योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
उपशम प्रकरण । ७६५
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! विवेकी पुरुष को जो भोग निकट आ प्राप्त होते हैं तो भी उनकी इच्छा नहीं करता, क्योंकि उसको उसमें अर्थबुद्धि नहीं—जैसे चित्र की लिखी हुई सुन्दर कमलिनी के निकट भँवरा आन प्राप्त होता है तो भी उसकी इच्छा नहीं करता । हे रामजी ! सुख दुःख की प्राप्ति और निवृत्ति में इच्छा तब तक होती है जब तक देहाभिमान होता है, जब देहाभिमान निवृत्त हुआ तब कुछ इच्छा नहीं होती । हे रामजी ! ममता करके दुःख होता है, जब रूप को नेत्र देखता है तब उसको इष्ट मानकर प्रसन्न होता है और अनिष्ट मानकर द्वेष करता है जैसे बैल भारवाहक की चेष्टा करता है उसको लाभ और हानि कुछ नहीं और जिसको उसमें ममत्व होता है वह लाभ-हानि का हर्ष शोक करता है, तैसे ही ममत्व से जीव इन्द्रियों के विषयों में हर्ष शोकवान् होता है । जैसे गर्दभ कीचड़ में डूबे और राजा शोक करे कि मेरे नगर का गर्दभ डूबा है, तैसे ही ममत्व करके इन्द्रियों के विषयों में जीव दुःख पाता है, नहीं तो गर्दभ कीचड़ में डूबे तो राजा का क्या नष्ट होता है । हे रामजी ! यह इन्द्रियाँ तो अपने विषयों को ग्रहण करती हैं और इनमें जीव तपायमान होता है सो ही आश्चर्य है । जिन विषयों की जीव चेष्टा और इच्छा करते हैं सो क्षण में नष्ट हो जाते हैं । हे रामजी ! जो मार्ग में किसी के साथ स्नेह हो जाता है तो ममत्व और प्यार से दुःख होता है । जो देह में ममत्व करेगा उसको दुःख क्यों न होगा ? चाहे कैसा ही बुद्धिमान् हो वा शूरमा हो तो भी संग से बन्धवान् होता ही है अर्थात् इन्द्रियों के विषयों का अहंमम भाव ग्रहण करेगा तो उनके नाश होने से वह भी नष्ट होवेगा । जिन नेत्रों का विषय रूप है सो नेत्र साक्षी होकर रूप को ग्रहण करता है और जीव ऐसा मूर्ख है कि औरों के धर्म आपमें मान लेता है और उनमें तपायमान होता है । जैसे भ्रम दृष्टि से आकाश में मोर पुच्छवत् तरुवरे और दूसरा चन्द्रमा भासता है, तैसे ही मूर्खता से जीव इन्द्रियों के धर्म अपने में मान लेता है । जैसे इन्द्रियों का साक्षी होकर जीव विषयों को ग्रहण करता है तैसे ही चित्त भी अभिमान से रहित साक्षी होकर ग्रहण करे तो रागद्वेष से तपायमान न हो जैसे जल
७६६ योगवाशिष्ठ ।
में चक्र तरङ्ग फुरते दृष्टि आते हैं तैसे ही इन्द्रियों में और इन्द्रियाँ फुर आती हैं, आधार आधेय से इनका सम्बन्ध होता है और चित्त इनके साथ मिलकर व्याकुल होता है । रूप, इन्द्रिय और मन इनका परस्पर भिन्न भाव है जैसे मुख, दर्पण और प्रतिबिम्ब भिन्न-भिन्न असंग हैं तैसे ही यह भी भिन्न-भिन्न असंग हैं परन्तु अज्ञान से मिले हुए भासते हैं । जैसे लाख से सोने, रूपे और चीनी का संयोग होता है तैसे ही अज्ञान से रूप अवलोक और मनस्कार का संयोग होता है । जब ज्ञान अग्नि से अज्ञान-रूपी लाख जल जावे तब परस्पर सब भिन्न-भिन्न हो जाते हैं और फिर किसी का दुःख सुख किसी को नहीं लगता । जैसे दो लकड़ी का संयोग लाख से होता है तैसे ही अज्ञान से विषय इन्द्रियों और मन का संयोग होता है और ज्ञानरूपी अग्नि से जब बिछुड़ जाते हैं तब फिर नहीं मिलते। जैसे माला के भिन्न-भिन्न दाने तागे में इकट्ठे होते हैं तैसे ही देह और इन्द्रियों में अज्ञान से मेल होते हैं और जब विचार करके तागा टूट पड़े तब भिन्न-भिन्न हो जावे फिर न मिले । हे रामजी ! जिन पुरुषों को आत्मविचार हुआ है वे ऐसे विचारते हैं कि हमको दुःख देनेवाला चित्त था और चित्त के नष्ट हुए आनन्द हुआ है । जैसे मन्दिर में दुःख देनेवाला पिशाच रहता है तब दुःख होता है। नहीं तो मन्दिर दुःख नहीं देता। पिशाच ही दुःख देता है, तैसे ही शरीररूपी मन्दिर में दुःख देनेवाला चित्त ही है। हे चित्त ! तूने मिथ्या मुझको दुःख दिया था । अब मैंने आपको जाना है । तू आदि भी तुच्छ है, अन्त भी तुच्छ है और वर्तमान में भी मिथ्या जीवों को दुःख देता है । जैसे मिथ्या परछाहीं बालक को बैताल होकर दुःख देती है—बड़ा आश्चर्य है ! हे चित्त ! तू तबतक दुःख देता है जबतक आत्मस्वरूप को नहीं जाना । जब आत्मस्वरूप का ज्ञान होता है तब तू कहीं दृष्टि नहीं होता । तू तो माया मात्र है। स्थिर हो अथवा जा, में अब तुझसे मोहित नहीं होता । तू तो मूर्ख जड़ और मृतक है और तेरा आकार अविचार में सिद्ध है । अब मैंने पूर्व का स्वरूप पाया है, तू तत्त्व नहीं भ्रान्तिमात्र है जो मूढ़ है वह तुझसे मोहित होता है, विचारवान् मोहित नहीं होता । जैसे दीपक से अन्धकार दृष्टि नहीं आता, तैसे ही ज्ञान से तू
उपशम प्रकरण । | ७६७
