योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
उपशम प्रकरण। ७८५.
इन्द्रियों के विषय की उपलब्धि करता हूँ और सुषुप्ति इस कारण कि हर्ष, शोक, इष्ट, अनिष्ट से रहित और जगत् की ओर से सुषुप्तिवत् समाधि में स्थित हूँ और स्वरूप में जाग्रत् हुआ तुरीया पद आत्मतत्त्व में स्थित हूँ। जैसे किसी स्थान में खंभ स्थित होता है तैसे ही स्थितरूप नित्य, शुद्ध, समानसत्ता जो आत्मपद है वहाँ मैं निरामय स्थित हूँ। हे रामजी! इस प्रकार ध्यान करता हुआ वह मुनीश्वर ध्यान में लगा और छः दिन तक ध्यान में रहा और फिर जब जगा तो उस काल को क्षण के समान जाना जैसे सोया हुआ क्षण में जागे। इसी प्रकार वीतहव्य शुद्धपद को प्राप्त हुआ और जीवन्मुक्त होकर चिरकाल पर्यन्त विचरता रहा। न कोई वस्तु उसे हर्ष दे और न शोक दे, चलता हुआ भी स्थित रहे और इन्द्रियों का व्यवहार करता भी इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में सम रहे-कदाचित् किसी से चलायमान न हो। वह चलता बैठता मन और इन्द्रियों से कहे, हे इन्द्रियों! मरो। हे मन! अब तू समवान् हुआ है और आत्मा को पाकर अब देख तुझको क्या सुख है। जिस सुख के पाये से और पाने योग्य कुछ नहीं रहता, वह निरोग सुख है। ऐसा जो परमशान्तरूप अचल सुख है तिसका आश्रय करके चञ्चलता को त्याग और हे इन्द्रियों! तुम्हारा वास्तव में कुछ स्वरूप नहीं और आत्मपद में तुम दृष्टि नहीं आतीं। अपने स्वरूप के जाने बिना तुम मुझको दुःख देती थीं, अब मैं अपने स्वरूप को प्राप्त हुआ हूँ और अब तुम मुझे वश नहीं कर सकतीं, क्योंकि तुम अवस्तुरूप हो आत्मा के प्रमाद से तुम्हारा भान होता है। जैसे रस्सी में सर्प भासता है तैसे ही आत्मा में जो अनात्म भावना और अनात्मा में आत्मभावना होती है सो अविचार से होती है और विचार किये से नहीं होती। अब विचार करके यह भ्रम निवृत्त हुआ है, तुम इन्द्रियगण और हो, अहंकार और है ब्रह्म और कर्तृत्व और है, भोक्तृत्व और है। और का दुःख आप में मानना यही मूर्खता है। जैसे वन की लकड़ी और है, बाँस और है चर्म और है जिससे रथ बनता है और लोहा, पीतल और कड़े जिनसे रथ जड़ा जाता है सो सब भिन्न-भिन्न हैं और बैल जो रथ को चलाता है सो भी जुदा है, इन सबसे रथ बनता है और जैसे गृह का
७८६ योगवाशिष्ठ ।
आकार होता तैसे रथ है उसमें बैठनेवाला पुरुष भी और होता है और रथ की सामग्री परस्पर भिन्न-भिन्न होती है तो यदि उसमें बैठनेवाला कहे कि मैं रथ हूँ तो नहीं बनता तैसे ही शरीररूपी रथ अज्ञान से मिला है। इन्द्रियाँ और हैं और मनादिक और हैं उसमें पुरुष है सो जीव है, यदि जीव कहे कि मैं शरीर हूँ तो बड़ी मूर्खता है। उस शरीर के सुख-दुःख मूर्खता से आपको मानता है जो विचार करके देखो तो रागद्वेष के क्षोभ से मुक्त हो। मैंने अविचार को दूर से त्यागा है और स्वरूप की स्मृति स्पष्ट की है कि आत्मतत्त्व सत् है। उसी को मैंने सत् जाना है और अनात्मा असत् है उसको असत् जाना है। जो सत् है वह स्थित है, जो असत् है वह क्षीण हो जाता है। हे रामजी! इस प्रकार वीतहव्य मुनि विचार करके जीवन्मुक्त हुआ और अपने स्वरूप में बहुत वर्षों को व्यतीत किया। निर्भयपद में चित्तादिक भ्रम सब नष्ट हो जाते हैं। ऐसे शुद्धपद को प्राप्त हुआ वह यथाभूतार्थ आत्मध्यान में स्थित हुआ और ग्रहण और त्याग की कुछ भावना न रही परिपूर्ण आत्मपद को प्राप्त हुआ। अगस्त्य मुनि का पुत्र वीतहव्य मुनि उस पद को पाकर निर्वासनिक हुआ। फिर जिस काल में और जिस प्रकार से वह विदेह-मुक्त हुआ है वह भी सुनो। बीस हजार और सात सौ वर्ष वह जीवन्मुक्त रहकर फिर विदेहमुक्त हुआ, जो इच्छा अनिच्छा से रहित पद है और जन्म-मरण का जिसमें अन्त है उस रागद्वेष से रहित पद को प्राप्त हुआ। हे रामजी! फिर उसने हिमालय पर्वत की कन्दरा में प्रवेश किया और पद्मासन बाँध हाथ जोड़कर कहा, हे राग! राग तुम निरागता और निर्दोषता को प्राप्त हो। तुम्हारे साथ मैंने चिरपर्यन्त विवेक से रहित क्रीड़ा की है। तुम अब जाओ, मेरा तुमको नमस्कार हैं। हे भोग! तुम्हारी लालसा से मुझको परमपद का विस्मरण हो गया था। जैसे माता सुख के निमित्त पुत्र की लालसा करती है तैसे ही मैं सुख जानकर तुम्हारी लालसा करता था। अब तुम जाओ तुमको मेरा नमस्कार है। अब मैं निर्वाणपद को प्राप्त होता हूँ। हे दुःख! तुमको भी नमस्कार है। तेरे उपदेश से मैं आत्मपद को प्राप्त हुआ हूँ, क्योंकि मैं सदा भोग और सुख
उपशम प्रकरण । ७८७
चाहता था, और जब सुख प्राप्त होता था तब तुझको भी साथ ले आता था सुख से तेरी उत्पत्ति होती है, सुख की लालसा में तो मैं अनेक जन्म पाता रहा, पर जब सुख आवे तब तुझको भी साथ ले आवे । तुझको देखकर मुझको आत्मपद की इच्छा उपजी और तेरे प्रसाद से मैं परम शीतल पद को प्राप्त हुआ हूँ । हे दुःख ! तू तो दुःख था परन्तु मुझको आत्मपद प्राप्त किया इससे तेरा कल्याण हो । तू अब जा । हे मित्र ! संसार में जीना असार है, जिसका संयोग होता है उसका वियोग भी होता है । तूने मेरे साथ बड़ा उपकार किया कि अपना नाश किया और मुझको सुख प्राप्त किया क्योंकि जब तू मुझको प्राप्त न था तो मैं आत्मपद के निमित्त कब यत्न करता था । तूने अपना नाश करना माना परन्तु मुझको सुख प्राप्त किया । हे मित्र ! तू बांधवों की नाईं चिरकाल पर्यन्त मेरे साथ रहा और कदाचित् मुझसे दूर न हुआ मैंने तेरा नाश नहीं किया पर तूने अपना नाश आप ही किया है । तू मुझको जब प्राप्त हुआ था तब मुझको विवेक उत्पन्न हुआ, उस विवेक ने तेरा नाश किया है इससे तुझको मेरा नमस्कार है । और हे माता ! तृष्णा ! तुझको भी नमस्कार है । तू सदा मेरे साथ रही है और कदाचित् त्याग नहीं किया । जैसे अपने बालक का त्याग माता नहीं करती तैसे ही तूने मेरा त्याग नहीं किया । अब तू जा । हे कामदेव ! तुझने आपही विपर्यय होकर अपना नाश किया । जब तू बहिर्मुख था तब जीता था और जब अन्तर्मुख हुआ तब तू मिट गया । तुझको नमस्कार है । हे सुकृतो ! तुमको नमस्कार है । तुमने भी बड़ा उपकार किया कि नरकों से निकालकर स्वर्गों में डाला, परन्तु अन्त में सबका वियोग होना है इससे तुम भी जाओ । हे दुष्कृतो ! तुम भी जाओ । विकर्मरूपी तुम्हारा क्षेत्र है और युवा अवस्था बीज है उससे दुःख फल होता है तुम्हारे साथ भी संयोग हुआ था इससे तुमको भी नमस्कार है, तुम भी जाओ । हे मोह ! तुमको भी नमस्कार है, तुझसे चिरकाल मैं बँधा था और नाना प्रकार के स्थानों को प्राप्त होता था और तू भय दिखाता था उससे मैं भय पाता था । इससे तुझको
¹ अनिर्विण्णमभाकान्तं पन्निंतरङ्गित गिरः गाधाणि निथिलायन्ते सुष्णे आतकणा० ते ॥१॥
७८८ | योगवाशिष्ट ।
नमस्कार है, अब तू जा । हे गिरिकन्दरा ! तुझको भी नमस्कार है । तुममें मैंने चिरकाल तप किया है । हे बुद्धि ! हे विवेक ! तुमको भी नमस्कार है । तुमने मेरे साथ उपकार किया है कि संसारबन्धन से मुक्त किया । तुम भी जाओ । दण्ड और तूँवा । तुमको भी नमस्कार है । तुम भी जाओ । बहुत काल तुम भी मेरे सम्बन्धी रहे हो । हे देह ! रक्तमांस का पिंजर होकर तू मेरे साथ बहुत काल रही है और तूने उपकार किया है । विवेक उप-जाने का स्थान तू ही है, तेरे संयोग से मैंने परमपद पाया है तू भी अब जा, तुझको नमस्कार है । हे संसार के व्यवहारो ! तुमको भी नमस्कार है, तुम्हारे में मैंने बहुत क्रिया की है । ऐसा पदार्थ जगत् में कोई नहीं जिसमें मैंने व्यवहार न किया हो, ऐसा कर्म कोई नहीं जो मैंने न किया होगा और ऐसा देश कोई नहीं जो देखा न होगा । अब सबको नमस्कार है । हे इन्द्रियों, प्राण और मनादिक ! तुमको नमस्कार है ! तुम्हारा हमारा चिरकाल संयोग था अब वियोग हुआ, क्योंकि जिसका संयोग होता है उसका वियोग भी होता है । इससे तुम्हारा हमारा भी वियोग होता है । नेत्रों की ज्योति सूर्यमण्डल में जा लीन होगी, घ्राणों की गन्ध पृथ्वी में लीन होगी और प्राण त्वचा पवन में, श्रवण आकाश में, मन चन्द्रमा में और जिह्वा रस में लीन होगी । इसी प्रकार सब अपने-अपने अंश में लीन होंगे । जैसे लकड़ियों के जले से अग्नि शान्त हो जाती है, शरत्काल में मेघ शान्त हो जाता है, तेल से रहित दीपक निर्वाण हो जाता है और सूर्य के अस्त हुए प्रकाश शान्त हो जाता है तैसे ही मनादिक शान्त हो जावेंगे । हे रामजी ! ऐसे विचार करते करते उसका मन सर्वकार्य से रहित हो प्रणव के ध्यान में लगा और सर्व-दृश्य से शान्त और मोहरूपी मल को त्यागकर प्रणव के विचार में लगा ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उपशमप्रकरणे द्वयशीतितमसर्गः ॥२॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार उसने शब्दब्रह्म प्रणव का उच्चार किया और पञ्चम भूमिका जो चित्त की अवस्था है उसको प्राप्त हुआ । भीतर-बाहर के स्थूल-सूक्ष्म पदार्थों और त्रिलोकी के सब संकल्पों को त्यागकर वह अछोभरूप स्थित हुआ जैसे चिन्तामणि अपने प्रकाश
उपशम प्रकरण । ७८६
में स्थित होती है, जैसे पूर्णमासी का चन्द्रमा अपने आपमें स्थित होता है, जैसे मन्दराचल के निकलने से क्षीरसमुद्र स्थित होता है और मथने से रहित मन्दराचल स्थित होता है जैसे कुम्हार का चक्र फिरता फिरता ठहर जाता है जैसे सूर्य के अस्त हुए जीवों की व्यवहार क्रिया ठहर जाती है, जैसे मेघ से रहित शरत्काल का आकाश निर्मल होता है और प्रकाश तन से रहित होता है, तैसे ही फुरने से रहित उसका मन शान्ति को प्राप्त हुआ । प्रणव का ध्यान करके फिर उस वृत्ति के अन्त को प्राप्त हुआ और फिरमन्त्र को भी त्याग--जैसे महापुरुष क्रोध को त्यागते हैं तैसे ही वृत्ति को त्यागा । फिर तेज का प्रकाश उदय हुआ उसको भी निमेष में त्यागा । आगे न तेज है, न तम है उसमें अभाववृत्ति रहती है उसको भी निमेष में त्यागा, तब जैसे नूतन बालक की जन्म से पदार्थज्ञान से रहित अवस्था होती है तैसे ही अवस्था प्राप्त हुई । तब जो सत्तामात्र आत्मतत्त्व सुषुप्तिपद है उसका आश्रय किया और महाचल जो सुमेरु की नाई स्थिर अवस्था है उसको प्राप्त हुआ । फिर केवल अचेतन चिन्मात्र तुरीया निरानन्द आनन्दपद में जिसमें स्वरूप से भिन्न और आनन्द नहीं प्राप्त हुआ । वह असत् और सतरूप है । सर्वक्रिया से अतीत है, इस कारण असत् है और अनुभवरूप है इस कारण सत्यरूप है ! ऐसे अशब्दपद को वह प्राप्त हुआ जो परमशुद्ध पावन और सर्वभाव के भीतर प्राप्त है और सर्वभाव शब्द से रहित है । जिसको शून्यवादी-शून्य, ब्रह्मवादी-ब्रह्म, विज्ञानवादी-विज्ञान, सांख्य मतवालेपुरुष-ईश्वर शैवा-शिव, वैष्णव-विष्णु, शक्ति-परमशक्ति, कालवादी-काल, आत्मवादी-आत्मा और माध्यमिक-माध्यम इत्यादिक जो शास्त्रोंवाले कहते हैं सो एक परब्रह्म को ही कहते हैं, जो सर्वदा, सर्वकला, सर्वप्रकार, सर्व में सर्वरूप है । ऐसे सर्वात्मा को वह मुनीश्वर प्राप्त हुआ । जिस आनन्दसमुद्र के बल से सबको आनन्द होता है ऐसे आत्मतत्त्व अनुभवरूप अपने आनन्द को वह प्राप्त हुआ और वही रूप हो गया । जो अन्य और निरन्व, निरञ्जन, सर्व, असर्व, अजर-अमर सबके आदि सकलङ्क-निष्कलङ्क
७६० योगवाशिष्ठ ।
