योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 776, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपशम प्रकरण। ७८५.
इन्द्रियों के विषय की उपलब्धि करता हूँ और सुषुप्ति इस कारण कि हर्ष, शोक, इष्ट, अनिष्ट से रहित और जगत् की ओर से सुषुप्तिवत् समाधि में स्थित हूँ और स्वरूप में जाग्रत् हुआ तुरीया पद आत्मतत्त्व में स्थित हूँ। जैसे किसी स्थान में खंभ स्थित होता है तैसे ही स्थितरूप नित्य, शुद्ध, समानसत्ता जो आत्मपद है वहाँ मैं निरामय स्थित हूँ। हे रामजी! इस प्रकार ध्यान करता हुआ वह मुनीश्वर ध्यान में लगा और छः दिन तक ध्यान में रहा और फिर जब जगा तो उस काल को क्षण के समान जाना जैसे सोया हुआ क्षण में जागे। इसी प्रकार वीतहव्य शुद्धपद को प्राप्त हुआ और जीवन्मुक्त होकर चिरकाल पर्यन्त विचरता रहा। न कोई वस्तु उसे हर्ष दे और न शोक दे, चलता हुआ भी स्थित रहे और इन्द्रियों का व्यवहार करता भी इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में सम रहे-कदाचित् किसी से चलायमान न हो। वह चलता बैठता मन और इन्द्रियों से कहे, हे इन्द्रियों! मरो। हे मन! अब तू समवान् हुआ है और आत्मा को पाकर अब देख तुझको क्या सुख है। जिस सुख के पाये से और पाने योग्य कुछ नहीं रहता, वह निरोग सुख है। ऐसा जो परमशान्तरूप अचल सुख है तिसका आश्रय करके चञ्चलता को त्याग और हे इन्द्रियों! तुम्हारा वास्तव में कुछ स्वरूप नहीं और आत्मपद में तुम दृष्टि नहीं आतीं। अपने स्वरूप के जाने बिना तुम मुझको दुःख देती थीं, अब मैं अपने स्वरूप को प्राप्त हुआ हूँ और अब तुम मुझे वश नहीं कर सकतीं, क्योंकि तुम अवस्तुरूप हो आत्मा के प्रमाद से तुम्हारा भान होता है। जैसे रस्सी में सर्प भासता है तैसे ही आत्मा में जो अनात्म भावना और अनात्मा में आत्मभावना होती है सो अविचार से होती है और विचार किये से नहीं होती। अब विचार करके यह भ्रम निवृत्त हुआ है, तुम इन्द्रियगण और हो, अहंकार और है ब्रह्म और कर्तृत्व और है, भोक्तृत्व और है। और का दुःख आप में मानना यही मूर्खता है। जैसे वन की लकड़ी और है, बाँस और है चर्म और है जिससे रथ बनता है और लोहा, पीतल और कड़े जिनसे रथ जड़ा जाता है सो सब भिन्न-भिन्न हैं और बैल जो रथ को चलाता है सो भी जुदा है, इन सबसे रथ बनता है और जैसे गृह का