दृष्टि नहीं आता । हे मूर्ख चित्त ! तू बहुत काल इस देहरूपी गृह में रहा है और तू वैतालरूप है । जैसे अपवित्र और शमशान आदिक स्थानों में वैताल रहता है तैसे ही सत्संग से रहित देहरूपी गृह शमशान के समान सदा अपवित्र है वहाँ तेरे रहने का स्थान है । जहाँ सन्तों का निवास होता है यहाँ तुझ सरीखे ठौर नहीं पाते सो अब मेरे हृदयरूपी गृह में सत् विचार सन्तोषादिक सन्तजन आन स्थित हुए हैं तेरे बसने का ठौर नहीं । हे चित्त पिशाच ! तू पूर्वरूपी तृष्णा पिशाचिनी और काम क्रोधा-दिक गुह्यक अपने साथ लेकर चिरपर्यन्त विचरा है अब विवेकरूपी मन्त्र से मैंने तुझको निकाला है तब कल्याण हुआ । हे चित्त ! पिशाचरूप तू प्रमादरूपी मद्य पानकर मत्त हुआ था और चिरपर्यन्त नृत्य करता था । अब मैंने विवेकरूपी मन्त्र से तुझको निकाला है तब देहरूपी कन्दरा शुद्ध हुई है और शुद्धभाव पुरुषों ने निवास किया है । हे चित्त ! मैंने तुझको विवेकरूपी मन्त्रद्वारा वश किया है । अब तेरा क्या पराक्रम है ? तब तक दुःख देता था जबतक विचाररूपी मन्त्र न पाया था । अब तेरा बल कुछ नहीं चलता । अब मैं महाकेवल भाव में स्थित हूँ । आगे भी मैं तुझको जगाता था, आपसे ही तू सब रूप है । जैसे कच्चे मन्त्रवाला सिंह को जगाता है और आप कष्ट पाता है तैसे ही मैं तुझको जगाकर कष्ट पाता था । अब मैंने आत्मविचार से परिपक्व मन्त्र से तुझे वश किया है तब शान्ति-मान् हुआ हूँ । अब ममता और मान मेरे कुछ नहीं रहे । मोह अहंकार सब नष्ट हो गये हैं और इनका कलत्र भी नष्ट हो गया है मैं निर्मल और चैतन्य आत्मा हूँ । मेरा मुझको नमस्कार है । न मेरे में कोई आशा है, न कर्म है, न संसार है, न कर्तृत्व है, न मन है, न भोक्तृत्व है और न देह है, ऐसा मेरा निर्गुणरूप आत्मा है । मेरा मुझको नमस्कार है। न कोई आत्मा है, न अनात्मा है, न अहं है, न त्वं है, किसी शब्द का वहाँ प्रवेश नहीं ऐसा निगशब्द है । प्रकाशरूप, निर्मल आत्मा मैं अपने आपमें स्थित हूँ । ऐसा जो मैं आत्मा हूँ मेरा मुझको नमस्कार है । मैं विकारी नहीं हूँ, मैं तो नित्य हूँ, निराश हूँ, सर्वकार्यों में अनुस्यूत हूँ, अंशांशीभाव से रहित हूँ । ऐसा सर्वात्मा जो मैं हूँ सो मेरा तुझको
७६८ योगवाशिष्ट ।
नमस्कार है। मैं सम सर्वगत, सूक्ष्म और अपने स्वभाव में स्थित हूँ और पृथ्वी, पर्वत, आकाश आदिक जगत् में नहीं और मैं ही सर्व पदार्थ होकर भासता हूँ। ऐसा मैं सर्वात्मा हूँ। अब मैं सर्वभाव को प्राप्त हुआ हूँ और मननभाव मुझको दूर हुआ है। मेरे प्रकाश से विश्व भासता है, मैं अजर, अमर और अनन्त हूँ और गुणातीत अद्वैत हूँ। मनन जिससे दूर हुआ है ऐसा जो मैं सुन्दररूप हूँ जिससे विश्व प्रकट है और स्वरूप से अविनाशी हूँ उस अनन्त, अजर, अमर, गुणातीत ईश्वररूप को नमस्कार है।
इति श्रीयोगवासिष्ठे उपशमप्रकरणे चित्तोपशम- नाम पञ्चसप्ततितमस्सर्गः ॥ ७५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार विचारकर तत्त्ववेत्ता आत्मा को सम्यक् जानते हैं। तुम भी आत्मविचार का आश्रय करके आत्मपद के आश्रय ही रहो। यह जगत् सब आत्मरूप है, ऐसे जानकर चित्त से जगत् की सत्यता को त्याग करो। जब ऐसे विचार करे तब चित्त कहाँ है ? बड़ा आश्चर्य्य है कि जो चित्त स्वरूप दिखाई देता था सो अविदित मायामात्र अस्तरूप था। जैसे आकाश के फूल कहनेमात्र हैं तैसे ही चित्त कहनेमात्र है और अविचार से दिखाई देता है। विचारवान् को चित्त असत् भासता है, क्योंकि अविचार से सिद्ध है। जैसे नौका पर बैठे बालक को तट के वृक्ष चलते भासते हैं पर बुद्धिमान को चलने में सद्भाव नहीं होता तैसे ही मूर्ख को चित्त सच्चा भासती है और विचारवान् का चित्त नष्ट हो जाता है। जब मूर्खतारूप भ्रम शान्त होता है तब चित्त कहीं नहीं पाया जाता। जैसे बालक चक्र पर चढ़ा हुआ फिरता है तो पर्वत आदिक पदार्थ उसको भ्रमते भासते हैं और जब चक्र ठहर जाता है तब पर्वत आदि पदार्थ अचल भासते हैं तैसे ही चित्त के ठहरने से द्वैत कुछ नहीं भासता। आगे मुझको द्वैत भासता था इससे चित्त के फुरने से नाना प्रकार की तृष्णा (इच्छा) उठती थी अब चित्त के नष्ट हुए इन पदार्थों की भावना नष्ट हुई हैं और सब संशय और शोक नष्ट हो गये हैं। अब मैं विगतज्वर स्थित हूँ, जैसे मैं स्थित हूँ तैसे हूँ, एषणा कोई नहीं। जब चित्त का चैत्यभाव नष्ट हुआ तब इच्छा आदिक गुण कहाँ रहे ? जैसे
उपशम प्रकरण ।
७६६
प्रकाश के नष्ट हुए वर्णज्ञान नहीं रहता तैसे ही चित्त के नाश हुए इच्छा आदिक नहीं रहते। अब चित्त नष्ट हुआ, तृष्णा नष्ट हो गई और मोह का पिंजड़ा टूट पड़ा अब मैं निरहंकार बोधवान् हूँ, सब जगत् शान्तरूप आत्मा है और नानात्व कुछ नहीं। मैं निराभास, आदि-अन्त से रहित आनन्दपद को प्राप्त हुआ हूँ। मेरा सर्वगत सूक्ष्म आत्मतत्त्व अपना आप है और उसमें मैं स्थित हूँ। इन विचारों से अब क्या प्रयोजन है ? जब तक आपको मैं देह जानता था तब तक ये विचार मूर्ख अवस्था में थे अब मैं अमित, निराकार और केवल परमानन्द सच्चिदानन्द को प्राप्त हुआ हूँ। आगे मैं चित्तरूपी वैताल को आप ही जगाता था और आप ही दुःखी होता था, अब विचाररूपी मन्त्र से मैंने इसको नष्ट किया है और निर्णय से अपने स्वरूप को प्राप्त हुआ हूँ। मैं शान्तात्मा अपने आपमें स्थित हूँ। हे रामजी ! जिसको यह निश्चय प्राप्त हुआ है वह निर्द्वन्द्व रागद्वेष से रहित होकर स्थित होता है और प्रकृत कर्म करता है पर मानमद से रहित आनन्द करके पूर्ण होता है जैसे शरत्काल की रात्रि को पूर्णमासी का चन्द्रमा अमृत से पूर्ण होता है तैसे ही प्रकृत आचार कार्यकर्त्ता ज्ञानवान् का हृदय शान्तपूर्ण आत्मा है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे चित्तशान्तिप्रतिपादन-नाम षट्सप्ततितमसर्गः ॥ ७६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह विचार वेदविदों ने कहा है पूर्व मुझसे ब्रह्माजी ने यही विचार विन्ध्याचल पर्वत पर कहा था। इसी विचार से मैं परमपद में स्थित हुआ हूँ। इसी दृष्टि का आशय करके आत्मविचार होकर तमरूपी संसारसमुद्र से तर जाओ। हे रामजी ! इस पर एक और परम दृष्टि सुनो वह दृष्टि परमपद के प्राप्त करनेवाली है। जिस प्रकार वीतव मुनीश्वर विचार करके निःशङ्क स्थित हुआ है सो सुनो। महातेजवान् वीतव मुनीश्वर ने संसार के आधिव्याधि रोग से वैराग्य किया और नंगा होके पर्वतों की कन्दराओं में विचरने लगा। जैसे सूर्य सुमेरु पर्वत के चौफेर फिरता है तैसे ही वह विचरने लगा और संसार की क्रिया ॥ दुखरूप विचारता था कि बड़े भ्रम देनेवाली है। ऐसे जानकर वह दृग
७७० | योगवाशिष्ठ ।
वान् हुआ और निर्विकल्प समाधि की इच्छा कर अपने व्यवहार को त्याग दिया और अपनी गौरकुटी त्यागकर और केले के पत्तों की बनाकर बैठा। जैसे भँवरा कमल को त्यागकर नीलकमल पर जा बैठता है तैसे ही गौरकुटी को त्यागकर वह श्यामकुटी में जा बैठा। नीचे उसने कुश बिछाया उस पर मृगछाला बिछाया और उस पर पद्मासन कर बैठा और जैसे मेघ जल त्यागकर शुद्धमौन स्थित होता है तैसे ही और क्रिया को त्यागकर शान्ति के निमित्त मौन स्थित हुआ। हाथों को तले कर मुख ऊपर कर और ग्रीवा को सूधा करके स्थित हुआ और इन्द्रियों की वृत्ति को रोक फिर मन की वृत्ति को भी रोका। जैसे सुमेरु की कन्दरा में सूर्य का प्रकाश बाहर से मिट जाता है तैसे ही इन्द्रियों की रोकी वृत्ति बाहर से भी मिट जाती है और हृदय से भी विषयों की चिन्तना का उसने त्याग किया। इस प्रकार वह क्रम करके स्थित हुआ। जब मन निकल जावे तब वह कहे कि बड़ा आश्चर्य है मन महाचञ्चल है कि जो मैं स्थित करता हूँ तो फिर निकल जाता है। जैसे सूखा पत्ता तरङ्ग में पड़ा नहीं ठहरता तैसे ही मन एक क्षण भी नहीं ठहरता सर्वदा इन्द्रियों के विषयों की ओर धावता है। जैसे गेंद को ज्यों-ज्यों ताड़ना करते हैं त्यों-त्यों उछलता तैसे ही इस मूर्ख मन को जिस-जिस ओर से खैंचता हूँ, उसी ओर फिर धावता है और उन्मत्त हाथी की नाईं झूमता है, जो गन्ध की ओर से खैंचता हूँ तो रस की ओर निकल जाता है और जो रस की ओर से खैंचता हूँ तो गन्ध की ओर धावता है स्थित कदाचित् नहीं होता। जैसे वानर कभी किसी डाल पर कभी किसी डाल पर जा बैठता है इसी प्रकार मूर्ख मन भी शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध की ओर धावता है स्थिर नहीं होता। इसके ग्रहण करने के पञ्चस्थान हैं जिन मार्गों से विषयों को ग्रहण करता है सो पञ्चज्ञान इन्द्रियाँ हैं। अरे मूर्ख, मन ! तू किस निमित्त विषयों की ओर धावता है यह तो आप जड़ और असतरूप भ्रान्तिमात्र है तू इनसे शान्ति को कैसे पावेगा ? इनमें चपलता से इच्छा करना अनर्थ का कारण है। ज्यों-ज्यों इनके अर्थों को ग्रहण करेगा त्यों-त्यों दुःख के समुद्र को भास होगा। ये विषय जड़ और असतरूप हैं और तू भी जड़ है जैसे
उपशम प्रकरण । ७७१
मृगतृष्णा की नदी असत् होती है तैसे ही ये भी असतरूप हैं। हे मन ! ये सब असाररूप हैं तू भी इन्द्रियों सहित जड़रूप है, तू कर्तृत्व का अभिमान क्यों करता है ? सबका कर्त्ता चिदानन्द आत्मभगवान् सदा साक्षी है तैसे ही आत्मा भी साक्षी है तू क्यों वृथा तपायमान होता है ? जैसे सूर्य सबकी क्रियाओं को कराता साक्षी है तैसे ही आत्मा साक्षी है और सब जगत् भ्रान्तिमात्र है। जैसे अज्ञान से रस्सी में सर्प भासता है तैसे ही अज्ञान से आत्मा में जगत् भासता है। जैसे आकाश और पाताल का सम्बन्ध कुछ नहीं होता, ब्राह्मण और चाण्डाल का संयोग नहीं होता और सूर्य और तम का सम्बन्ध नहीं होता, तैसे आत्मा चित्त और इन्द्रियों का सम्बन्ध नहीं होता। आत्मा सत्तामात्र है और ये जड़ और असतरूप हैं इनका सम्बन्ध कैसे हो ? आत्मा सबसे न्यारा साक्षी है। जैसे सूर्य सब जनों से न्यारा रहता है तैसे ही आत्मा सबसे न्यारा साक्षी है। हे चित्त ! तू तो मूर्ख है विषयरूपी चबेने में राग करके सब ओर से भक्षण करता भी कदाचित् तृप्त नहीं होता और तू विचार के मिथ्या कूकर की नाईं चेष्टा करता है। तेरे साथ हमको कुछ प्रयोजन नहीं। हे मूर्ख ! तू तो मिथ्या अहं अहं करता है और तेरी वासना अत्यन्त असतरूप है और जिन पदार्थों की तू वासना करता है वे भी असतरूप हैं। तेरा और आत्मा का सम्बन्ध कैसे हो ? आत्मा चैतन्यरूप है और तू मिथ्या जड़रूप है। यह मैंने जाना है कि जन्ममरण आदिक विकार और जीवत्व भाव को तूने मुझको प्राप्त किया है। मैं तो केवल चैतन्य परब्रह्म हूँ मिथ्या अहंकार करके जीवत्वभाव को प्राप्त हुआ हूँ और देहमात्र आपको जानता हूँ। मैं तो संवित्मात्र नित्यशुद्ध आदि अन्त से रहित परमानन्द चिदाकाश अनन्त आत्मा हूँ। अब मैं स्वरूप में जागा हूँ और सद्भाव मुझको कुछ नहीं दृष्टि आता। हे मूर्ख मन ! जिन भोगों को तू सुखरूप जानकर धावता है वे अविचार से प्रथम तो अमृत की नाईं भासते हैं और पीछे विष की नाईं हो जाते हैं और वियोग से जलाते हैं। आपको तू कर्त्ता भोक्ता भी मिथ्या मानता है, तू कर्त्ता भोक्ता नहीं और इन्द्रियाँ कर्त्ता भोक्ता नहीं, क्योंकि जड़ हैं। जो तुम जड़ हुए तो तुम्हारे साथ मित्र
