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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 779, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 779

७८८ | योगवाशिष्ट ।

नमस्कार है, अब तू जा । हे गिरिकन्दरा ! तुझको भी नमस्कार है । तुममें मैंने चिरकाल तप किया है । हे बुद्धि ! हे विवेक ! तुमको भी नमस्कार है । तुमने मेरे साथ उपकार किया है कि संसारबन्धन से मुक्त किया । तुम भी जाओ । दण्ड और तूँवा । तुमको भी नमस्कार है । तुम भी जाओ । बहुत काल तुम भी मेरे सम्बन्धी रहे हो । हे देह ! रक्तमांस का पिंजर होकर तू मेरे साथ बहुत काल रही है और तूने उपकार किया है । विवेक उप-जाने का स्थान तू ही है, तेरे संयोग से मैंने परमपद पाया है तू भी अब जा, तुझको नमस्कार है । हे संसार के व्यवहारो ! तुमको भी नमस्कार है, तुम्हारे में मैंने बहुत क्रिया की है । ऐसा पदार्थ जगत् में कोई नहीं जिसमें मैंने व्यवहार न किया हो, ऐसा कर्म कोई नहीं जो मैंने न किया होगा और ऐसा देश कोई नहीं जो देखा न होगा । अब सबको नमस्कार है । हे इन्द्रियों, प्राण और मनादिक ! तुमको नमस्कार है ! तुम्हारा हमारा चिरकाल संयोग था अब वियोग हुआ, क्योंकि जिसका संयोग होता है उसका वियोग भी होता है । इससे तुम्हारा हमारा भी वियोग होता है । नेत्रों की ज्योति सूर्यमण्डल में जा लीन होगी, घ्राणों की गन्ध पृथ्वी में लीन होगी और प्राण त्वचा पवन में, श्रवण आकाश में, मन चन्द्रमा में और जिह्वा रस में लीन होगी । इसी प्रकार सब अपने-अपने अंश में लीन होंगे । जैसे लकड़ियों के जले से अग्नि शान्त हो जाती है, शरत्काल में मेघ शान्त हो जाता है, तेल से रहित दीपक निर्वाण हो जाता है और सूर्य के अस्त हुए प्रकाश शान्त हो जाता है तैसे ही मनादिक शान्त हो जावेंगे । हे रामजी ! ऐसे विचार करते करते उसका मन सर्वकार्य से रहित हो प्रणव के ध्यान में लगा और सर्व-दृश्य से शान्त और मोहरूपी मल को त्यागकर प्रणव के विचार में लगा ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे उपशमप्रकरणे द्वयशीतितमसर्गः ॥२॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार उसने शब्दब्रह्म प्रणव का उच्चार किया और पञ्चम भूमिका जो चित्त की अवस्था है उसको प्राप्त हुआ । भीतर-बाहर के स्थूल-सूक्ष्म पदार्थों और त्रिलोकी के सब संकल्पों को त्यागकर वह अछोभरूप स्थित हुआ जैसे चिन्तामणि अपने प्रकाश