलता और परस्पर विरोध हो उसका सम्बन्ध कैसे कहिये ? जैसे कहिये कि शश के सींग पर अमृत का चन्द्रमा बैठा है वा तम और प्रकाश इकट्ठे हैं तो जैसे यह नहीं बनता, तैसे ही आत्मा के साथ देह, मन और इन्द्रियों का सम्बन्ध नहीं बनता क्योंकि आत्मा सर्वकल्पना से अतीत, नित्य शुद्ध, अद्वैत और प्रकाश-रूप है और मनादिक जड़ असत्, मिथ्या और तमरूप है इनका सम्बन्ध
उपशम प्रकरण ।
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नहीं । जिनका परस्पर विरोध है उनका सम्बन्ध कैसे हो ? तुम तो परमात्मा के अज्ञान से मन इन्द्रियाँ और देहादिक सहित उदय हुए हो और आत्मा के ज्ञान से अभाव हो जाते हो फिर सम्बन्ध कैसे हो ? हे मन ! जो कुछ जगत् है वह सब ब्रह्मस्वरूप है-द्वैत नहीं और अहं त्वं की कल्पना भी कोई नहीं । ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है, सब कलना तेरे में थी और तू तबतक था जबतक स्वरूप का अज्ञान था । जब स्वरूप का ज्ञान होता है और अज्ञान नष्ट होता है तब तू कहाँ है । जैसे रात्रि के अभाव से निशाचरों का अभाव हो जाता है तैसे ही अज्ञान के नाश हुए तेरा अभाव हो जाता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे वीतवोपाख्याने चित्तानुशासन-नाम सप्तसप्ततितमस्सर्गः ॥ ७७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार वीतहव्य मुनीश्वर विन्ध्याचल पर्वत की कन्दरा से तीक्ष्णबुद्धि से विचारने लगे और भी जो कुछ उससे कहा है सो सुनो । अनात्मा जो देह इन्द्रियाँ मनादिक हैं वे संकल्प से उपजे हैं, जब ज्ञान उदय होता है तब इनका अभाव हो जाता है । हे मन ! जैसे सूर्य के उदय हुए तम नष्ट हो जाता है तैसे ही नित्य उदित-रूप अनुभवस्वरूप परमात्मज्ञान के उदय हुए तुम्हारा अभाव हो जाता है। वासना से उसका आवरण होता है और जब वासना का अभाव हो जाता है तब आवरण का भी अभाव हो जाता है । जैसे मेघ के नष्ट हुए सूर्य प्रकाशता है तैसे ही वासना के अभाव हुए आत्मतत्त्व प्रकाशता है । वासना का मूल अज्ञान है, जब अज्ञान सहित वासना नष्ट होती है तब चिदानन्द ब्रह्म प्रकाशता है । वासना ही का नाम बन्ध है और वासना की निवृत्ति का नाम मोक्ष है । जब वासनारूपी रस्सी काटोगे तब परमात्मा का साक्षात्कार होगा । जैसे प्रकाश बिना अन्धकार का नाश नहीं होता तैसे ही मन, इन्द्रियाँ, देहादिक आत्मविचार बिना नाश नहीं होतीं । जब विचार करके आत्मपद प्राप्त हो तब मन सहित षट् इन्द्रियों का अभाव हो जाता है अर्थात् इनका अभिमान नष्ट होता है और इनके धर्म अपने में नहीं भासते । जब तक देह इन्द्रियों के साथ आवरण है तब
७७६ योगवाशिष्ठ ।
लग आत्मपद नहीं प्राप्त हो सकता, इससे कल्याण के निमित्त आत्मपद पाने का अभ्यास करो। जबतक जीव मन और इन्द्रियों के गुणों के साथ आपको मिला जानता है तबतक अपने स्वरूप की विशुद्धता और सिद्धता नहीं भासती, जब आत्मा का साक्षात्कार हो जावेगा तब रागद्वेषादिक विकार नष्ट होंगे। जैसे सूर्य के उदय हुए निशाचरों का अभाव हो जाता है तैसे ही आत्मा के साक्षात्कार हुए विकारों का अभाव होता है। जिसके देखे से इनका अभाव हो जाता है उसका आत्मा के साथ सम्बन्ध कैसे हो। जैसे प्रकाश और तम का सम्बन्ध नहीं होता तैसे ही सत् असत् का सम्बन्ध नहीं होता और जैसे जीव से मृतक का सम्बन्ध नहीं होता तैसे ही आत्मा अनात्मा का सम्बन्ध नहीं होता। आत्मा सर्वकल्पना से रहित है और मन आदिक सर्व कल्पनारूप हैं। कहाँ यह मूक, जड़ और अनात्मारूप और कहाँ नित्य, चेतन, प्रकाश, निराकार, आत्मारूप, इनका परस्पर विरोध रूप है तो सम्बन्ध कैसे कहिये-ये तो निश्चय करके अनर्थ के कारण हैं। जब तक इनका अभिमान है तबतक जगत् दुःखरूप है और जब इनका वियोग हो तब जगत् परमात्मारूप होता है। जबतक आत्मा का अज्ञान है तबतक मनुष्य आपको इनमें मिला देखता है और दुःख पाता है और जब आत्मा का ज्ञान होता है तब अपने साथ इनका संयोग नहीं देखता यह मैंने निश्चय करके जाना है कि इन्द्रियाँ और मन के संयोग से जगत् भासता है और जब इन्द्रियों का ग्राम नष्ट हो जाता है तब जगत् परमात्मारूप हो जाता है। मैं जो आत्मा, मन और इन्द्रियों को इकट्ठा जानता था सो प्रमादरूपी मद्य के पान से मत्त हुआ मन से जानता था। अब आत्मविचार से मन नष्ट हुआ तब सुखी हुआ हूँ। जो विष को पान करके मूर्च्छित हो सो तो बनता है परन्तु पान किये बिना मूर्च्छित हो सो आश्चर्य है। इससे यदि अनात्मा का इसके साथ संयोग होता हो तो सुख दुःख करके राग द्वेषवान् होना भी बनता पर आत्मा तो सुख दुःख का साक्षीभूत है। सुख का संयोग ही जिससे नहीं और रागद्वेष से जलता है तो महामूर्खता है। आत्मा तो सुख दुःख का साक्षीभूत है जैसे उसके आगे अभ्यास होता है तैसा ही भासता है, कदाचित् विपर्ययभाव को
