योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम प्रकरण । ७८६
में स्थित होती है, जैसे पूर्णमासी का चन्द्रमा अपने आपमें स्थित होता है, जैसे मन्दराचल के निकलने से क्षीरसमुद्र स्थित होता है और मथने से रहित मन्दराचल स्थित होता है जैसे कुम्हार का चक्र फिरता फिरता ठहर जाता है जैसे सूर्य के अस्त हुए जीवों की व्यवहार क्रिया ठहर जाती है, जैसे मेघ से रहित शरत्काल का आकाश निर्मल होता है और प्रकाश तन से रहित होता है, तैसे ही फुरने से रहित उसका मन शान्ति को प्राप्त हुआ । प्रणव का ध्यान करके फिर उस वृत्ति के अन्त को प्राप्त हुआ और फिरमन्त्र को भी त्याग--जैसे महापुरुष क्रोध को त्यागते हैं तैसे ही वृत्ति को त्यागा । फिर तेज का प्रकाश उदय हुआ उसको भी निमेष में त्यागा । आगे न तेज है, न तम है उसमें अभाववृत्ति रहती है उसको भी निमेष में त्यागा, तब जैसे नूतन बालक की जन्म से पदार्थज्ञान से रहित अवस्था होती है तैसे ही अवस्था प्राप्त हुई । तब जो सत्तामात्र आत्मतत्त्व सुषुप्तिपद है उसका आश्रय किया और महाचल जो सुमेरु की नाई स्थिर अवस्था है उसको प्राप्त हुआ । फिर केवल अचेतन चिन्मात्र तुरीया निरानन्द आनन्दपद में जिसमें स्वरूप से भिन्न और आनन्द नहीं प्राप्त हुआ । वह असत् और सतरूप है । सर्वक्रिया से अतीत है, इस कारण असत् है और अनुभवरूप है इस कारण सत्यरूप है ! ऐसे अशब्दपद को वह प्राप्त हुआ जो परमशुद्ध पावन और सर्वभाव के भीतर प्राप्त है और सर्वभाव शब्द से रहित है । जिसको शून्यवादी-शून्य, ब्रह्मवादी-ब्रह्म, विज्ञानवादी-विज्ञान, सांख्य मतवालेपुरुष-ईश्वर शैवा-शिव, वैष्णव-विष्णु, शक्ति-परमशक्ति, कालवादी-काल, आत्मवादी-आत्मा और माध्यमिक-माध्यम इत्यादिक जो शास्त्रोंवाले कहते हैं सो एक परब्रह्म को ही कहते हैं, जो सर्वदा, सर्वकला, सर्वप्रकार, सर्व में सर्वरूप है । ऐसे सर्वात्मा को वह मुनीश्वर प्राप्त हुआ । जिस आनन्दसमुद्र के बल से सबको आनन्द होता है ऐसे आत्मतत्त्व अनुभवरूप अपने आनन्द को वह प्राप्त हुआ और वही रूप हो गया । जो अन्य और निरन्व, निरञ्जन, सर्व, असर्व, अजर-अमर सबके आदि सकलङ्क-निष्कलङ्क