७७२ योगवाशिष्ठ ।
भाव कैसे हो और जो तू जड़ और असतरूप है तो कर्त्ता भोक्ता कैसे हो और जो चेतन और सतरूप है तो भी तेरे में कर्तृत्व भोक्तृत्व नहीं हो सकता, क्योंकि तू मिथ्या है और मैं प्रत्यक्ष चैतन्य हूँ । तू कर्तृत्व भोक्तृत्व मिथ्या अपने में स्थापन करता है, तू मिथ्या है । जब मैं तुझको सिद्ध करता हूँ तब तू होता है तू निश्चय करके जड़ है, तुझको कर्तृत्व भोक्तृत्व कैसे हो ? जैसे पत्थर की शिला नृत्य नहीं कर सकती तैसे ही तुझको कर्तृत्व की सामर्थ्य नहीं। तेरे में जो कर्तृत्व है सो मेरी शक्ति है-जैसे हसुआ घास, तृण आदिक को काटता है सो केवल आपसे नहीं काटता पुरुष की शक्ति से काटता है और खङ्ग में जो हनन क्रिया होती है वह भी पुरुष की शक्ति है, तैसे ही तुम्हारे में कर्तृत्व भोक्तृत्व मेरी शक्ति से है । जैसे पात्र से जलपान करते हैं तो पात्र नहीं करता, पान पुरुष ही करता है और पात्र करके पान करता है तैसे ही तुम्हारे में कर्तृत्व भोक्तृत्व मेरी शक्ति करती है और मेरी सत्ता पाकर तुम अपनी चेष्टा में विचरते हो । जैसे सूर्य का प्रकाश पाकर लोग अपनी अपनी चेष्टा करते हैं तैसे ही मेरी शक्ति पाकर तुम्हारी चेष्टा होती है । अज्ञान करके तुम जड़ से रहते हो और ज्ञान करके लीन हो जाते हो । जैसे सूर्य के तेज से बरफ का पुतला गल जाता है। इससे हे चित्त ! अब मैंने निश्चय किया है, तू मृतकरूप और मूढ़ है । परमार्थ से न तू है और न इन्द्रियाँ हैं । जैसे इन्द्रजाल की बाजी के पदार्थ भासते हैं सो सब मिथ्या हैं । मैं केवल विज्ञानस्वरूप अपने आप में स्थित निरामय, अजर, अमर, नित्य, शुद्ध, बोध, परमानन्द रूप हूँ और मैं ही नानारूप होकर भासता हूँ, परन्तु कदाचित् द्वैतभाव को नहीं प्राप्त होता सदा अपने आपमें स्थित हूँ। जैसे जल में तरङ्ग बुद्बुदे दृष्टि आते हैं सो जलरूप हैं तैसे ही सब पदार्थ मेरे भासते हैं सो मुझसे भिन्न नहीं । हे चित्त ! तू भी चिन्मात्रभाव को प्राप्त हो, जब तू चिन्मात्रभाव को प्राप्त होगा तब तेरा भिन्नभाव कुछ न रहेगा और शोक से रहित होगा । आत्मतत्त्व सर्व भाव में स्थित और सर्वरूप है, जब तू उसको प्राप्त होगा तब सब कुछ तुझको प्राप्त होगा । न कोई देह है और न जगत् है सब ब्रह्म ही है, ब्रह्म
उपशम प्रकरण । ७७३
ही ऐसे भासता है, वास्तव में अहं त्वं कल्पना कोई नहीं। हे चित्त ! आत्मा चैतन्यरूप और सर्वगत है, आत्मा से भिन्न कुछ नहीं तो भी तुझको संताप नहीं और अनात्मा, जड़ और असतरूप है तो भी तू न रह। जो कुछ परिच्छिन्न सा तू बनता है सो मिथ्या भ्रम है, आत्म-तत्त्व सर्वव्यापकरूप है द्वैत कुछ नहीं और सर्व वही है तो भिन्न अहं त्वं की कल्पना कैसे हो ? असत् से कार्य की सिद्धता कुछ नहीं होता । जैसे शशे के सींग असत् हैं और उनके मारने का कार्य सिद्ध नहीं होता तैसे ही तुमसे कर्तृत्व भोक्तृत्व कार्य कैसे हो और जो तू कहे कि मैं सत्-असत् और चेतन-जड़ के मध्यभाव में हूँ-जैसे तम और प्रकाश का मध्य-भाव छाया है-तो सूर्यरूप परमात्मा निरञ्जन के विद्यमान रहते मन्दभावी छाया कैसे रहे जिससे कर्तृत्व भोक्तृत्व तुझको नहीं होता, क्योंकि तू जड़ है। जैसे हसुआ अपने आप कुछ नहीं काट सकता जब मनुष्य के हाथ की शक्ति होती है तब कार्य होता है, तैसे ही तुमसे कुछ कार्य नहीं होता जब आत्मसत्ता तुमसे मिलती है तब तुमसे कार्य होता है। तुम क्यों अहंकार करके वृथा तपायमान होते हो ? हे चित्त ! जो तू कहे कि ईश्वर का उपकार है तो ईश्वर जो परमात्मा है उसको करने न करने में कुछ प्रयोजन नहीं। सबका कर्त्ता भी वही है और अकर्त्ता भी वही है । जैसे आकाश पोल से सबको वृद्धता देनेवाला है परन्तु स्पर्श किसी से नहीं करता तैसे ही परमात्मा सब सत्ता देनेवाला है और अलेप है। हे मूर्ख मन ! क्यों भोगों की वाञ्छा करता है ? तू तो जड़ और असत्-रूप है और देह भी जड़ असतरूप है, भोग कैसे भोगोगे और जो पर-मात्मा के निमित्त इच्छा करते हो तो परमात्मा तो सदा तृप्त है और इच्छा से रहित है। सर्व में वही पूर्ण है और दूसरे से रहित एक अद्वैत प्रकाशरूप अपने आपमें स्थित है-तुझको किसकी चिन्ता है ? इससे वृथा कल्पना को त्यागकर आत्मपद में स्थित हो-जहाँ सर्व क्लेश शान्त हो जाते हैं। जो तू कहे कि परमात्मा के साथ मेरा कर्तृत्व भोक्तृत्व सम्बन्ध है तो भी नहीं बनता-जैसे फूल और पत्थर का सम्बन्ध नहीं होता। तैसे ही परमात्मा के साथ तेरा सम्बन्ध नहीं होता । समान अधि-