उपशम प्रकरण । ७७७
नहीं प्राप्त होता सुख दुःख में मूर्ख मन राग द्वेषवान् होता है । आत्मा तो सदा साक्षीभूत जीववृत्ति है उसके साथ इन्द्रियों का संयोग कैसे हो ? अब जो संयोग का अभाव सिद्ध हुआ तो आत्मा में कर्तृत्व भोक्तृत्व कैसे कहिये ? जहाँ चित्तकल्पना होती है वहाँ कर्तृत्व भोक्तृत्व भी होता है और जहाँ चित्तकल्पना का अभाव है वहाँ कर्तृत्व भोक्तृत्व का भी अभाव है । ऐसा निष्कलङ्क आत्मतत्त्व में हूँ कि न कर्त्ता हूँ, न भोक्ता हूँ, न मेरे बन्ध है, न मोक्ष है, न हन्ता है, न अहन्ता है, मैं सर्वात्मा अलेपरूप हूँ। हे मन ! तू भी मैं हूँ और पृथ्वी, अप्, तेज वायु, आकाश पाँचों तत्त्व भी मैं ही हूँ। इस प्रकार निर्णय करके जिसने धारा है वह मोह को नहीं प्राप्त होता । जो अहं अभिमान करनेवाला आत्मा से आपको भिन्न जानता है वह दुःखी होता है और जब अपने स्वभाव में स्थित होता है तब परमसुखी होता है । इससे जिसको कल्याण की इच्छा हो उसको एक आत्म (परमात्म) परायण होना योग्य है । जब स्वरूप को त्यागकर संकल्प की ओर धावता है तब दुःखों के समूह को प्राप्त होता है। हे चित्त ! जो तू अपने में कर्तृत्व देखता था सो इन्द्रियों सहित जड़रूप पत्थर के समान है-जैसे आकाश में पवन नहीं लगता तैसे ही तुमसे कर्तृत्व नहीं होता । जब स्वरूप का प्रमाद होता है तब जीव चित्त आदिक से आपको मिला जानता है और चित्तादिक आत्मा की सत्ता पाकर चेतन होता है । जैसे अग्नि की सत्ता पाकर लोहा भी जला सकता है तैसे ही तुम आत्मा की सत्ता पाकर कर्तृत्व भोक्तृत्व में समर्थ होते हो । जब आत्मविचार करके स्वरूप का साक्षात्कार होता है, अज्ञानवृत्ति निवृत्त हो जाती है और मनादि का वियोग होता है तब सर्वकल्पना से रहित हुआ केवल मोक्षरूप आत्मा होता है और कर्तृत्व भोक्तृत्व का अभाव हो जाता है । जैसे आकाश में लाली का अभाव है तैसे ही आत्मा में कर्तृत्व का अभाव है । सब जगत् आत्मस्वरूप भासता है । जैसे समुद्र तरङ्ग आदिक नाना प्रकार मे होता है सो सब जलरूप है-भिन्न नहीं, तैसे ही सर्वजगत् आत्मारूप है-आत्मा से भिन्न नहीं । सच्चिदानन्द आत्मा में अपने आपमें स्थित हूँ और द्वैतकल्पना मेरे में
७७८ योगवाशिष्ठ ।
कोई नहीं। जैसे समुद्र उष्णता से रहित है तैसे ही परमात्मा सर्वकल्पना से रहित है और जैसे आकाश में वन नहीं होता तैसे ही परमात्मा में कल्पना नहीं होती, वह संवेदन से रहित, संवित्मात्र सर्वात्मा है, जब उसका साक्षात्कार होता है तब अहं त्वं आदिक कल्पना का अभाव हो जाता है। वह अनादि, अरूप, सर्वगत, सदा अपने आपमें स्थित है, ऐसा जो अद्वैत तत्त्व है उसको द्वैतकल्पना आरोपने को कौन समर्थ है। ऐसा कौन है जो आकाश में ऋग्वेद लिखे ? नित्य उद्यति, सर्व का सार, अद्वैत आत्मा है उसमें द्वैत का अभाव है और सबमें पूर्ण, निर्मल, नित्य आनन्दरूप है ऐसे आत्मा को अब मैं प्राप्त हुआ हूँ, जगत् का सुख-दुःख अब नष्ट हुआ है सम शान्तरूप हुआ हूँ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे वीतहव्योपाख्याने अनुशासनयोगोपदेशो नामाष्टसप्ततितमसर्गः ॥ ७८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार वीतहव्य मुनि श्रेष्ठ विचार करता था फिर जो कुछ वह निर्मल बुद्धि से विचारने लगा सो भी सुनो। हे इन्द्रिय-रूप मन ! तुम क्यों अपने अर्थों की ओर धावते हो ? तुमको तो विषयों से शान्ति नहीं होती—जैसे मृग मरुस्थल की नदी देखकर दौड़ता है और शान्तिमान नहीं होता। इससे तुम भी विषयों की ओर तृष्णा करने से शान्तिमान न होगे। इनकी इच्छा त्यागकर जो परमात्मतत्त्व अविनाशी सर्व अवस्था में एकरस और सत्य है उसको ग्रहण करो तब सब दुःख तुम्हारे मिट जावेंगे। तुम्हारे साथ में मिला था तब मैंने भी दुःख पाया। तुम अज्ञान से उत्पन्न हुए हो और जो तुम्हारे साथ मिलता है उसको भी दुःख प्राप्त होता है। जैसे तपी हुई लाख जिसके शरीर से स्पर्श करती है उसको जलाती है तैसे ही जिसको तुम्हारा संग हुआ है वह दुःख पाता है। हे मन ! यह जीव तुम्हारे संग से काल के मुख में जा पड़ता है। जैसे नदी जल सहित होती है तब समुद्र की ओर चली जाती है—जल से रहित हो तो क्यों जावे, तैसे ही तुम्हारे संग करके जीव काल के मुख में जा पड़ता है, तुम्हारा संग न हो तो क्यों पड़े ? जैसे मेघ कुहिरे मे सूर्य को घेर लेता है, तैसे ही मनरूपी मेघ इच्छारूपी कुहिरे मे