है ऐसे आकाश से निर्मल पद को वीतहव मुनीश्वर प्राप्त हुआ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे वीतहवनिर्वाणयोगोपदेशो नाम त्र्यशीतितमसर्गः ॥ ८३ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! दुःखरूप संसारसमुद्र के पार हो वीतहव मुनीश्वर उस परमपद को प्राप्त हुआ जिस पद के प्राप्त हुए जीव फिर जन्ममरण को नहीं पाता और जिस पद में स्थित हुआ परमशान्त उपशम आनन्द को प्राप्त होता है—जैसे समुद्र में पड़ी हुई बुन्द समुद्र हो जाती है तैसे ही ब्रह्मसमुद्र में वह ब्रह्म हो गया और शरीर जो था वह विरस होकर गिर पड़ा जैसे शीतकाल में वृक्षों के सूखे पत्र गिर पड़ते हैं। शरीररूपी वृक्ष में हृदयरूपी आलय था और उसमें प्राणरूपी पक्षी रहता था सो चिदाकाश में प्राप्त हुआ जैसे गोफन से पत्थर धावता है तैसे ही जो प्राप्त हुआ और अपने स्वरूप में स्थित हुआ। हे रामजी ! यह मैंने वीतहव की कथा तुमको सुनाई है सो अनन्त विचारकर युक्त है। इस प्रकार विचारकर वीतहव विश्रामवान् हुआ है। तुम भी उसको विचारकर सिद्धता के सार को प्राप्त हो और दृश्य की चिन्तना को त्याग के सावधान हो। हे रामजी ! जो कुछ मैंने तुझसे पूर्व कहा है कि उस पद में प्राप्त हुआ फिर कुछ पाने योग्य नहीं रहता और अब जो कुछ कहता हूँ और जो कुछ पीछे कहूँगा उसको विचारो। मुक्तिज्ञान ही से होती है और ज्ञान ही से सब दुःख नष्ट होते हैं, ज्ञान ही से अज्ञान निवृत्ति होता और ज्ञान ही से परम सिद्धता को प्राप्त होता है। पाने योग्य यही वस्तु है, और कोई दुःखों का नाश नहीं कर सकता। यह निश्चय है कि ज्ञान से सब फाँसी कट जाती है और ज्ञान ही से वीतहव ने मन को चूर्ण किया। हे रामजी ! वीतहव की संवित् जगत् के अतीत हो गई। जो कुछ दुःख है वह मन से होता है और मन के उपशम हुए सब जगत् अनुभवरूप हो जाता है। वीतहव भी मनोमात्र था, मैं भी मनोमात्र हूँ, तू भी मनोमात्र है और पृथ्वी आदि जगत् भी सब मनोमात्र है, मन से भिन्न कुछ नहीं। जहाँ मन होता है वहाँ जगत् होता है, मन ही जगत्रूप है और जगत् ही मनरूप है। जो ज्ञानवान् पुरुष है वह मन की दशा को त्याग के केवल चिदानन्द आत्म-
उपशम प्रकरण । ७६१
तत्त्व में स्थित होता है और रागद्वेष आदि विकार उसके मिट जाते हैं।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे वीतहव्यविश्रान्तिसमाप्ति-
र्नाम चतुरशीतितमसर्गः ॥ ८४ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! वीतहव की नाईं विदितवेद होकर तुम भी रागद्वेष से रहित स्थित हो । जैसे तीस सहस्र वर्ष वीतहव्य वीतशोक और जीवन्मुक्त होकर विचरा है तैसे ही तुम भी विचरो । और भी बोध-वान् राजा और मुनीश्वर हुए हैं, जैसे वे उस पद में प्राप्त हुए राज्यादिक व्यवहार में रहे हैं तैसे ही तुम भी जीवन्मुक्त होकर रहो । हे रामजी ! सुख दुःख कर्म आत्मा को स्पर्श नहीं करते, आत्मा सर्वज्ञ है, तुम किस निमित्त शोक करते हो ? बहुत विदितवेद पृथ्वी में विचरते हैं परन्तु शोक को कदाचित नहीं प्राप्त होते—जैसे तुम अब शोक नहीं करते हो । हे रामजी ! तुम अब स्वस्थ उदार शम और सर्वज्ञ हो, अब तुमको फिर जन्म न होगा । जीवन्मुक्त पुरुष जो अपने स्वरूप में स्थित है वह हर्ष-शोक को प्राप्त नहीं होता । जैसे सिंह वानर और शृगाल आदिक के वश नहीं होता है तैसे ही जीवन्मुक्त विकारों से रहित होता है । रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! इस प्रसंग में मुझको संदेह हुआ है उसको जैसे शरत्काल में मेघ नष्ट हो जाता है तैसे ही नाश करो । हे तत्त्ववेत्ताओं में श्रेष्ठ ! जीवन्मुक्त के शरीर में शक्ति क्यों नहीं दृष्टि आती कि आकाश में उड़ता फिरे और सूक्ष्म रूप से और शरीर में प्रवेश कर जावे इत्यादिक ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! आकाशगमनादिक जो सिद्धि हैं सो तपादिक कर्मों की शक्ति हैं । जो कुछ जगत् विचित्र दिखाई देना और फिर गुप्त हो जाना इत्यादिक हैं वे वस्तु द्रव्य, क्रिया के स्वभाव हैं, आत्मज्ञान के नहीं । हे रामजी ! कोई द्रव्य, क्रिया और काल को यथा-क्रम साधता है उसको ही शक्ति प्राप्त होती है और ज्ञानी साधे अथवा अज्ञानी साधे उसको शक्ति प्राप्त होती है परन्तु वह शक्ति आत्मज्ञान का फल नहीं । आत्मज्ञानी को आत्मज्ञान की ही सिद्धता होती है, वह आत्मा से ही तृप्त होता है और सिद्धि जो अविद्यारूप हैं उनकी ओर नहीं धावता । जो कुछ जगत् है वह उसने अविद्यारूप जाना है इससे
७६२ | योगवाशिष्ठ ।
वह पदार्थों में नहीं डूबता। जो अज्ञानी है वह सिद्धता के निमित्त इन पदार्थों को साधता है और जो ज्ञानवान् है वह इन पदार्थों के वास्ते यत्न नहीं करता। यत्न करने से ज्ञानी हो अथवा अज्ञानी हो इन्द्रादिकों के ऐश्वर्य को पाता है। और वह ज्ञान की शक्ति नहीं, द्रव्य आदि की शक्ति है सो अविद्यारूप है। अज्ञानी इनकी ओर धावते हैं ज्ञानवान् नहीं धावते, क्योंकि वे सबसे अतीत हैं। जिसने सब इच्छा का त्याग किया है और आत्मपद में संतोष पाया है वह इनकी इच्छा नहीं करते। इनकी इच्छा भोगों अथवा बड़ाई के निमित्त होती है अथवा मान और जीने और सिद्धि के निमित्त होती है। अज्ञानी को भोगों की सिद्धता की और मान की इच्छा नहीं होती, क्योंकि ये सब अनात्म धर्म हैं और वह नित्यतृप्त, परमशान्तरूप, वीतराग, निर्वासनिक पुरुष है और आकाश की नाईं सदा अपने आपमें स्थित हैं। जैसे सुख स्वाभाविक आता है तैसे ही दुःख भी स्वाभाविक आता है शरीर के सुख दुःख की अवस्था में वह चलायमान नहीं होता, नित्यतृप्त और असंग होता है और जीवन मरण की वृत्ति उसको नहीं फुरती सबमें सम रहता है। जैसे समुद्र में नदियाँ प्रवेश करती हैं और समुद्र