७७४ योगवाशिष्ठ ।
करण और द्रव्य का सम्बन्ध होता है-जैसे जल औरमृत्तिका का सम्बन्ध होता है, जैसे ओषध में चन्द्रमा की सत्ता प्राप्त होती है, जैसे सूर्य की तपन से शिला तप जाती है, जैसे बीज अंकुर का सम्बन्ध होता है, पिता और पुत्र का सम्बन्ध होता है और द्रव्य और गुण का सम्बन्ध होता है। आकार सहित वस्तु का सम्बन्ध निराकार निर्गुण वस्तु से कैसे हो ? परमात्मा चैतन्य है, तू जड़ है, वह प्रकाशरूप है, तू तमरूप है, वह सत्-रूप है, तू असतरूप है, इस कारण सम्बन्ध तो किसी के साथ नहीं बनता है तो तू क्यों वृथा जलता है ? तू अमनरूप है परमात्मा सर्वकल्पना से रहित है । तेज की एकता तेज से होती है और जल की एकता जल से होती है । तू कलङ्करूप है; परमात्मा निष्कलङ्क है तेरी एकता उससे कैसे हो ? जिसका कुछ अङ्ग होता है उसका सम्बन्ध भी होता है सो सम्बन्ध तीन प्रकार का है-सम, अर्धसम और विलक्षण । जैसे जल से जल की एकता और तेज से तेज की एकता होती है यह सम सम्बन्ध है पर तेरा आत्मा के साथ सम सम्बन्ध नहीं । दूसरा अर्ध सम्बन्ध यह है कि जैसे स्त्री और पुरुष के अङ्ग समान होते हैं परन्तु कुछ विलक्षणरूप हैं सो अर्ध सम सम्बन्ध भी तेरा और आत्मा का नहीं । कुछ अन्य की नाईं भी तेरा सम्बन्ध नहीं-जैसे जल और दूध का सम्बन्ध होता है तैसे भी तेरा सम्बन्ध नहीं-और अत्यन्त जो विलक्षण हैं उनकी नाईं भी तेरा सम्बन्ध नहीं-जैसे काष्ठ और लाख, पुरुष और हाथी, घोड़ा आदिक का सम्बन्ध नहीं । आधार-आधेयवत् भी तेरा सम्बन्ध नहीं-जैसे बीज और अंकुर, पिता और पुत्र आदिक का जो सम्बन्ध है तैसे भी तेरा और आत्मा का सम्बन्ध नहीं, क्योंकि सम्बन्ध उसका होता है जिसके साथ कुछ भी अङ्ग मिलता है, जिसका कोई अङ्ग नहीं मिलता और परस्पर विरोध हो उसका सम्बन्ध कैसे कहिये ? जैसे कहिये कि शश के सींग पर अमृत का चन्द्रमा बैठा है वा तम और प्रकाश इकट्ठे हैं तो जैसे यह नहीं बनता, तैसे ही आत्मा के साथ देह, मन और इन्द्रियों का सम्बन्ध नहीं बनता क्योंकि आत्मा सर्वकल्पना से अतीत, नित्य शुद्ध, अद्वैत और प्रकाश-रूप है और मनादिक जड़ असत्, मिथ्या और तमरूप है इनका सम्बन्ध
उपशम प्रकरण ।
७७५
नहीं । जिनका परस्पर विरोध है उनका सम्बन्ध कैसे हो ? तुम तो परमात्मा के अज्ञान से मन इन्द्रियाँ और देहादिक सहित उदय हुए हो और आत्मा के ज्ञान से अभाव हो जाते हो फिर सम्बन्ध कैसे हो ? हे मन ! जो कुछ जगत् है वह सब ब्रह्मस्वरूप है-द्वैत नहीं और अहं त्वं की कल्पना भी कोई नहीं । ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है, सब कलना तेरे में थी और तू तबतक था जबतक स्वरूप का अज्ञान था । जब स्वरूप का ज्ञान होता है और अज्ञान नष्ट होता है तब तू कहाँ है । जैसे रात्रि के अभाव से निशाचरों का अभाव हो जाता है तैसे ही अज्ञान के नाश हुए तेरा अभाव हो जाता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे वीतवोपाख्याने चित्तानुशासन-नाम सप्तसप्ततितमस्सर्गः ॥ ७७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार वीतहव्य मुनीश्वर विन्ध्याचल पर्वत की कन्दरा से तीक्ष्णबुद्धि से विचारने लगे और भी जो कुछ उससे कहा है सो सुनो । अनात्मा जो देह इन्द्रियाँ मनादिक हैं वे संकल्प से उपजे हैं, जब ज्ञान उदय होता है तब इनका अभाव हो जाता है । हे मन ! जैसे सूर्य के उदय हुए तम नष्ट हो जाता है तैसे ही नित्य उदित-रूप अनुभवस्वरूप परमात्मज्ञान के उदय हुए तुम्हारा अभाव हो जाता है। वासना से उसका आवरण होता है और जब वासना का अभाव हो जाता है तब आवरण का भी अभाव हो जाता है । जैसे मेघ के नष्ट हुए सूर्य प्रकाशता है तैसे ही वासना के अभाव हुए आत्मतत्त्व प्रकाशता है । वासना का मूल अज्ञान है, जब अज्ञान सहित वासना नष्ट होती है तब चिदानन्द ब्रह्म प्रकाशता है । वासना ही का नाम बन्ध है और वासना की निवृत्ति का नाम मोक्ष है । जब वासनारूपी रस्सी काटोगे तब परमात्मा का साक्षात्कार होगा । जैसे प्रकाश बिना अन्धकार का नाश नहीं होता तैसे ही मन, इन्द्रियाँ, देहादिक आत्मविचार बिना नाश नहीं होतीं । जब विचार करके आत्मपद प्राप्त हो तब मन सहित षट् इन्द्रियों का अभाव हो जाता है अर्थात् इनका अभिमान नष्ट होता है और इनके धर्म अपने में नहीं भासते । जब तक देह इन्द्रियों के साथ आवरण है तब
७७६ योगवाशिष्ठ ।