उपशम प्रकरण । ७७६
आत्मारूपी सूर्य को घेर लेता है और परम्परा दुःखों की वर्षा करनेवाला है। हे मन ! तेरे में चिन्ता उठती है इससे तू मर्कट की नाईं है। जैसे मर्कट वृक्ष को ठहरने नहीं देता, हिलाता है तैसे ही चित्त देह को ठहरने नहीं देता। चित्तरूपी पखेरू के लोभ और लज्जा दो पंख हैं और रागद्वेषरूपी चोंच है जिससे शरीररूपी वृक्ष पर बैठा शुभगुणों को काटकर खाता है। चित्तरूपी महानीच कुत्ता भोगभावनारूपी महाअपवित्र पदार्थों को हृदयरूपी स्थान में इकट्ठा करता है और ऐसी चेष्टा से कदाचित् रहित नहीं होता। चित्तरूपी उलूक अज्ञानरूपी रात्रि में विचरता है, चेष्टा करके प्रसन्न होता है और शब्द करता है। जैसे श्मशान से बैताल शब्द करता है। जब अज्ञानरूपी रात्रि नष्ट हो तब चित्तरूपी उलूक का भी अभाव हो और सम्पदा ज्ञान प्रवेश करे। जैसे सूर्य के उदय हुए सूर्यमुखी कमल उदय होता है तैसे ही सम्पदा प्रफुल्लित होता है। जब मोहरूपी कुहिरा और इच्छारूपी धूलि हृदयरूपी आकाश से निवृत्त होती है तब निर्मल आकाश प्रकट होता है। हे चित्त ! जब तक तू नष्ट नहीं होता तबतक शान्ति नहीं होती। स्वस्थ बैठे हुए जो चिन्ता प्राप्त होती है वह तेरे ही संयोग से होती है जहाँ चित्त नष्ट होता है वहाँ सर्व आनन्द होकर शीतलता और मित्रता से पावन होता है। जैसे शीतकाल का आकाश निर्मल होता है और मेघ के नष्ट हुए सूर्य प्रकाशता है तैसे ही अज्ञान के नष्ट हुए आत्मा में प्रकाशता और प्रसन्नता, गम्भीरता, महत्त्वता और समता होती है। जैसे वायु और मन्दराचल पर्वत से रहित क्षीरसमुद्र शान्तिमान् होता है और पूर्णमासी का चन्द्रमा शोभता है तैसे ही अज्ञान के नाश हुए आत्मानन्द पाकर यह मनुष्य शोभता है। हे चित्त ! यह स्थावर-जंगम जगत् संवित्रूप आकाश में है। उस महत् ब्रह्म को तुम भी प्राप्त हो। जो पुरुष आशारूपी फाँसी को तोड़कर आत्मपद में प्राप्त हुआ है और जिसने संसार का सद्भाव निवृत्त किया है वह जन्म-मरण के बन्धन में नहीं पड़ता है। जैसे जला हुआ पत्र फिर हरा नहीं होता तैसे ही चित्त नष्ट हुआ जन्म-मरण नहीं पावता। हे चित्त ! तू सबको भक्षण करनेवाला है। जो तू संसार को सत् मानकर उसकी
७८० योगवाशिष्ट ।
ओर धावेगा तो तेरा कल्याण न होगा और जो आत्मा की ओर आवेगा तो तेरा कल्याण होगा जब तू अपना अभाव कर आत्मपद में स्थित होगा तब कल्याणरूप होगा और जो तू अपना सद्भाव करेगा कि आकार को न त्यागेगा तो दुःखी होगा । जो तेरा जीना है वह मृत्यु समान है और जो मृत्यु है सो जीने के समान है । दोनों पक्षों में जो तेरी इच्छा हो सो अङ्गीकार कर । जो तू अबही आपको आत्मपद में निर्वाण करेगा तो परमपद को प्राप्त होकर परमसुखी होगा और जो न करेगा तो परम दुःखी होगा जो आत्मपद को त्याग करेगा वह मूढ़ है । तेरा निर्वाण होना आत्मपद में जीने का निमित्त है और आत्मा से भिन्न जो तू जीने की इच्छा करता है सो तेरा जीना मिथ्या अर्थात् तू आदि भी मिथ्या है और अब भी विचार बिना भ्रममात्र है, विचार किये से नष्ट हो जावेगा । जैसे सूर्य के प्रकाश बिना अंधकार होता है और प्रकाश से नष्ट हो जाता है तैसे ही विचार बिना चित्त है, विचार से नष्ट हो जाता है । इतने काल में अविवेक से ही जीता था । जैसे बालकों को अपनी परछाईं में वैताल कल्पना होती है और विचार बिना भय पाती है-विचार किये से निर्भय होता है तैसे ही अब मैं तेरे संग से छूट अपने पूर्व स्वरूप को प्राप्त हुआ हूँ और विवेक से तेरा अभाव हुआ है । इससे विवेक को नमस्कार है । हे चित्त ! अविवेक से तू मेरा मित्र था अब बोध से तेरा चित्तभाव नष्ट हो गया । तू परमेश्वररूप है । अब वासना नष्ट हुई है । आगे तेरे में नाना प्रकार की वासना थी उससे तू मलिन और दुःस्वरूप था । अब वासना के नष्ट होने से तेरा परमेश्वररूप हुआ है । तेरे में अज्ञान से चित्तस्वभाव उपजा दुःखों का कारण था सो विवेक से लीन हुआ है । जैसे रात्रि के पदार्थ सूर्य के उदय हुए लीन हो जाते हैं तैसे ही विवेक से चित्तभाव नष्ट हुआ है सो सिद्धान्त का कारण है । तेरे संग से मैं तुच्छ सा हो गया था, अब शास्त्रों की युक्ति से निर्णय किया है कि न तू आगे था, न अब है और न फिर होगा । जबतक मैंने आपको न जाना था तबतक तेरा सद्भाव था, अब मैंने आपको जाना है और अपने आपमें स्थित हुआ हूँ । अब मैं परम निर्वाण और शान्त