अपनी मर्यादा में स्थित रहता है तैसे ही ज्ञानवान् को क्षोभ नहीं प्राप्त होता। हे रामजी ! जो कुछ ज्ञानवान् को प्राप्त होता है उसे वह आत्मा में अर्चन करता है, उसको करने में कुछ अर्थ नहीं और न करने में कुछ प्रत्यवाय है। उसको किसी का आश्रय नहीं, सदा अपने स्वरूप में स्थित है और यह मन्त्रसिद्धि कालकर्म से होता है। एक योगक्रिया ऐसी है कि उसके साधने से उड़ने की शक्ति हो आती है, एक मन्त्रों से शक्ति होती और एक गुटका मुख में रखने से उड़ने इत्यादिक की शक्ति होती है, शक्ति की नीति प्रथम ही हो रहती है। उससे अन्यथा नहीं होती। हे रामजी ! जैसी शक्ति जिस साधन से नियत हुई है उसको सदाशिव भी अन्यथा नहीं कर सकते, क्योंकि वह स्वाभाविक स्वतः सिद्ध है-जैसे चन्द्रमा में शीतलता और अग्नि में उष्णता है इत्यादिक आदि नीति है उसको कोई दूर नहीं कर सकता और सर्वज्ञ जो विष्णु भगवान् हैं वे भी अन्यथा नहीं कर
उपशम प्रकरण । ७६३
सकते। हे रामजी ! जिस द्रव्य में मारने की सत्ता है वह मारता है और मद्य में मत्त करने की शक्ति है तैसे ही द्रव्य योग, काल आदिक में सिद्धता शक्ति नियत हुई है। जैसे एक औषध में क्लेश करने की शक्ति है तो उसके खाने से क्लेश होता है तैसे ही इनमें अपनी-अपनी शक्ति है । जो इनको साधता है उसको ये प्राप्त होती हैं । आत्मज्ञानी जो उसको साधन करे तो वह कर्त्ता में भी अकर्त्ता है। आत्मज्ञान के पाने में सिद्धि कुछ उपकार नहीं कर सकती परन्तु जो इनकी वाञ्छा करे तो यत्न करके पाता है—यत्न बिना नहीं पाता । आत्मज्ञानी को इच्छा भी नहीं होती क्योंकि आत्मलाभ से उसकी सब इच्छाएँ शान्त हो जाती हैं। हे रामजी ! जितने लाभ हैं उनसे परम उत्तम आत्मलाभ है । आत्मा को पाकर फिर किसी की इच्छा नहीं होती । जैसे अमृत के पान किये और जल की इच्छा नहीं होती तैसे ही आत्मा के लाभ से और इच्छा नहीं होती । ऐसा आत्मलाभ जिसने पाया है उसको इन सिद्धियों की इच्छा कैसे हो ? जैसी-जैसी किसी की इच्छा होती है उसको वैसा ही प्राप्त होता है । ज्ञानी हो अथवा ज्ञान से रहित हो इच्छा और प्रयत्न के अनुसार ही प्राप्त होती है । यह जो वीतहव था उसको इच्छा कुछ न थी और प्रथम जो सूर्य के पास जाने की शक्ति दृष्टि आई थी सो क्रिया के साधने से थी, पीछे जब ज्ञान उपजा तब इच्छा कुछ न रही । हे रामजी ! जो कुछ किसी को फल प्राप्त होता है सो अपने प्रयत्न से प्राप्त होता है । जो ज्ञानवान् है वह सदा तृप्त रहता है उसको इष्ट-अनिष्ट की इच्छा कुछ नहीं फुरती । फिर रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! तीन सौ वर्ष वीतहव्य मुनीश्वर समाधि में रहा तो उसका शरीर पृथ्वी में पृथ्वी क्यों न हो गया और सिंह, भेड़िये, सियार आदिक उसको क्यों न भोजन कर गये ? पीछे विदेह-मुक्त हुआ, प्रथम क्यों न हुआ ? पृथ्वी में दबे हुए शरीर को निकालने के निमित्त बड़ा यत्न क्यों किया, इन संशयों को निवारण करो !
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! संवित् वासना के साथ बँधी हुई सुख दुःख को भोगती है और मलीनभाव से घिरी हुई है, जो वासना से रहित शुद्ध सत्तारूप है और जो सुख दुःख के भोग से रहित है और किसी
७६४ योगवाशिष्ठ ।
कारण छेदी नहीं जाती । हे रामजी ! जिस-जिस पदार्थ में चित्त लगता है वही-वही पदार्थ स्वरूप में भासते हैं, यह पदार्थ की शक्ति है । जैसी पदार्थों में शक्ति होती है तैसे ही भासती है, इस कारण बहुत वर्ष व्यतीत होते हैं तो भी समाधि के बल से उसका शरीर ज्यों का त्यों रहता है, क्योंकि चित्त जिस पदार्थ में लगता है उसका रूप हो जाता है । जैसे मित्र को मित्रभाव से देखता है तो स्वाभाविक ही प्रसन्न होता है और शत्रु को देखकर चित्त में स्वाभाविक ही अप्रसन्नता फुर आती है, मीठी वस्तु को देखकर चित्त स्वाभाविक ही लोलुप हो जाता है और कटुक में विरसता को प्राप्त होता है, मार्ग चलनेवाले का चित्त मार्ग के पर्वत और वृक्षों के राग से बन्धायमान नहीं होता, चन्द्रमा के निकट गये से शीतलता होती है और सूर्य के निकट उष्णता प्राप्त होती है सो पदार्थ की शक्ति है । जिस पदार्थ के साथ वृत्ति का स्पर्श होता है उसका स्वाभाविक आरम्भ सफल होता है । तैसे ही योगी जब देह और इन्द्रियों की वासना और ममत्वभाव को त्याग करके समभाव में प्राप्त होता है तब उसको समभाव का अनुभव होता है अर्थात् सबमें एक ही भासता है । इस कारण शरीर को सिंहादिक कोई भोजन नहीं कर सकते और जो जीव उसके घात करने को आते हैं वे हिंसाभाव को त्याग अहिंसक हो जाते हैं । वीतव का शरीर जो छेद को न प्राप्त हुआ और न पृथ्वी में पृथ्वी हो गया उसका यह कारण है कि सर्वत्र समता आकाश एक ही स्थित है और काष्ठ, लोष्ट, पत्थर ब्रह्मादि तृणपर्यन्त सबमें एक अनुस्यूत है, जहाँ पुर्यष्टका होती है वहाँ भासता है और जहाँ पुर्यष्टका नहीं होती वहाँ नहीं भासता, जैसे सूर्य का प्रतिबिम्ब सब ठौर में पूर्ण है परन्तु जहाँ स्वच्छ ठौर, दर्पण, जल आदि होते हैं वहाँ भासता है और जहाँ उज्ज्वल ठौर नहीं होता वहाँ प्रतिबिम्ब नहीं भासता तैसे ही जहाँ पुर्यष्टका है वहाँ संवित् भासती है, अन्यथा नहीं भासती । इस कारण वीतव की संवित् जो समभाव में स्थित है उसको किसी तत्त्व और जीव का क्षोभ नहीं होता । पंचतत्त्वों का क्षोभ तब होता है जब प्राण फुरते हैं और जब प्राण फुरने में गदित होते हैं तब तत्त्वों का क्षोभ
उपशम प्रकरण । ७६५