लग आत्मपद नहीं प्राप्त हो सकता, इससे कल्याण के निमित्त आत्मपद पाने का अभ्यास करो। जबतक जीव मन और इन्द्रियों के गुणों के साथ आपको मिला जानता है तबतक अपने स्वरूप की विशुद्धता और सिद्धता नहीं भासती, जब आत्मा का साक्षात्कार हो जावेगा तब रागद्वेषादिक विकार नष्ट होंगे। जैसे सूर्य के उदय हुए निशाचरों का अभाव हो जाता है तैसे ही आत्मा के साक्षात्कार हुए विकारों का अभाव होता है। जिसके देखे से इनका अभाव हो जाता है उसका आत्मा के साथ सम्बन्ध कैसे हो। जैसे प्रकाश और तम का सम्बन्ध नहीं होता तैसे ही सत् असत् का सम्बन्ध नहीं होता और जैसे जीव से मृतक का सम्बन्ध नहीं होता तैसे ही आत्मा अनात्मा का सम्बन्ध नहीं होता। आत्मा सर्वकल्पना से रहित है और मन आदिक सर्व कल्पनारूप हैं। कहाँ यह मूक, जड़ और अनात्मारूप और कहाँ नित्य, चेतन, प्रकाश, निराकार, आत्मारूप, इनका परस्पर विरोध रूप है तो सम्बन्ध कैसे कहिये-ये तो निश्चय करके अनर्थ के कारण हैं। जब तक इनका अभिमान है तबतक जगत् दुःखरूप है और जब इनका वियोग हो तब जगत् परमात्मारूप होता है। जबतक आत्मा का अज्ञान है तबतक मनुष्य आपको इनमें मिला देखता है और दुःख पाता है और जब आत्मा का ज्ञान होता है तब अपने साथ इनका संयोग नहीं देखता यह मैंने निश्चय करके जाना है कि इन्द्रियाँ और मन के संयोग से जगत् भासता है और जब इन्द्रियों का ग्राम नष्ट हो जाता है तब जगत् परमात्मारूप हो जाता है। मैं जो आत्मा, मन और इन्द्रियों को इकट्ठा जानता था सो प्रमादरूपी मद्य के पान से मत्त हुआ मन से जानता था। अब आत्मविचार से मन नष्ट हुआ तब सुखी हुआ हूँ। जो विष को पान करके मूर्च्छित हो सो तो बनता है परन्तु पान किये बिना मूर्च्छित हो सो आश्चर्य है। इससे यदि अनात्मा का इसके साथ संयोग होता हो तो सुख दुःख करके राग द्वेषवान् होना भी बनता पर आत्मा तो सुख दुःख का साक्षीभूत है। सुख का संयोग ही जिससे नहीं और रागद्वेष से जलता है तो महामूर्खता है। आत्मा तो सुख दुःख का साक्षीभूत है जैसे उसके आगे अभ्यास होता है तैसा ही भासता है, कदाचित् विपर्ययभाव को
उपशम प्रकरण । ७७७
नहीं प्राप्त होता सुख दुःख में मूर्ख मन राग द्वेषवान् होता है । आत्मा तो सदा साक्षीभूत जीववृत्ति है उसके साथ इन्द्रियों का संयोग कैसे हो ? अब जो संयोग का अभाव सिद्ध हुआ तो आत्मा में कर्तृत्व भोक्तृत्व कैसे कहिये ? जहाँ चित्तकल्पना होती है वहाँ कर्तृत्व भोक्तृत्व भी होता है और जहाँ चित्तकल्पना का अभाव है वहाँ कर्तृत्व भोक्तृत्व का भी अभाव है । ऐसा निष्कलङ्क आत्मतत्त्व में हूँ कि न कर्त्ता हूँ, न भोक्ता हूँ, न मेरे बन्ध है, न मोक्ष है, न हन्ता है, न अहन्ता है, मैं सर्वात्मा अलेपरूप हूँ। हे मन ! तू भी मैं हूँ और पृथ्वी, अप्, तेज वायु, आकाश पाँचों तत्त्व भी मैं ही हूँ। इस प्रकार निर्णय करके जिसने धारा है वह मोह को नहीं प्राप्त होता । जो अहं अभिमान करनेवाला आत्मा से आपको भिन्न जानता है वह दुःखी होता है और जब अपने स्वभाव में स्थित होता है तब परमसुखी होता है । इससे जिसको कल्याण की इच्छा हो उसको एक आत्म (परमात्म) परायण होना योग्य है । जब स्वरूप को त्यागकर संकल्प की ओर धावता है तब दुःखों के समूह को प्राप्त होता है। हे चित्त ! जो तू अपने में कर्तृत्व देखता था सो इन्द्रियों सहित जड़रूप पत्थर के समान है-जैसे आकाश में पवन नहीं लगता तैसे ही तुमसे कर्तृत्व नहीं होता । जब स्वरूप का प्रमाद होता है तब जीव चित्त आदिक से आपको मिला जानता है और चित्तादिक आत्मा की सत्ता पाकर चेतन होता है । जैसे अग्नि की सत्ता पाकर लोहा भी जला सकता है तैसे ही तुम आत्मा की सत्ता पाकर कर्तृत्व भोक्तृत्व में समर्थ होते हो । जब आत्मविचार करके स्वरूप का साक्षात्कार होता है, अज्ञानवृत्ति निवृत्त हो जाती है और मनादि का वियोग होता है तब सर्वकल्पना से रहित हुआ केवल मोक्षरूप आत्मा होता है और कर्तृत्व भोक्तृत्व का अभाव हो जाता है । जैसे आकाश में लाली का अभाव है तैसे ही आत्मा में कर्तृत्व का अभाव है । सब जगत् आत्मस्वरूप भासता है । जैसे समुद्र तरङ्ग आदिक नाना प्रकार मे होता है सो सब जलरूप है-भिन्न नहीं, तैसे ही सर्वजगत् आत्मारूप है-आत्मा से भिन्न नहीं । सच्चिदानन्द आत्मा में अपने आपमें स्थित हूँ और द्वैतकल्पना मेरे में
७७८ योगवाशिष्ठ ।
कोई नहीं। जैसे समुद्र उष्णता से रहित है तैसे ही परमात्मा सर्वकल्पना से रहित है और जैसे आकाश में वन नहीं होता तैसे ही परमात्मा में कल्पना नहीं होती, वह संवेदन से रहित, संवित्मात्र सर्वात्मा है, जब उसका साक्षात्कार होता है तब अहं त्वं आदिक कल्पना का अभाव हो जाता है। वह अनादि, अरूप, सर्वगत, सदा अपने आपमें स्थित है, ऐसा जो अद्वैत तत्त्व है उसको द्वैतकल्पना आरोपने को कौन समर्थ है। ऐसा कौन है जो आकाश में ऋग्वेद लिखे ? नित्य उद्यति, सर्व का सार, अद्वैत आत्मा है उसमें द्वैत का अभाव है और सबमें पूर्ण, निर्मल, नित्य आनन्दरूप है ऐसे आत्मा को अब मैं प्राप्त हुआ हूँ, जगत् का सुख-दुःख अब नष्ट हुआ है सम शान्तरूप हुआ हूँ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे वीतहव्योपाख्याने अनुशासनयोगोपदेशो नामाष्टसप्ततितमसर्गः ॥ ७८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार वीतहव्य मुनि श्रेष्ठ विचार करता था फिर जो कुछ वह निर्मल बुद्धि से विचारने लगा सो भी सुनो। हे इन्द्रिय-रूप मन ! तुम क्यों अपने अर्थों की ओर धावते हो ? तुमको तो विषयों से शान्ति नहीं होती—जैसे मृग मरुस्थल की नदी देखकर दौड़ता है और शान्तिमान नहीं होता। इससे तुम भी विषयों की ओर तृष्णा करने से शान्तिमान न होगे। इनकी इच्छा त्यागकर जो परमात्मतत्त्व अविनाशी सर्व अवस्था में एकरस और सत्य है उसको ग्रहण करो तब सब दुःख तुम्हारे मिट जावेंगे। तुम्हारे साथ में मिला था तब मैंने भी दुःख पाया। तुम अज्ञान से उत्पन्न हुए हो और जो तुम्हारे साथ मिलता है उसको भी दुःख प्राप्त होता है। जैसे तपी हुई लाख जिसके शरीर से स्पर्श करती है उसको जलाती है तैसे ही जिसको तुम्हारा संग हुआ है वह दुःख पाता है। हे मन ! यह जीव तुम्हारे संग से काल के मुख में जा पड़ता है। जैसे नदी जल सहित होती है तब समुद्र की ओर चली जाती है—जल से रहित हो तो क्यों जावे, तैसे ही तुम्हारे संग करके जीव काल के मुख में जा पड़ता है, तुम्हारा संग न हो तो क्यों पड़े ? जैसे मेघ कुहिरे मे सूर्य को घेर लेता है, तैसे ही मनरूपी मेघ इच्छारूपी कुहिरे मे
उपशम प्रकरण । ७७६
आत्मारूपी सूर्य को घेर लेता है और परम्परा दुःखों की वर्षा करनेवाला है। हे मन ! तेरे में चिन्ता उठती है इससे तू मर्कट की नाईं है। जैसे मर्कट वृक्ष को ठहरने नहीं देता, हिलाता है तैसे ही चित्त देह को ठहरने नहीं देता। चित्तरूपी पखेरू के लोभ और लज्जा दो पंख हैं और रागद्वेषरूपी चोंच है जिससे शरीररूपी वृक्ष पर बैठा शुभगुणों को काटकर खाता है। चित्तरूपी महानीच कुत्ता भोगभावनारूपी महाअपवित्र पदार्थों को हृदयरूपी स्थान में इकट्ठा करता है और ऐसी चेष्टा से कदाचित् रहित नहीं होता। चित्तरूपी उलूक अज्ञानरूपी रात्रि में विचरता है, चेष्टा करके प्रसन्न होता है और शब्द करता है। जैसे श्मशान से बैताल शब्द करता है। जब अज्ञानरूपी रात्रि नष्ट हो तब चित्तरूपी उलूक का भी अभाव हो और सम्पदा ज्ञान प्रवेश करे। जैसे सूर्य के उदय हुए सूर्यमुखी कमल उदय होता है तैसे ही सम्पदा प्रफुल्लित होता है। जब मोहरूपी कुहिरा और इच्छारूपी धूलि हृदयरूपी आकाश से निवृत्त होती है तब निर्मल आकाश प्रकट होता है। हे चित्त ! जब तक तू नष्ट नहीं होता तबतक शान्ति नहीं होती। स्वस्थ बैठे हुए जो चिन्ता प्राप्त होती है वह तेरे ही संयोग से होती है जहाँ चित्त नष्ट होता है वहाँ सर्व आनन्द होकर शीतलता और मित्रता से पावन होता है। जैसे शीतकाल का आकाश निर्मल होता है और मेघ के नष्ट हुए सूर्य प्रकाशता है तैसे ही अज्ञान के नष्ट हुए आत्मा में प्रकाशता और प्रसन्नता, गम्भीरता, महत्त्वता और समता होती है। जैसे वायु और मन्दराचल पर्वत से रहित क्षीरसमुद्र शान्तिमान् होता है और पूर्णमासी का चन्द्रमा शोभता है तैसे ही अज्ञान के नाश हुए आत्मानन्द पाकर यह मनुष्य शोभता है। हे चित्त ! यह स्थावर-जंगम जगत् संवित्रूप आकाश में है। उस महत् ब्रह्म को तुम भी प्राप्त हो। जो पुरुष आशारूपी फाँसी को तोड़कर आत्मपद में प्राप्त हुआ है और जिसने संसार का सद्भाव निवृत्त किया है वह जन्म-मरण के बन्धन में नहीं पड़ता है। जैसे जला हुआ पत्र फिर हरा नहीं होता तैसे ही चित्त नष्ट हुआ जन्म-मरण नहीं पावता। हे चित्त ! तू सबको भक्षण करनेवाला है। जो तू संसार को सत् मानकर उसकी
७८० योगवाशिष्ट ।
ओर धावेगा तो तेरा कल्याण न होगा और जो आत्मा की ओर आवेगा तो तेरा कल्याण होगा जब तू अपना अभाव कर आत्मपद में स्थित होगा तब कल्याणरूप होगा और जो तू अपना सद्भाव करेगा कि आकार को न त्यागेगा तो दुःखी होगा । जो तेरा जीना है वह मृत्यु समान है और जो मृत्यु है सो जीने के समान है । दोनों पक्षों में जो तेरी इच्छा हो सो अङ्गीकार कर । जो तू अबही आपको आत्मपद में निर्वाण करेगा तो परमपद को प्राप्त होकर परमसुखी होगा और जो न करेगा तो परम दुःखी होगा जो आत्मपद को त्याग करेगा वह मूढ़ है । तेरा निर्वाण होना आत्मपद में जीने का निमित्त है और आत्मा से भिन्न जो तू जीने की इच्छा करता है सो तेरा जीना मिथ्या अर्थात् तू आदि भी मिथ्या है और अब भी विचार बिना भ्रममात्र है, विचार किये से नष्ट हो जावेगा । जैसे सूर्य के प्रकाश बिना अंधकार होता है और प्रकाश से नष्ट हो जाता है तैसे ही विचार बिना चित्त है, विचार से नष्ट हो जाता है । इतने काल में अविवेक से ही जीता था । जैसे बालकों को अपनी परछाईं में वैताल कल्पना होती है और विचार बिना भय पाती है-विचार किये से निर्भय होता है तैसे ही अब मैं तेरे संग से छूट अपने पूर्व स्वरूप को प्राप्त हुआ हूँ और विवेक से तेरा अभाव हुआ है । इससे विवेक को नमस्कार है । हे चित्त ! अविवेक से तू मेरा मित्र था अब बोध से तेरा चित्तभाव नष्ट हो गया । तू परमेश्वररूप है । अब वासना नष्ट हुई है । आगे तेरे में नाना प्रकार की वासना थी उससे तू मलिन और दुःस्वरूप था । अब वासना के नष्ट होने से तेरा परमेश्वररूप हुआ है । तेरे में अज्ञान से चित्तस्वभाव उपजा दुःखों का कारण था सो विवेक से लीन हुआ है । जैसे रात्रि के पदार्थ सूर्य के उदय हुए लीन हो जाते हैं तैसे ही विवेक से चित्तभाव नष्ट हुआ है सो सिद्धान्त का कारण है । तेरे संग से मैं तुच्छ सा हो गया था, अब शास्त्रों की युक्ति से निर्णय किया है कि न तू आगे था, न अब है और न फिर होगा । जबतक मैंने आपको न जाना था तबतक तेरा सद्भाव था, अब मैंने आपको जाना है और अपने आपमें स्थित हुआ हूँ । अब मैं परम निर्वाण और शान्त