उपशम प्रकरण । ७८१
रूप हूँ, सब ताप मेरे नष्ट हुए हैं और नित्यशुद्ध निदानन्द परब्रह्मस्व- रूप हूँ । जगत् की सत्य-असत्य कलना मेरी नष्ट हुई है, क्योंकि कलना सब चित्त में थी, जब चित्त निर्वाण हो गया तब कलना कहाँ रही ? मैं केवल शुद्ध आत्मा हूँ, मेरा प्रतियोगी कोई नहीं और न व्यवच्छेद है, क्योंकि दूसरा कोई नहीं केवल चित्त की चेतना फुरती थी सो निर्वाण हो गई है और अब मैं स्वस्थ हुआ हूँ । जैसे तरङ्गों से रहित समुद्र अचल होता है तैसे ही सर्वकलना से रहित मैं वीतराग हूँ और संवेदन से रहित समसत्तामात्र अपने आपमें स्थित हूँ ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उपशमप्रकरणे वीतद्योपाख्याने चित्तोपदेशोनाम- कोनाशीतितमसर्गः ॥ ७९ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार वीतहव्य ने निर्वासनिक हो निर्णय करके विन्ध्याचल पर्वत की कन्दरा में समाधि लगाई और आकाशवत् निर्मलचित्त हो इन्द्रियों की वृत्ति बाहर से खींचकर अचल की और फिर ग्रीवा को सम करके चित्त की वृत्ति अनन्तआत्मा साक्षीभूत में स्थित की । जैसे लकड़ियों को जलाकर अग्नि की ज्वालाशान्त हो जाती है तैसे ही उसके प्राण और मन की वृत्ति का स्पन्द मिट गया और जैसे शिला में खोदी हुई पुतली होती है और मूर्ति की लिखी हुई पुतली होती है तैसे ही स्थित हो गया । मेघों की वर्षा शिर पर हो, मण्डलेश्वर शिकार खेलें बड़े शब्द रीझ हों, और वानर शब्द करें, वारहसिंहों और हाथियों के शब्द हों, वन में अग्नि लगे, पत्थरों की वर्षा हों, वायु चले और धूप पड़े तो भी वह समाधि से न जागे और जैसे पहाड़ में शिला दबी होती है तैसे ही उसका शरीर दब गया । जब तीन सौ वर्ष इसी प्रकार व्यतीत हुए तब चित्त फुर आया कि शरीर मेरे साथ है परन्तु प्राण नहीं फुरे और चित्त के फुरने में आपको कैलास पर्वत के ऊपर और कदम्ब के वृक्ष के नीचे देखा । सौ वर्ष पर्यन्त मौन होकर जीवन्मुक्त और निर्मल आत्मा हो बिचरा । सौ वर्ष पर्यन्त विद्याधर होकर विद्याधरों में बिचरा, उसके अनन्तर और पद्म- युग बीतकर इन्द्र हुआ तब देवता उसे नमस्कार करते थे । रामजी ने पूछा हे भगवन् ! देश काल और मनादिक प्रतिभा उसको अनियत अग्नि-
७८२ योगवाशिष्ठ ।
यह कैसे भासित हुई ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! चित्त सर्वात्मरूप है, जैसा जैसा उसमें फुरना होता है तैसा ही भासता है । जैसे जैसे देश काल का फुरना होता है जैसे ही अनुभव होता है । हे रामजी ! जितना प्रपञ्च है वह मनोमात्र है । जैसा फुरना तीव्र होता है वैसे ही अनुभवसत्ता में भासित हो वहाँ स्थित होता है । जब और भ्रम में गया तो नियम के अनुसार तैसे ही होता जाता है । जो अज्ञानी होता है उसको वासना से नाना प्रकार का जगत् भासता है और जो ज्ञानवान् होता है वह सब आत्मा को देखता है, उसका फुरना भी अफुरना है और वासना भी अवासना है । बीतव मुनीश्वर ने चित्त के फुरने से इतना देखा परन्तु स्वस्थरूप था इससे उसकी वासना भी अवासना थी । जैसे भुना बीज नहीं उगता तैसे ही उसकी वासना भी अवासना थी और भ्रान्ति का कारण न था । फिर कल्पपर्यन्त वह चन्द्रधार सदाशिवजी का गण हो समस्त विद्याओं का ज्ञाता और सर्वज्ञ त्रिकालदर्शी जीवन्मुक्त होकर विचरा । हे रामजी ! जैसा किसी का संस्कार दृढ़ होता है तैसा ही उसको अनुभव होता है । जैसे बीतव चित्त को स्पन्द करके जीवन्मुक्ति का अनुभव करता था । रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! जो ऐसे हैं तो जीवन्मुक्ति के मत में बन्ध मोक्ष हुआ ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जीवन्मुक्ति को सब ब्रह्मस्वरूप भासता है बन्ध व मोक्ष अवस्था उसमें कहाँ है ? ज्ञानमात्र आकाश में जैसा फुरना होता है तैसा ही भासता है । हे अङ्ग ! यह सब चिन्मात्रस्वरूप है और जगत् नाना प्रकार का मन से भासता है, वास्तव में न जगत् है, न अजगत् है केवल ब्रह्मसत्ता स्थित है । जगत् में भूत भविष्यत् केवल ब्रह्मसत्ता भासती है । चिन्मात्र से भिन्न जगत् मन के फुरने से भासता है जिनको ऐसा ज्ञान नहीं उनको जगत् वज्रसार से भी दृढ़ हो भासता है और ज्ञानवान् को आकाशवत् भासता है । हे रामजी ! अज्ञान से मन उपजा है उससे सम्पूर्ण जगत् हुआ है वास्तव में और कुछ नहीं । जैसे समुद्र में तरङ्ग और उल्लास होते हैं तैसे ही चिदाकाश में आकर भासते हैं । जब चित्त अचित्त हो जाता है तब कुछ द्वैत नहीं भासता ।