नहीं होता, वीतहव की प्राणों के भीतर और बाहर की स्पन्दकला शान्त हो गई थी और प्राण और चित्तकला दोनों फुरने से रहित थीं, इससे उसका हृदय भी क्षोभित न हुआ । हे रामजी ! देहरूपीगृह में जब चित्त और वायु का स्पन्द शान्त हो जाता है तब शरीर नष्ट हो जाता है और सब सुमेरु की नाईं स्थित हो जाता है, तब किसी की सामर्थ्य नहीं होती कि इसको क्षोभ करे और नाश करे । योगीश्वर का चित्त और प्राण निस्पन्द हो जाते हैं । वह इनको वश करके लगाता है तब उसको न तत्त्वों का क्षोभ होता है, न पित्त, कफ का क्षोभ होता है और न और कुछ क्षोभ होता है । इस कारण योगी का शरीर सहस्र वर्ष पर्यन्त भी ज्यों का त्यों रहता है, नष्ट नहीं होता । जैसे वज्र को कोई चूर्ण नहीं कर सकता तैसे ही उसके शरीर को कोई नष्ट नहीं कर सकता—सब की शक्ति उसपर कुण्ठित हो जाती है । इस कारण वीतहव का शरीर ज्यों का त्यों रहा । पहले वह विदेहमुक्त क्यों न हुआ सो भी सुनो । हे रामजी ! जो तत्त्वज्ञ और विदितवेद, वीतराग महाबुद्धिमान हैं जिनकी अभिमानरूपी गाँठि टूट पड़ी है वे पुरुष स्वतन्त्र स्थित होते हैं, उनका न कोई प्रारब्धकर्म है, न संचितकर्म है और न वर्त्तमान का कर्म है । तत्त्ववेत्ता सबसे मुक्त, स्वतन्त्र और स्वेच्छित बिचरता है और जैसी इच्छा करे तैसी शीघ्र ही होती है । हे रामजी ! वीतहव को जब अकस्मात् से जीने का स्पन्द फुर आया तब वह कुछ काल जीता रहा और जब उसकी संवित् में विदेहमुक्त होने का स्पन्द फुरा तब विदेहमुक्त हो गया । ज्ञानवानों की स्थिति स्वाभाविक स्वतन्त्र होती है, जिसकी वे वाञ्छा करते हैं सो तत्काल ही हो जाता है, और मन आत्मपद में स्थित होता है, उनको कुछ कृत और कर्तव्य नहीं ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे सिद्धिलाभविचारो नाम पञ्चाशीतितमसर्गः ॥ ८५ ॥
रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! आपने कहा कि जब विचार से वीतहव का चित्त शान्त हो गया तब उसको मैत्री, करुणादिक गुण प्राप्त हुए, परन्तु जब विवेक से उसका चित्त नष्ट हो गया तो फिर मैत्री आदिक
७६६ | योगवाशिष्ठ ।
गुण कहाँ आन प्राप्त हुए ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! चित्त का नाश दो प्रकार का है। जीवन्मुक्त का चित्त अचित्तरूप हो जाता है और विदेह-मुक्त का चित्त स्वरूप से नष्ट हो जाता है। जैसे भुना दाना होता है तैसे ही जीवन्मुक्त का चित्त देखने में चित्तरूप है सार्थक नहीं और जैसे दाना नष्ट हो जावे तैसे ही विदेहमुक्त का चित्त देखनेमात्र भी नहीं रहता। हे रामजी ! चित्त की सत्यता ही दुःखों का कारण है और चित्त की असत्यता ही सुखों का कारण है। जिस चित्त में विषयों की वासना फुरती है सो चित्त जन्मों का देनेवाला है और दुःखों का कारण है। गुणों के संग से अहंमम भाव में रहता है और चित्त की सत्यता से जीव कहाता है। हे रामजी ! जब तक चित्त विद्यमान है तब तक अनन्त दुःख होता है। दुःखरूपी वृक्ष का बीज चित्त ही है। जब चित्त नष्ट होता है तब कल्याण होता है। रामजी ने पूछा, हे ब्राह्मण ! मन किसका नाम है ? कैसे नष्ट होता है और कैसे अस्त होता है सो कहिये ? वशिष्ठजी ने कहा, हे प्रश्नकर्त्ताओं में श्रेष्ठ ! चित्तसत्ता का लक्षण मैंने तुमसे कहा है, अब चित्त मृतक का लक्षण सुनो। जिसको सुख और दुःख की दशा स्वरूप से चला नहीं सकती। जैसे सुमेरु को पवन चला नहीं सकता तैसे ही जिसके चित्त को दुःख चला नहीं सकता तिसका चित्त मृतक जानो, अर्थात् जो चित्त सत्पद को प्राप्त हुआ है उस चित्त से मिथ्या चिन्ता नष्ट हो जाती है। जैसे भुने दाने में अंकुर नष्ट हो जाता है तैसे ही उसका चित्त नष्ट हो जाता है। जिसको आत्मा से भिन्न कुछ नहीं फुरता वह चित्त मृतक हुआ है। हे रामजी ! जिसके चित्त को अहं इच्छा द्वेषादिक विकार तुच्छ न कर सके उसका चित्त मृतक जानो और जिसको इन्द्रियों के विषय इष्ट-अनिष्ट न कर सके और रागद्वेष और ग्रहण त्याग की द्वैतभावना न उपजे ज्यों का त्यों रहे उसी पुरुष का चित्त मृतक जानो। जिसका चित्त नष्ट हुआ है उसे जीवन्मुक्त जानो। जिसको संसार के इष्ट पदार्थों में राग होता है वह ग्रहण की इच्छा करता है और अनिष्ट की प्राप्ति में द्वेष करके त्यागने की इच्छा करता है। अहंममभावसंयुक्त देह में जो अभिमान है इससे आपको सुखी दुःखी मानता है यदि वासना संयुक्त है सो चित्त जीता है—यह चित्त-
उपशम प्रकरण । ७६७
सत्यता है जब चित्त संसार से विरक्त हो और सत्संग और सत्शास्त्रों का श्रवण और मनन और स्वरूप का अभ्यास करे तब चित्त अचित्त हो जाता है और परमानन्द की प्राप्ति होती है और तभी जीवन्मुक्त होकर विचरता है । जिस प्रकार मैत्री आदिक गुण जीवन्मुक्त में होते हैं सो भी सुनो । हे रामजी ! चित्त में जो संसार की सत्यतारूपी मैल है यही चित्त-भाव है । वह जब आत्मज्ञान से नष्ट हो जाता है तब मैत्री आदिक गुण आन प्राप्त होते हैं । जैसे सूर्य के उदय हुए तम नष्ट जाता है और प्रकाश उदय होता है और जैसे भूने दाने का अंकुर जल जाता है तैसे ही ज्ञान से चित्त का चित्तत्वभाव नष्ट हो जाता है और मैत्री आदिक गुण उदय होते हैं । तब देखनेमात्र चित्त दीखता है ब्रह्मवेत्ता अज्ञानी की नाईं यत्न करता भासता है परन्तु अज्ञानी का चित्त जन्म का कारण है ज्ञानी का चित्त जन्म का कारण नहीं। जैसे कच्चा दाना उगता है, भुना नहीं उगता, तैसे ही अज्ञानी जन्मता है, ज्ञानी नहीं जन्मता । जैसे चन्द्रमा राहु से छूटता तब चित्त में मैत्री, करुणा आदिक गुण उदय होते हैं और जैसे वसन्तऋतु के आये बेलें सब प्रफुल्लित हो जाती हैं तैसे ही चित्तभाव मिटे से मैत्री आदिक गुण स्वाभाविक फुरते हैं। जो विदेहमुक्त होता