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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 777, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 777

७८६ योगवाशिष्ठ ।

आकार होता तैसे रथ है उसमें बैठनेवाला पुरुष भी और होता है और रथ की सामग्री परस्पर भिन्न-भिन्न होती है तो यदि उसमें बैठनेवाला कहे कि मैं रथ हूँ तो नहीं बनता तैसे ही शरीररूपी रथ अज्ञान से मिला है। इन्द्रियाँ और हैं और मनादिक और हैं उसमें पुरुष है सो जीव है, यदि जीव कहे कि मैं शरीर हूँ तो बड़ी मूर्खता है। उस शरीर के सुख-दुःख मूर्खता से आपको मानता है जो विचार करके देखो तो रागद्वेष के क्षोभ से मुक्त हो। मैंने अविचार को दूर से त्यागा है और स्वरूप की स्मृति स्पष्ट की है कि आत्मतत्त्व सत् है। उसी को मैंने सत् जाना है और अनात्मा असत् है उसको असत् जाना है। जो सत् है वह स्थित है, जो असत् है वह क्षीण हो जाता है। हे रामजी! इस प्रकार वीतहव्य मुनि विचार करके जीवन्मुक्त हुआ और अपने स्वरूप में बहुत वर्षों को व्यतीत किया। निर्भयपद में चित्तादिक भ्रम सब नष्ट हो जाते हैं। ऐसे शुद्धपद को प्राप्त हुआ वह यथाभूतार्थ आत्मध्यान में स्थित हुआ और ग्रहण और त्याग की कुछ भावना न रही परिपूर्ण आत्मपद को प्राप्त हुआ। अगस्त्य मुनि का पुत्र वीतहव्य मुनि उस पद को पाकर निर्वासनिक हुआ। फिर जिस काल में और जिस प्रकार से वह विदेह-मुक्त हुआ है वह भी सुनो। बीस हजार और सात सौ वर्ष वह जीवन्मुक्त रहकर फिर विदेहमुक्त हुआ, जो इच्छा अनिच्छा से रहित पद है और जन्म-मरण का जिसमें अन्त है उस रागद्वेष से रहित पद को प्राप्त हुआ। हे रामजी! फिर उसने हिमालय पर्वत की कन्दरा में प्रवेश किया और पद्मासन बाँध हाथ जोड़कर कहा, हे राग! राग तुम निरागता और निर्दोषता को प्राप्त हो। तुम्हारे साथ मैंने चिरपर्यन्त विवेक से रहित क्रीड़ा की है। तुम अब जाओ, मेरा तुमको नमस्कार हैं। हे भोग! तुम्हारी लालसा से मुझको परमपद का विस्मरण हो गया था। जैसे माता सुख के निमित्त पुत्र की लालसा करती है तैसे ही मैं सुख जानकर तुम्हारी लालसा करता था। अब तुम जाओ तुमको मेरा नमस्कार है। अब मैं निर्वाणपद को प्राप्त होता हूँ। हे दुःख! तुमको भी नमस्कार है। तेरे उपदेश से मैं आत्मपद को प्राप्त हुआ हूँ, क्योंकि मैं सदा भोग और सुख