इति श्रीयोग० उपशम० बीतवमनोयज्ञवर्णनन्नामाशीतितमसर्गः ॥८०॥
उपशम प्रकरण ।
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रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! वीतहव मुनीश्वर का जो शरीर विन्ध्या- चल पर्वत में फँसा था फिर उसकी क्या अवस्था हुई ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! उसके अनन्तर आत्मवेत्ता वीतहव मुनीश्वर एक काल में शरीर गणों को मन से विचारने लगा कि कई नष्ट हो गये हैं। उन अनष्टों में पृथ्वी के मध्य जो उसका स्थित था उसको देखा कि कन्दरा की धूलि में वर्षा से फँस गया है और ऊपर तृणजाल जम गया है। उसको देखकर कहने लगा कि इसमें प्रवेश करूँ पर फिर विचार किया कि यह तो जड़ गूँगा और फँसा हुआ है और इसको मैं नहीं निकाल सकता, इससे सूर्य- मण्डल को जाऊँ कि सूर्य के सारथी अरुण पंगु इसको निकालेंगे, अथवा इसके साथ मेरा क्या प्रयोजन है ? यह नाश हो जावे अथवा रहे इतना यत्न मैं किस निमित्त करूँ ? मैं अपने निर्गुण स्वरूप में स्थित होऊँ देह से मेरा क्या है। इस प्रकार विचार वीतहव तूष्णीम हो गया और एक क्षण के अनन्तर फिर चिन्तन करने लगा कि पृथ्वी में न कुछ त्यागने योग्य है और न कुछ ग्रहण करने योग्य है, इससे देह को त्यागना और रखना समान है तो यह शरीर किस निमित्त दवा रहे । कुछ काल और इसका प्रारब्ध वेग है इसलिये जो आकाश में सूर्य स्थित है उसमें प्रवेश करूँ-जैसे आदर्श में प्रतिबिम्ब प्रवेश करता है और उस शरीर को सूर्य के सारथी से निकलवाऊँ । हे रामजी ! ऐसे विचारकर मुनीश्वर पुर्यष्टकरूप से आकाशमार्ग में चढ़ा और प्रणाम करके सूर्य के भीतर वायुरूप हो प्रवेश किया-जैसे शस्त्र पिण्ड में अग्नि प्रवेश करती है। सूर्य भगवान् ने जाना कि वीतहव मुनीश्वर ने प्रवेश किया है और सर्वज्ञ थे इससे जाना कि पृथ्वी में इसका शरीर कीचड़ और तृणों से दवा हुआ है उसके निकलवाने के निमित्त आया है। ऐसे विचार सूर्य ने अपने सारथी से कहा। हे सारथी ! विन्ध्याचल पर्वत की कन्दरा में वीतहव मुनीश्वर का शरीर दवा पड़ा है उसको तू जाकर निकाल दे। तब अरुण नामक सारथी ने जिसका शरीर हाथी के समान है विन्ध्या- चल पर्वत में आकर नखों से वह शरीर निकाला। उसके नख ऐसे थे जिनसे वह पहाड़ उखाड़ डाले उन नखों से धराकोटर में गड़े हुए उस
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शरीर को उसने निकाला जैसे समुद्र के तीरे भीह की तन्तु को कीड़ा पाते हैं तैसे ही पर्वत की कन्दरा से उस शरीर को निकाल डाला । तब मुनीश्वर ने पुर्य्यष्टका से उस शरीर में प्रवेश किया-जैसे पक्षी आकाश मार्ग से उड़ता-उड़ता आलय में आ प्रवेश करे । सावधान होकर अरुण को नमस्कार किया और अरुण ने भी वीतह्य को नमस्कार किया और अपने-अपने कार्य की ओर हुए । अरुण तो आकाशमार्ग को गया और मुनीश्वर का शरीर कीचड़ से भरा हुआ था इससे उसने तालाब पर जाकर डुबकी मारी और जैसे हाथी मल धोता है तैसे ही स्नान करके सन्ध्यादिक कर्म किये और सूर्य भगवान् का पूजन किया । जैसे प्रथम तप से शरीर शोभता था तैसे ही भूषित किया और मैत्री, समता, सत्, मुदिता आदिक गुणों से सम्पन्न होकर ब्रह्मलक्ष्मी से सुशोभित हुआ और सबके सङ्ग से रहित भी रहा कि इन गुणों को भी स्वरूप में स्पर्श न करे और आपको शुद्ध स्वरूप जाने ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे वीतहवसमाधियोगोपदेशो नामैकाशीतितमस्सर्गः ॥ ८१ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार जब कुछ दिन व्यतीत हुए तब समाधि के निमित्त मुनीश्वर का मन उदय हुआ और विन्ध्याचल पर्वत की कन्दरा में जा बैठा । पूर्व जो विचार अभ्यास किया था और परावर परमात्मादृष्टि हुई थी उससे फिर चित्त को कहा कि हे चित्त और इन्द्रियों ! मैंने तुम्हारा पूर्व प्रहार कर छोड़ा है । अब तुम्हारे अचित्त में अर्थ अनर्थ कोई नहीं, क्योंकि अस्ति नास्ति कलना मेरी नष्ट हुई है । अस्ति नास्ति के पीछे जो शेष रहता है उसमें स्थित हूँ । जैसे पहाड़ का शृंग अचल होता है तैसे ही अचल हूँ । सदा उदयरूप आत्मा की नाईं स्थित हूँ और सदा ज्ञानस्वरूप प्रकाशवान् हूँ । असत् की नाईं इस प्रकार कि सदा अक्रियरूप हूँ और असतरूप उदय की नाईं स्थित हूँ । असत् इस प्रकार से मन इन्द्रियों का विषय नहीं और उदय की नाईं इस कारण से कि सबका साक्षीभूत हूँ और सदा समरस प्रकाशरूप अपने आप में स्थित हूँ । प्रबुद्ध और सुषुप्तिविषय स्थित हूँ । प्रबुद्ध इस कारण कि जो
उपशम प्रकरण। ७८५.