है उसका चित्त स्वरूप से भी नष्ट हो जाता है और वहाँ गुण कोई नहीं रहता वह अवस्था और कोई नहीं जानता, विदेहमुक्त ही जानता है । उसमें द्वैतकल्पना कुछ नहीं फुरती और निर्मल पावन पद है । हे रामजी ! जीवन्मुक्त का चित्त स्वरूप में अचित्त होकर रहता है और विदेहमुक्त में चित्त स्वरूप से नष्ट हो जाता है इस कारण जीवन्मुक्त में मैत्री आदिक गुण पाये जाते हैं । आत्मा जो निर्मल और निष्कङ्क है सो चित्त के नष्ट हुए विदेहमुक्त में रहता है, उसमें गुणों की कल्पना कोई नहीं फुरती वह परमपावन निर्मल पद में स्थित होता है और शान्ति आदिक गुण भी नष्ट हो जाते हैं, क्योंकि चित्त स्वरूप से नष्ट हो जाता है । चित्त के नष्ट हुए चित्त की अवस्था कहाँ रही । तब न कोई गुण रहता है न अवगुण रहता है, न वह गुणों से उत्पन्न हुआ सार कहाता है और न अवगुणों से उत्पन्न हुआ असार कहाता है, न लोलुप
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है, न लक्ष्मी है, न अलक्ष्मी है, न उदय है न अस्त है, न हर्ष है, न शोक है, न तेज है, न तम है, न दिन है, न रात्रि है, न संध्या है, न दिशा है, न आकाश है, न अर्थ है, न अनर्थ है, न वासना है, न अवासना है, न अञ्जन है, न निरञ्जन है, न सत्य है, न असत्य है, न चन्द्रमा है, न तारे हैं और न सूर्य है ऐसा जो सर्वकल्पना से रहित शरत्काल के आकाश की नाईं निर्मल और बुद्धि से परे पद है उसमें और की गम नहीं। जैसे आकाश के स्थान को पवन जानता है तैसे ही उसकी अवस्था को वही जाने। वहाँ स्थित हुए सब दुःख शान्त हो जाते हैं और ब्रह्मानन्द में लीन हो जाता है। ज्ञानवान् आकाश की नाईं निर्मलपद को प्राप्त होता है जिसके पाये से और पाना कुछ नहीं रहता।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे ज्ञानावविचारो नाम षडशीतितमस्सर्गः ॥ ८६ ॥
रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! परमाकाश के कोश में एक पहाड़ है उस पर जगतरूपी एक वृक्ष है, तारे उसके फूल हैं, मेघ पत्र हैं, सूर्य, चन्द्रमा स्कन्ध है और देवता, दैत्य, मनुष्यादिक सब जीव उस पर पखेरू हैं। सातों समुद्र उस पहाड़ पर बावलियाँ हैं और अनन्त नदियाँ उसमें प्रवेश करती हैं। चतुर्दश प्रकार के भूतजात उसमें उत्पन्न होते हैं और सुखदुःखरूपी फलों से पूर्ण है, और मोहरूपी जल से वह सींचा जाता है सो दृढ़ होकर स्थित हुआ है। उसका बीज कौन है ? बोध की वृद्धि के निमित्त यह ज्ञानरूपी सार मुझसे संक्षेप से कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस संसार का बड़ा बीज चित्त (अहंता) है, जिसके भीतर आरम्भ की घनता है। जब शुभ अशुभ का आरम्भ शरीर का अंकुर होता है तब शुभ अशुभ करता है, इससे संसार का बीज चित्त ही है, और शरीर का बीज भी चित्त ही है, राजस, सात्त्विक और तामस वृत्ति उसकी टहनियाँ हैं। वही जन्ममरण का भंडार है और सुखदुःखरूपी रत्नों का डब्बा है। ऐसा जो चित्त है वह इस शरीर का कारण है। हे रामजी ! जो कुछ जगज्जाल दृष्टि आता है वह सब असद्रूप है। चित्त के फुरने से नाना प्रकार के आडम्बर भासते हैं। जैसे गन्धर्वनगर नाना प्रकार के आरम्भ सहित भ्रम
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से भासता है और संकल्पपुर भासता है सो असत् है तैसे ही यह जगत् असत् है। जैसे मृत्तिका में घटभाव होता है तैसे चित्त में जगत् का सद्भाव होता है। चित्तरूपी अंकुर के वृत्तिरूपी दो टास होते हैं—एक प्राणों का फुरना और दूसरा दृढ़भावना। जब प्राणस्पन्द होता है और हृदयमात्र में जो एकसौ एक नाड़ी हैं उनकी ओर संवेदनरूप चित्त उदय होता है तब प्राणस्पन्द फुरता है। जब प्राण फुरता है तब शुद्ध सात्त्विक चित्त उपजता है और उसमें जगत् भासता है। जैसे आकाश में नीलता भासती है तैसे ही प्राणों में नीलता भासती है। जब प्राणस्पन्द होता है तब चित्तसंवित् उछलती है—जैसे हाथ से ताड़ना किया गेंद उछलता है। जैसे प्राणस्पन्द में सर्वगत संवित् उपलब्धरूप होती है और वहाँ प्रतिबिम्बरूप होकर सात्त्विकभाग में स्थित होती है और महासूक्ष्म से सूक्ष्म है—जैसे वायु में गन्ध रहती है। वही संवित्रूप को त्यागकर जब बहिर्मुख धावती है तब उससे नाना प्रकार के जगत् भासते हैं और नाना प्रकार की वासना उठती हैं और उनसे अनेक दुःखों को प्राप्त होता है। इससे हे रामजी ! संवित् को अन्तर्मुख रोकना ही कल्याण का कारण है। जब संवित् स्वरूप में स्थित होती है तब क्षोभ मिट जाता है और जब शुद्ध संवित् में अहं उल्लेख फुरता है तब वेदनरूप होती है सो ही चित्त है, चित्त से अनेक दुःख होते हैं और चित्त का अनर्थ का होना कारण है। जब चित्त न उपजे तब शान्ति हो जाती है और चित्त तब निवृत्त होता है जब प्राणस्पन्द रोकिये अथवा वासना नष्ट हो ध्यान और प्राणायाम से योगीश्वर प्राणों को रोकता है तब चित्त स्थित हो जाता है। यह योग से अनुभव करता है। ज्ञान से जो अनुभव होता है सो भी सुनो। हे रामजी ! चित्त वासना से उत्पन्न होता है और वासना विचार से रहित फुरती है जैसे बालकों को जन्म से ही स्तनों से दूध पीने की वृत्ति फुरती है तैसे ही अकस्मात् भावना की दृढ़ता से वासना फुर आती है। हे रामजी ! जिसमें पुरुष की तीव्र भावना होती है वही रूप पुरुष का होता है। स्वरूप के प्रमाद से जो भासित होता है उसमें दृढ़ प्रतीत हो जाती है तब उसकी भावना करता है और जगत् की वासना से मोह प्राप्त होता है
