योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 778, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपशम प्रकरण । ७८७
चाहता था, और जब सुख प्राप्त होता था तब तुझको भी साथ ले आता था सुख से तेरी उत्पत्ति होती है, सुख की लालसा में तो मैं अनेक जन्म पाता रहा, पर जब सुख आवे तब तुझको भी साथ ले आवे । तुझको देखकर मुझको आत्मपद की इच्छा उपजी और तेरे प्रसाद से मैं परम शीतल पद को प्राप्त हुआ हूँ । हे दुःख ! तू तो दुःख था परन्तु मुझको आत्मपद प्राप्त किया इससे तेरा कल्याण हो । तू अब जा । हे मित्र ! संसार में जीना असार है, जिसका संयोग होता है उसका वियोग भी होता है । तूने मेरे साथ बड़ा उपकार किया कि अपना नाश किया और मुझको सुख प्राप्त किया क्योंकि जब तू मुझको प्राप्त न था तो मैं आत्मपद के निमित्त कब यत्न करता था । तूने अपना नाश करना माना परन्तु मुझको सुख प्राप्त किया । हे मित्र ! तू बांधवों की नाईं चिरकाल पर्यन्त मेरे साथ रहा और कदाचित् मुझसे दूर न हुआ मैंने तेरा नाश नहीं किया पर तूने अपना नाश आप ही किया है । तू मुझको जब प्राप्त हुआ था तब मुझको विवेक उत्पन्न हुआ, उस विवेक ने तेरा नाश किया है इससे तुझको मेरा नमस्कार है । और हे माता ! तृष्णा ! तुझको भी नमस्कार है । तू सदा मेरे साथ रही है और कदाचित् त्याग नहीं किया । जैसे अपने बालक का त्याग माता नहीं करती तैसे ही तूने मेरा त्याग नहीं किया । अब तू जा । हे कामदेव ! तुझने आपही विपर्यय होकर अपना नाश किया । जब तू बहिर्मुख था तब जीता था और जब अन्तर्मुख हुआ तब तू मिट गया । तुझको नमस्कार है । हे सुकृतो ! तुमको नमस्कार है । तुमने भी बड़ा उपकार किया कि नरकों से निकालकर स्वर्गों में डाला, परन्तु अन्त में सबका वियोग होना है इससे तुम भी जाओ । हे दुष्कृतो ! तुम भी जाओ । विकर्मरूपी तुम्हारा क्षेत्र है और युवा अवस्था बीज है उससे दुःख फल होता है तुम्हारे साथ भी संयोग हुआ था इससे तुमको भी नमस्कार है, तुम भी जाओ । हे मोह ! तुमको भी नमस्कार है, तुझसे चिरकाल मैं बँधा था और नाना प्रकार के स्थानों को प्राप्त होता था और तू भय दिखाता था उससे मैं भय पाता था । इससे तुझको
¹ अनिर्विण्णमभाकान्तं पन्निंतरङ्गित गिरः गाधाणि निथिलायन्ते सुष्णे आतकणा० ते ॥१॥