इन्द्रियों के विषय की उपलब्धि करता हूँ और सुषुप्ति इस कारण कि हर्ष, शोक, इष्ट, अनिष्ट से रहित और जगत् की ओर से सुषुप्तिवत् समाधि में स्थित हूँ और स्वरूप में जाग्रत् हुआ तुरीया पद आत्मतत्त्व में स्थित हूँ। जैसे किसी स्थान में खंभ स्थित होता है तैसे ही स्थितरूप नित्य, शुद्ध, समानसत्ता जो आत्मपद है वहाँ मैं निरामय स्थित हूँ। हे रामजी! इस प्रकार ध्यान करता हुआ वह मुनीश्वर ध्यान में लगा और छः दिन तक ध्यान में रहा और फिर जब जगा तो उस काल को क्षण के समान जाना जैसे सोया हुआ क्षण में जागे। इसी प्रकार वीतहव्य शुद्धपद को प्राप्त हुआ और जीवन्मुक्त होकर चिरकाल पर्यन्त विचरता रहा। न कोई वस्तु उसे हर्ष दे और न शोक दे, चलता हुआ भी स्थित रहे और इन्द्रियों का व्यवहार करता भी इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में सम रहे-कदाचित् किसी से चलायमान न हो। वह चलता बैठता मन और इन्द्रियों से कहे, हे इन्द्रियों! मरो। हे मन! अब तू समवान् हुआ है और आत्मा को पाकर अब देख तुझको क्या सुख है। जिस सुख के पाये से और पाने योग्य कुछ नहीं रहता, वह निरोग सुख है। ऐसा जो परमशान्तरूप अचल सुख है तिसका आश्रय करके चञ्चलता को त्याग और हे इन्द्रियों! तुम्हारा वास्तव में कुछ स्वरूप नहीं और आत्मपद में तुम दृष्टि नहीं आतीं। अपने स्वरूप के जाने बिना तुम मुझको दुःख देती थीं, अब मैं अपने स्वरूप को प्राप्त हुआ हूँ और अब तुम मुझे वश नहीं कर सकतीं, क्योंकि तुम अवस्तुरूप हो आत्मा के प्रमाद से तुम्हारा भान होता है। जैसे रस्सी में सर्प भासता है तैसे ही आत्मा में जो अनात्म भावना और अनात्मा में आत्मभावना होती है सो अविचार से होती है और विचार किये से नहीं होती। अब विचार करके यह भ्रम निवृत्त हुआ है, तुम इन्द्रियगण और हो, अहंकार और है ब्रह्म और कर्तृत्व और है, भोक्तृत्व और है। और का दुःख आप में मानना यही मूर्खता है। जैसे वन की लकड़ी और है, बाँस और है चर्म और है जिससे रथ बनता है और लोहा, पीतल और कड़े जिनसे रथ जड़ा जाता है सो सब भिन्न-भिन्न हैं और बैल जो रथ को चलाता है सो भी जुदा है, इन सबसे रथ बनता है और जैसे गृह का
७८६ योगवाशिष्ठ ।
आकार होता तैसे रथ है उसमें बैठनेवाला पुरुष भी और होता है और रथ की सामग्री परस्पर भिन्न-भिन्न होती है तो यदि उसमें बैठनेवाला कहे कि मैं रथ हूँ तो नहीं बनता तैसे ही शरीररूपी रथ अज्ञान से मिला है। इन्द्रियाँ और हैं और मनादिक और हैं उसमें पुरुष है सो जीव है, यदि जीव कहे कि मैं शरीर हूँ तो बड़ी मूर्खता है। उस शरीर के सुख-दुःख मूर्खता से आपको मानता है जो विचार करके देखो तो रागद्वेष के क्षोभ से मुक्त हो। मैंने अविचार को दूर से त्यागा है और स्वरूप की स्मृति स्पष्ट की है कि आत्मतत्त्व सत् है। उसी को मैंने सत् जाना है और अनात्मा असत् है उसको असत् जाना है। जो सत् है वह स्थित है, जो असत् है वह क्षीण हो जाता है। हे रामजी! इस प्रकार वीतहव्य मुनि विचार करके जीवन्मुक्त हुआ और अपने स्वरूप में बहुत वर्षों को व्यतीत किया। निर्भयपद में चित्तादिक भ्रम सब नष्ट हो जाते हैं। ऐसे शुद्धपद को प्राप्त हुआ वह यथाभूतार्थ आत्मध्यान में स्थित हुआ और ग्रहण और त्याग की कुछ भावना न रही परिपूर्ण आत्मपद को प्राप्त हुआ। अगस्त्य मुनि का पुत्र वीतहव्य मुनि उस पद को पाकर निर्वासनिक हुआ। फिर जिस काल में और जिस प्रकार से वह विदेह-मुक्त हुआ है वह भी सुनो। बीस हजार और सात सौ वर्ष वह जीवन्मुक्त रहकर फिर विदेहमुक्त हुआ, जो इच्छा अनिच्छा से रहित पद है और जन्म-मरण का जिसमें अन्त है उस रागद्वेष से रहित पद को प्राप्त हुआ। हे रामजी! फिर उसने हिमालय पर्वत की कन्दरा में प्रवेश किया और पद्मासन बाँध हाथ जोड़कर कहा, हे राग! राग तुम निरागता और निर्दोषता को प्राप्त हो। तुम्हारे साथ मैंने चिरपर्यन्त विवेक से रहित क्रीड़ा की है। तुम अब जाओ, मेरा तुमको नमस्कार हैं। हे भोग! तुम्हारी लालसा से मुझको परमपद का विस्मरण हो गया था। जैसे माता सुख के निमित्त पुत्र की लालसा करती है तैसे ही मैं सुख जानकर तुम्हारी लालसा करता था। अब तुम जाओ तुमको मेरा नमस्कार है। अब मैं निर्वाणपद को प्राप्त होता हूँ। हे दुःख! तुमको भी नमस्कार है। तेरे उपदेश से मैं आत्मपद को प्राप्त हुआ हूँ, क्योंकि मैं सदा भोग और सुख
उपशम प्रकरण । ७८७