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स्वतः सिद्ध जो अनुभवरूप आत्मा है उसको जान नहीं सकता। वासना की प्रबलता से स्वरूप का त्याग करता है और भ्रान्तिरूप जगत् को सत्य देखता है—जैसे मद्य से मत्त को पदार्थ और के और भासते हैं तैसे ही मूर्खों को वासना के बल से जगत् के पदार्थ सत्य भासते हैं। हे रामजी ! असम्यक्ज्ञान से जीव दुःखी होता है, शान्ति को नहीं प्राप्त होता और मन की चिन्ता से जलता है। मन किसका नाम है सो सुनो। जो सम्यक्ज्ञान से अनात्मा में आत्मभावना हो और वस्तु आत्मा में अवस्तु अनात्मभावना हो उसका नाम मन है। वह मन ऐसे उत्पन्न होता है कि प्रथम चेतन संवित् में पदार्थों की चिन्तना होती है फिर तीव्र पदार्थों की दृढ़भावना होती है तब वही चेतन संवित् चित्त-रूप हो जाती है। उस चित्त में फिर जन्ममरणादिक विकार उपजते हैं और फिर किसी का ग्रहण और किसी का त्याग करता है। जब ग्रहण और त्याग का संकल्प हृदय से निवृत्त हो तब चित्त भी मृतक हो जावै। जब वासना नष्ट हो जाती है तब मन आत्मपद को प्राप्त होता है। मन का अमन होना ही परम उपशम का कारण है। हे रामजी ! जो कुछ जगत् के पदार्थ हैं उनकी अभावना कीजिये और सब अवस्तुभूत जगत् का त्याग कीजिये तब हृदय आकाश में चित्त शान्त होगा। हे रामजी ! चित्त का स्वरूप इतना है। जब पदार्थों से रस उठ जावे तब चित्त फिर नहीं उपजता। जबतक पदार्थों का रस फुरता है तबतक स्थल रहता है और असम्यक्ज्ञान से अनात्मा में जो आत्मभावना है ज्यों ज्यों यह दृढ़ होती है त्यों त्यों चित्तरूपी वृक्ष अनर्थ के निमित्त बढ़ता जाता है और ज्यों ज्यों अनात्मा से आत्मबुद्धि निवृत्त हो जाती है अर्थात् अव-स्तु में वस्तुबुद्धि नहीं होती त्यों त्यों चित्तरूपी वृक्ष क्षीण होता जाता है सो कल्याण के निमित्त है। जब चित्त यथार्थ देखता है तब चित्त अचित्त हो जाता है, सब आशा निवृत्त हो जाती है और परम शान्ति और शीतलता हृदय में स्थित होती है तब पदार्थों को ग्रहण भी करता है परन्तु हृदय से रागसंयुक्त वासना निवृत्त होती है तो उससे चित्त शान्ति की प्राप्त होता है। हेरामजी ! जीवन्मुक्त में भी चेष्टा दृष्टि आती है परन्तु जन्मका
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कारण नहीं होती क्योंकि मन में मन का सद्भाव नहीं होता है। जैसे नटुवा अभिमान से रहित अनेक प्रकार के स्वाँग धरता है तैसे ही वह अभिमान से रहित चेष्टा करता है और जैसे कुम्हार का चक्र भ्रमता भ्रमता तोड़ना से रहित हुआ शनैःशनैः स्थिर हो जाता है तैसे ही ज्ञानवान् का चित्त चेष्टा करता दृष्ट भी आता है परन्तु जन्म का कारण नहीं होता और प्रारब्धभोग समाप्त होता है तब स्वाभाविक ठहर जाता है। जैसे भुना बीज नहीं उगता तैसे ही राग से रहित ज्ञानी की चेष्टा जन्म का कारण नहीं होती, देखने मात्र ज्ञानी और अज्ञानी की चेष्टा तुल्य होती है। जैसे भुना और कच्चा बीज एक समान भासता है परन्तु कच्चा उगता है और भुना नहीं उगता तैसे ही ज्ञानी की चेष्टा जन्म का कारण नहीं होती क्योंकि उसका चित्त शान्त हो जाता है। हे रामजी! जिसकी चेष्टा अभिमान से रहित है वह जीवन्मुक्त कहाता है। उसका चित्त केवल चिन्मात्र को प्राप्त हुआ है और वह जब शरीर को त्यागता है तब अचित्तरूप चिदाकाश होता है। हे रामजी! चित्त के दो बीज हैं—एक प्राणों का फुरना और दूसरा वासना का फुरना। जब दोनों में एक का अभाव हो जाता है तब दोनों नष्ट हो जाते हैं—ये परस्पर कारणरूप हैं। जैसे ताल से मेघ जल पान करके फिर वर्षा से ताल को पुष्ट करता है सो परस्पर कारणरूप है, तैसे ही प्राणस्पन्द और वासना परस्पर कारणरूप हैं। जैसे बीज से अंकुर होते हैं और अंकुर से बीज होते हैं तैसे ही प्राणस्पन्द से वासना होती है और वासना से प्राणस्पन्द होता है। ये दोनों चित्त के कारण हैं। जैसे फूल बिना सुगन्ध नहीं और सुगन्ध बिना फूल नहीं होता तैसे ही वासना बिना प्राण नहीं होते और प्राण बिना वासना नहीं होती। हे रामजी! जब वासना फुरती है तब संवित् में क्षोभ होता है और वह प्राणों को जगाती है तब उससे जगत् उपजता है। जब हृदय में प्राणस्पन्द के धर्म होते हैं तब संवित् क्षोभवान् होता है और चित्त-रूपी बालक उपजता है। इस प्रकार वासना और प्राण दोनों चित्त के कारण हैं। जब दोनों में एक का नाश हो जावे तब दोनों नाश हो जावें और चित्त का भी नाश हो जावे। हे रामजी! चित्तरूपी एक वृक्ष
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है, सुखदुःखरूपी उसके स्कन्ध हैं, चिन्तारूपी फल है, कार्यरूपी पत्र हैं, वृत्तिरूपी बेल से वेष्टित हुआ है और रागद्वेषरूपी दो बगले उस पर आन बैठे हैं तृष्णारूपी काली सर्पिणी से वेष्टित है और इन्द्रियाँरूपी पक्षी उस पर आन बैठे हैं, इच्छादिक रोगों से पुष्ट होता है और अज्ञान इसका मूल है । जब अवासणारूपी खड्ग से शीघ्र ही काटा जाता है तब संसार की अभावना और स्वरूप की भावना से शीघ्र ही नष्ट हो जाता है । जैसे तीक्ष्ण पवन से पका हुआ फल वृक्ष से शीघ्र ही गिर पड़ता है तैसे ही आत्मभाव से फल गिर पड़ता है । हे रामजी ! चित्तरूपी आँधी ने सब दिशा मलीन करके प्रकाश को घेर लिया है और तृष्णारूपी तृण उसमें उड़ते हैं। शरीररूपी स्तम्भाकार बायगोला अज्ञानरूपी कुण्ड से उपजा हुआ बड़े क्षोभ को प्राप्त करता है । जब हृदय में प्रकाश हो तब तम को दूर करे और जब स्पन्द रोकिये तब धूलि शान्त हो जाती है । आत्मविचार से जब वासना रहित हो तब शरीररूपी धुआँ शान्त हो जावे । हे रामजी ! प्राणों के रोकने से शान्ति होती है और वासना के न उदय होने से चित्त स्थिर हो जाता है । प्राणस्पन्द और वासना का बीज संवेदन है, जब शुद्ध संवित्मात्र