चाहता था, और जब सुख प्राप्त होता था तब तुझको भी साथ ले आता था सुख से तेरी उत्पत्ति होती है, सुख की लालसा में तो मैं अनेक जन्म पाता रहा, पर जब सुख आवे तब तुझको भी साथ ले आवे । तुझको देखकर मुझको आत्मपद की इच्छा उपजी और तेरे प्रसाद से मैं परम शीतल पद को प्राप्त हुआ हूँ । हे दुःख ! तू तो दुःख था परन्तु मुझको आत्मपद प्राप्त किया इससे तेरा कल्याण हो । तू अब जा । हे मित्र ! संसार में जीना असार है, जिसका संयोग होता है उसका वियोग भी होता है । तूने मेरे साथ बड़ा उपकार किया कि अपना नाश किया और मुझको सुख प्राप्त किया क्योंकि जब तू मुझको प्राप्त न था तो मैं आत्मपद के निमित्त कब यत्न करता था । तूने अपना नाश करना माना परन्तु मुझको सुख प्राप्त किया । हे मित्र ! तू बांधवों की नाईं चिरकाल पर्यन्त मेरे साथ रहा और कदाचित् मुझसे दूर न हुआ मैंने तेरा नाश नहीं किया पर तूने अपना नाश आप ही किया है । तू मुझको जब प्राप्त हुआ था तब मुझको विवेक उत्पन्न हुआ, उस विवेक ने तेरा नाश किया है इससे तुझको मेरा नमस्कार है । और हे माता ! तृष्णा ! तुझको भी नमस्कार है । तू सदा मेरे साथ रही है और कदाचित् त्याग नहीं किया । जैसे अपने बालक का त्याग माता नहीं करती तैसे ही तूने मेरा त्याग नहीं किया । अब तू जा । हे कामदेव ! तुझने आपही विपर्यय होकर अपना नाश किया । जब तू बहिर्मुख था तब जीता था और जब अन्तर्मुख हुआ तब तू मिट गया । तुझको नमस्कार है । हे सुकृतो ! तुमको नमस्कार है । तुमने भी बड़ा उपकार किया कि नरकों से निकालकर स्वर्गों में डाला, परन्तु अन्त में सबका वियोग होना है इससे तुम भी जाओ । हे दुष्कृतो ! तुम भी जाओ । विकर्मरूपी तुम्हारा क्षेत्र है और युवा अवस्था बीज है उससे दुःख फल होता है तुम्हारे साथ भी संयोग हुआ था इससे तुमको भी नमस्कार है, तुम भी जाओ । हे मोह ! तुमको भी नमस्कार है, तुझसे चिरकाल मैं बँधा था और नाना प्रकार के स्थानों को प्राप्त होता था और तू भय दिखाता था उससे मैं भय पाता था । इससे तुझको
¹ अनिर्विण्णमभाकान्तं पन्निंतरङ्गित गिरः गाधाणि निथिलायन्ते सुष्णे आतकणा० ते ॥१॥
७८८ | योगवाशिष्ट ।
नमस्कार है, अब तू जा । हे गिरिकन्दरा ! तुझको भी नमस्कार है । तुममें मैंने चिरकाल तप किया है । हे बुद्धि ! हे विवेक ! तुमको भी नमस्कार है । तुमने मेरे साथ उपकार किया है कि संसारबन्धन से मुक्त किया । तुम भी जाओ । दण्ड और तूँवा । तुमको भी नमस्कार है । तुम भी जाओ । बहुत काल तुम भी मेरे सम्बन्धी रहे हो । हे देह ! रक्तमांस का पिंजर होकर तू मेरे साथ बहुत काल रही है और तूने उपकार किया है । विवेक उप-जाने का स्थान तू ही है, तेरे संयोग से मैंने परमपद पाया है तू भी अब जा, तुझको नमस्कार है । हे संसार के व्यवहारो ! तुमको भी नमस्कार है, तुम्हारे में मैंने बहुत क्रिया की है । ऐसा पदार्थ जगत् में कोई नहीं जिसमें मैंने व्यवहार न किया हो, ऐसा कर्म कोई नहीं जो मैंने न किया होगा और ऐसा देश कोई नहीं जो देखा न होगा । अब सबको नमस्कार है । हे इन्द्रियों, प्राण और मनादिक ! तुमको नमस्कार है ! तुम्हारा हमारा चिरकाल संयोग था अब वियोग हुआ, क्योंकि जिसका संयोग होता है उसका वियोग भी होता है । इससे तुम्हारा हमारा भी वियोग होता है । नेत्रों की ज्योति सूर्यमण्डल में जा लीन होगी, घ्राणों की गन्ध पृथ्वी में लीन होगी और प्राण त्वचा पवन में, श्रवण आकाश में, मन चन्द्रमा में और जिह्वा रस में लीन होगी । इसी प्रकार सब अपने-अपने अंश में लीन होंगे । जैसे लकड़ियों के जले से अग्नि शान्त हो जाती है, शरत्काल में मेघ शान्त हो जाता है, तेल से रहित दीपक निर्वाण हो जाता है और सूर्य के अस्त हुए प्रकाश शान्त हो जाता है तैसे ही मनादिक शान्त हो जावेंगे । हे रामजी ! ऐसे विचार करते करते उसका मन सर्वकार्य से रहित हो प्रणव के ध्यान में लगा और सर्व-दृश्य से शान्त और मोहरूपी मल को त्यागकर प्रणव के विचार में लगा ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उपशमप्रकरणे द्वयशीतितमसर्गः ॥२॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार उसने शब्दब्रह्म प्रणव का उच्चार किया और पञ्चम भूमिका जो चित्त की अवस्था है उसको प्राप्त हुआ । भीतर-बाहर के स्थूल-सूक्ष्म पदार्थों और त्रिलोकी के सब संकल्पों को त्यागकर वह अछोभरूप स्थित हुआ जैसे चिन्तामणि अपने प्रकाश
उपशम प्रकरण । ७८६
में स्थित होती है, जैसे पूर्णमासी का चन्द्रमा अपने आपमें स्थित होता है, जैसे मन्दराचल के निकलने से क्षीरसमुद्र स्थित होता है और मथने से रहित मन्दराचल स्थित होता है जैसे कुम्हार का चक्र फिरता फिरता ठहर जाता है जैसे सूर्य के अस्त हुए जीवों की व्यवहार क्रिया ठहर जाती है, जैसे मेघ से रहित शरत्काल का आकाश निर्मल होता है और प्रकाश तन से रहित होता है, तैसे ही फुरने से रहित उसका मन शान्ति को प्राप्त हुआ । प्रणव का ध्यान करके फिर उस वृत्ति के अन्त को प्राप्त हुआ और फिरमन्त्र को भी त्याग--जैसे महापुरुष क्रोध को त्यागते हैं तैसे ही वृत्ति को त्यागा । फिर तेज का प्रकाश उदय हुआ उसको भी निमेष में त्यागा । आगे न तेज है, न तम है उसमें अभाववृत्ति रहती है उसको भी निमेष में त्यागा, तब जैसे नूतन बालक की जन्म से पदार्थज्ञान से रहित अवस्था होती है तैसे ही अवस्था प्राप्त हुई । तब जो सत्तामात्र आत्मतत्त्व सुषुप्तिपद है उसका आश्रय किया और महाचल जो सुमेरु की नाई स्थिर अवस्था है उसको प्राप्त हुआ । फिर केवल अचेतन चिन्मात्र तुरीया निरानन्द आनन्दपद में जिसमें स्वरूप से भिन्न और आनन्द नहीं प्राप्त हुआ । वह असत् और सतरूप है । सर्वक्रिया से अतीत है, इस कारण असत् है और अनुभवरूप है इस कारण सत्यरूप है ! ऐसे अशब्दपद को वह प्राप्त हुआ जो परमशुद्ध पावन और सर्वभाव के भीतर प्राप्त है और सर्वभाव शब्द से रहित है । जिसको शून्यवादी-शून्य, ब्रह्मवादी-ब्रह्म, विज्ञानवादी-विज्ञान, सांख्य मतवालेपुरुष-ईश्वर शैवा-शिव, वैष्णव-विष्णु, शक्ति-परमशक्ति, कालवादी-काल, आत्मवादी-आत्मा और माध्यमिक-माध्यम इत्यादिक जो शास्त्रोंवाले कहते हैं सो एक परब्रह्म को ही कहते हैं, जो सर्वदा, सर्वकला, सर्वप्रकार, सर्व में सर्वरूप है । ऐसे सर्वात्मा को वह मुनीश्वर प्राप्त हुआ । जिस आनन्दसमुद्र के बल से सबको आनन्द होता है ऐसे आत्मतत्त्व अनुभवरूप अपने आनन्द को वह प्राप्त हुआ और वही रूप हो गया । जो अन्य और निरन्व, निरञ्जन, सर्व, असर्व, अजर-अमर सबके आदि सकलङ्क-निष्कलङ्क