से संवेदन को त्याग करे तब वासना और प्राण दोनों न फुरैं । जैसे वृक्ष का बीज और मूल काट डालिये तो फिर नहीं उगता, तैसे ही इनका मूल संवेदन है । जब संवेदन का अभाव हो तब दोनों नहीं बनते । संवेदन का बीज आत्मसत्ता है, संवित्सत्ता से संवेदन प्रकट हुआ है उससे भिन्न नहीं । जैसे तिलों में तेल के सिवा और कुछ नहीं होता तैसे ही संवित्सत्ता के सिवा हृदय में और कुछ नहीं पाया जाता-वही संकल्प द्वारा संवेदन को देखता है । जैसे स्वप्न में मनुष्य अपनी मृत्यु देखता है और देशान्तर को प्राप्त होता है तैसे ही आत्मसत्ता संवेदनरूप होती है अर्थात् चिन्मात्र संवित् में संवेदन का उत्थान होता है कि 'अहं अस्मि' तब संवेदन जगत्जाल दिखाती है । अपना ही संवेदन उठकर आपको भ्रम दिलाता है—जैसे बालक को अपने संकल्प से उपजा वैताल सत्य भासता है और जैसे स्थाणु में पुरुष भासता है तैसे ही संवित् में संवेदन भासता है । हे रामजी ! असम्पक्ज्ञान से संवेदनरूप हो जाता
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हैं तो उसमें आत्मबुद्धि होती है और सम्यक्ज्ञान से लीन हो जाता है । जैसे रस्सी में असम्यक्ज्ञान से सर्प भासता है तैसे ही आत्मा में संवेदन भासता है । तीनों जगत् ब्रह्म संवित् रूप हैं, संवेदन भी कुछ भिन्न नहीं । जिनको यह निश्चय दृढ़ होता है उनको बुद्धेश्वर सम्यक्ज्ञानी कहते हैं । प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष जो जगत् है उसमें वस्तुबुद्धि त्याग करने से भी संसार के पार होता है और जो अवस्तुरूप जानकर न त्यागेगा तो जगत् बड़े विस्तार को पावेगा । हे रामजी ! संवेदन का जो उत्थान होता है सो बड़े दुःखों का देनेवाला है और संवेदन जो जड़वत् अजड़ है वह परम सुख सम्पदा का कारण है सो उत्थान से रहित आनन्दस्वरूप है । जिसको संवेदन उत्थान से रहित असंवेदन संवित् आत्मा की बुद्धि हुई है वह संसारसमुद्र से पार होता है । रामजी ने पूछा, हे प्रभो ! जड़ता से रहित असंवेदन कैसे होता है और असंवेदन से जड़ता कैसे निवृत्त होती है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जो सब ठौर में आसक्त नहीं होता और कहीं चित्त की वृत्ति नहीं लगती और जिसमें जीवत्व को कुछ ज्ञान न रहे वह असंवेदन जड़ता से रहित संवेदन स्पन्दरूप है जिससे दृश्य भासता है सो दृश्य की ओर से जड़ है और स्वरूप में चेतन है वह अजड़ कहलाता है । हे रामजी ! हृदयाकाश जो चेतन संवित् है उससे संवेदन का स्पर्श कुछ न हो ऐसा संवित् अजड़ है । देवता, नाग, दैत्य, राक्षस, हाथी, मनुष्य आदिक स्थावर जङ्गमरूप सब वही धारती है । हे रामजी ! अपनी चेष्टा से संवित् आपको आप ही बँधाती है । जैसे कुसवारी आप ही आपको गृह में बँधाती है तैसे ही संवित् आपको बँधाती है । जब अपनी ओर आती है तब आप ही आपको प्राप्त होती है । हे रामजी ! जगत् जाग्रत् रूपी समुद्र है उसमें संवित् रूपी जल है जिससे सब स्थान पूर्ण हो गये हैं । अन्तरिक्ष, पृथ्वी, आकाश, पर्वत, नदी आदिक सब संवित् रूपी जल की लहरें हैं इससे सब जगत् संवित् मात्र है और उसमें द्वैतकल्पना का अभाव है । यह सम्यक्ज्ञान है । इस संवित् का बीज चिन्मात्र है उसमें द्वैतकल्पना का अभाव है । यह सम्यक्ज्ञान है इस संवित् का बीज चिन्-मात्र है और चिन्मात्रसत्ता से संवित् उदय हुआ है—जैसे प्रकाश से ज्योति
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उदय होती है । इस सत्ता के दो रूप हैं-एक रूप नाना प्रकार हो भासता है और दूसरा एक ही रूप है । घट, पट, तत्त्व आदिक एक सत्ता के नाना प्रकार विभाग स्थित हैं और विभाग से रहित एक सत्ता स्थित है-वह सत्तासमान अद्वैतरूप परमार्थ है । हे रामजी ! विषय को त्यागकर जो चिन्मात्र है वह अलेप एक रूप है सो ही महासत्ता है । उसको ज्ञानवान् परमसत्ता कहते हैं । नाना आकार भी वह सत्ता कभी नहीं धारती । यह संवेदन से हुए हैं इस कारण अवस्तुरूप हैं । एक रूप जो परम सत्ता निर्मल अविनाशी है वह न कभी नष्ट होता है और न विस्मरण होता है, क्योंकि अनुभवरूप है । हे रामजी ! एक कालसत्ता है और एक आकाशसत्ता है सो यह सत्ता अवस्तुरूप है। इस विभागसत्ता को त्यागकर चिन्मात्रसत्ता के परायण हो । कालसत्ता और आकाशसत्ता यद्यपि उत्तम है परन्तु वास्तव नहीं । जहाँ नाना विभागकल्पना, आकार और नाना कारण हैं वह पवित्रकर्त्ता पावन नहीं । इसी से कहा है कि आकाश काल आदिक सत्ता वास्तव नहीं और सत्तासमान जो संवित्मात्र है वह सबका बीज है उसी से सबकी प्रवृत्ति होती है । हे रामजी ! जो कुछ पदार्थ हैं उनकी कलना सत्तासमान में हुई है । उस अनन्त, अनादि बीजरूप परमपद का बीज और कोई नहीं । जब उसका भान हो तब यह निर्विकार होकर स्थित हो । जीवन्मुक्त उसी को कहते हैं जिसे दृश्य की भावना कुछ न फुरे । जैसे बालक मूक और अभिमान से रहित होता है तैसे ही ज्ञान से जीव निर्वासनिक हो तब जड़ता से मुक्त होता है और सर्व आत्मभाव को प्राप्त होता है । जिस संवित् में दृश्य का स्पर्श होता है वह संवित् जड़ है, क्योंकि शुद्धस्वरूप में मलीन का स्पर्श होता है। जो संवित् द्वैत फुरने से रहित है वह शुद्ध और अजड़ है और द्वैतभाव को ग्रहण करती है वह स्वरूप की ओर से जड़ है । हे रामजी ! जिसकी स्वरूप की ओर स्थित हुई है और दृश्यभाव का लेप नहीं होता है वह सर्ववासना को त्यागकर निर्विकल्प समाधि में लगता है । जैसे आकाश में नीलता स्वाभाविक वर्तती है तैसे ही योगी आनन्द में वर्तती है और निस्संवेदन संवित् में प्रविष्ट होकर वही रूप हो जाता है जिसके मन की