७६० योगवाशिष्ठ ।
है ऐसे आकाश से निर्मल पद को वीतहव मुनीश्वर प्राप्त हुआ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे वीतहवनिर्वाणयोगोपदेशो नाम त्र्यशीतितमसर्गः ॥ ८३ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! दुःखरूप संसारसमुद्र के पार हो वीतहव मुनीश्वर उस परमपद को प्राप्त हुआ जिस पद के प्राप्त हुए जीव फिर जन्ममरण को नहीं पाता और जिस पद में स्थित हुआ परमशान्त उपशम आनन्द को प्राप्त होता है—जैसे समुद्र में पड़ी हुई बुन्द समुद्र हो जाती है तैसे ही ब्रह्मसमुद्र में वह ब्रह्म हो गया और शरीर जो था वह विरस होकर गिर पड़ा जैसे शीतकाल में वृक्षों के सूखे पत्र गिर पड़ते हैं। शरीररूपी वृक्ष में हृदयरूपी आलय था और उसमें प्राणरूपी पक्षी रहता था सो चिदाकाश में प्राप्त हुआ जैसे गोफन से पत्थर धावता है तैसे ही जो प्राप्त हुआ और अपने स्वरूप में स्थित हुआ। हे रामजी ! यह मैंने वीतहव की कथा तुमको सुनाई है सो अनन्त विचारकर युक्त है। इस प्रकार विचारकर वीतहव विश्रामवान् हुआ है। तुम भी उसको विचारकर सिद्धता के सार को प्राप्त हो और दृश्य की चिन्तना को त्याग के सावधान हो। हे रामजी ! जो कुछ मैंने तुझसे पूर्व कहा है कि उस पद में प्राप्त हुआ फिर कुछ पाने योग्य नहीं रहता और अब जो कुछ कहता हूँ और जो कुछ पीछे कहूँगा उसको विचारो। मुक्तिज्ञान ही से होती है और ज्ञान ही से सब दुःख नष्ट होते हैं, ज्ञान ही से अज्ञान निवृत्ति होता और ज्ञान ही से परम सिद्धता को प्राप्त होता है। पाने योग्य यही वस्तु है, और कोई दुःखों का नाश नहीं कर सकता। यह निश्चय है कि ज्ञान से सब फाँसी कट जाती है और ज्ञान ही से वीतहव ने मन को चूर्ण किया। हे रामजी ! वीतहव की संवित् जगत् के अतीत हो गई। जो कुछ दुःख है वह मन से होता है और मन के उपशम हुए सब जगत् अनुभवरूप हो जाता है। वीतहव भी मनोमात्र था, मैं भी मनोमात्र हूँ, तू भी मनोमात्र है और पृथ्वी आदि जगत् भी सब मनोमात्र है, मन से भिन्न कुछ नहीं। जहाँ मन होता है वहाँ जगत् होता है, मन ही जगत्रूप है और जगत् ही मनरूप है। जो ज्ञानवान् पुरुष है वह मन की दशा को त्याग के केवल चिदानन्द आत्म-
उपशम प्रकरण । ७६१
तत्त्व में स्थित होता है और रागद्वेष आदि विकार उसके मिट जाते हैं।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे वीतहव्यविश्रान्तिसमाप्ति-
र्नाम चतुरशीतितमसर्गः ॥ ८४ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! वीतहव की नाईं विदितवेद होकर तुम भी रागद्वेष से रहित स्थित हो । जैसे तीस सहस्र वर्ष वीतहव्य वीतशोक और जीवन्मुक्त होकर विचरा है तैसे ही तुम भी विचरो । और भी बोध-वान् राजा और मुनीश्वर हुए हैं, जैसे वे उस पद में प्राप्त हुए राज्यादिक व्यवहार में रहे हैं तैसे ही तुम भी जीवन्मुक्त होकर रहो । हे रामजी ! सुख दुःख कर्म आत्मा को स्पर्श नहीं करते, आत्मा सर्वज्ञ है, तुम किस निमित्त शोक करते हो ? बहुत विदितवेद पृथ्वी में विचरते हैं परन्तु शोक को कदाचित नहीं प्राप्त होते—जैसे तुम अब शोक नहीं करते हो । हे रामजी ! तुम अब स्वस्थ उदार शम और सर्वज्ञ हो, अब तुमको फिर जन्म न होगा । जीवन्मुक्त पुरुष जो अपने स्वरूप में स्थित है वह हर्ष-शोक को प्राप्त नहीं होता । जैसे सिंह वानर और शृगाल आदिक के वश नहीं होता है तैसे ही जीवन्मुक्त विकारों से रहित होता है । रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! इस प्रसंग में मुझको संदेह हुआ है उसको जैसे शरत्काल में मेघ नष्ट हो जाता है तैसे ही नाश करो । हे तत्त्ववेत्ताओं में श्रेष्ठ ! जीवन्मुक्त के शरीर में शक्ति क्यों नहीं दृष्टि आती कि आकाश में उड़ता फिरे और सूक्ष्म रूप से और शरीर में प्रवेश कर जावे इत्यादिक ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! आकाशगमनादिक जो सिद्धि हैं सो तपादिक कर्मों की शक्ति हैं । जो कुछ जगत् विचित्र दिखाई देना और फिर गुप्त हो जाना इत्यादिक हैं वे वस्तु द्रव्य, क्रिया के स्वभाव हैं, आत्मज्ञान के नहीं । हे रामजी ! कोई द्रव्य, क्रिया और काल को यथा-क्रम साधता है उसको ही शक्ति प्राप्त होती है और ज्ञानी साधे अथवा अज्ञानी साधे उसको शक्ति प्राप्त होती है परन्तु वह शक्ति आत्मज्ञान का फल नहीं । आत्मज्ञानी को आत्मज्ञान की ही सिद्धता होती है, वह आत्मा से ही तृप्त होता है और सिद्धि जो अविद्यारूप हैं उनकी ओर नहीं धावता । जो कुछ जगत् है वह उसने अविद्यारूप जाना है इससे