उपशम प्रकरण । ७८१
रूप हूँ, सब ताप मेरे नष्ट हुए हैं और नित्यशुद्ध निदानन्द परब्रह्मस्व- रूप हूँ । जगत् की सत्य-असत्य कलना मेरी नष्ट हुई है, क्योंकि कलना सब चित्त में थी, जब चित्त निर्वाण हो गया तब कलना कहाँ रही ? मैं केवल शुद्ध आत्मा हूँ, मेरा प्रतियोगी कोई नहीं और न व्यवच्छेद है, क्योंकि दूसरा कोई नहीं केवल चित्त की चेतना फुरती थी सो निर्वाण हो गई है और अब मैं स्वस्थ हुआ हूँ । जैसे तरङ्गों से रहित समुद्र अचल होता है तैसे ही सर्वकलना से रहित मैं वीतराग हूँ और संवेदन से रहित समसत्तामात्र अपने आपमें स्थित हूँ ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उपशमप्रकरणे वीतद्योपाख्याने चित्तोपदेशोनाम- कोनाशीतितमसर्गः ॥ ७९ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार वीतहव्य ने निर्वासनिक हो निर्णय करके विन्ध्याचल पर्वत की कन्दरा में समाधि लगाई और आकाशवत् निर्मलचित्त हो इन्द्रियों की वृत्ति बाहर से खींचकर अचल की और फिर ग्रीवा को सम करके चित्त की वृत्ति अनन्तआत्मा साक्षीभूत में स्थित की । जैसे लकड़ियों को जलाकर अग्नि की ज्वालाशान्त हो जाती है तैसे ही उसके प्राण और मन की वृत्ति का स्पन्द मिट गया और जैसे शिला में खोदी हुई पुतली होती है और मूर्ति की लिखी हुई पुतली होती है तैसे ही स्थित हो गया । मेघों की वर्षा शिर पर हो, मण्डलेश्वर शिकार खेलें बड़े शब्द रीझ हों, और वानर शब्द करें, वारहसिंहों और हाथियों के शब्द हों, वन में अग्नि लगे, पत्थरों की वर्षा हों, वायु चले और धूप पड़े तो भी वह समाधि से न जागे और जैसे पहाड़ में शिला दबी होती है तैसे ही उसका शरीर दब गया । जब तीन सौ वर्ष इसी प्रकार व्यतीत हुए तब चित्त फुर आया कि शरीर मेरे साथ है परन्तु प्राण नहीं फुरे और चित्त के फुरने में आपको कैलास पर्वत के ऊपर और कदम्ब के वृक्ष के नीचे देखा । सौ वर्ष पर्यन्त मौन होकर जीवन्मुक्त और निर्मल आत्मा हो बिचरा । सौ वर्ष पर्यन्त विद्याधर होकर विद्याधरों में बिचरा, उसके अनन्तर और पद्म- युग बीतकर इन्द्र हुआ तब देवता उसे नमस्कार करते थे । रामजी ने पूछा हे भगवन् ! देश काल और मनादिक प्रतिभा उसको अनियत अग्नि-
७८२ योगवाशिष्ठ ।
यह कैसे भासित हुई ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! चित्त सर्वात्मरूप है, जैसा जैसा उसमें फुरना होता है तैसा ही भासता है । जैसे जैसे देश काल का फुरना होता है जैसे ही अनुभव होता है । हे रामजी ! जितना प्रपञ्च है वह मनोमात्र है । जैसा फुरना तीव्र होता है वैसे ही अनुभवसत्ता में भासित हो वहाँ स्थित होता है । जब और भ्रम में गया तो नियम के अनुसार तैसे ही होता जाता है । जो अज्ञानी होता है उसको वासना से नाना प्रकार का जगत् भासता है और जो ज्ञानवान् होता है वह सब आत्मा को देखता है, उसका फुरना भी अफुरना है और वासना भी अवासना है । बीतव मुनीश्वर ने चित्त के फुरने से इतना देखा परन्तु स्वस्थरूप था इससे उसकी वासना भी अवासना थी । जैसे भुना बीज नहीं उगता तैसे ही उसकी वासना भी अवासना थी और भ्रान्ति का कारण न था । फिर कल्पपर्यन्त वह चन्द्रधार सदाशिवजी का गण हो समस्त विद्याओं का ज्ञाता और सर्वज्ञ त्रिकालदर्शी जीवन्मुक्त होकर विचरा । हे रामजी ! जैसा किसी का संस्कार दृढ़ होता है तैसा ही उसको अनुभव होता है । जैसे बीतव चित्त को स्पन्द करके जीवन्मुक्ति का अनुभव करता था । रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! जो ऐसे हैं तो जीवन्मुक्ति के मत में बन्ध मोक्ष हुआ ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जीवन्मुक्ति को सब ब्रह्मस्वरूप भासता है बन्ध व मोक्ष अवस्था उसमें कहाँ है ? ज्ञानमात्र आकाश में जैसा फुरना होता है तैसा ही भासता है । हे अङ्ग ! यह सब चिन्मात्रस्वरूप है और जगत् नाना प्रकार का मन से भासता है, वास्तव में न जगत् है, न अजगत् है केवल ब्रह्मसत्ता स्थित है । जगत् में भूत भविष्यत् केवल ब्रह्मसत्ता भासती है । चिन्मात्र से भिन्न जगत् मन के फुरने से भासता है जिनको ऐसा ज्ञान नहीं उनको जगत् वज्रसार से भी दृढ़ हो भासता है और ज्ञानवान् को आकाशवत् भासता है । हे रामजी ! अज्ञान से मन उपजा है उससे सम्पूर्ण जगत् हुआ है वास्तव में और कुछ नहीं । जैसे समुद्र में तरङ्ग और उल्लास होते हैं तैसे ही चिदाकाश में आकर भासते हैं । जब चित्त अचित्त हो जाता है तब कुछ द्वैत नहीं भासता ।
इति श्रीयोग० उपशम० बीतवमनोयज्ञवर्णनन्नामाशीतितमसर्गः ॥८०॥
उपशम प्रकरण ।
७८३
रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! वीतहव मुनीश्वर का जो शरीर विन्ध्या- चल पर्वत में फँसा था फिर उसकी क्या अवस्था हुई ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! उसके अनन्तर आत्मवेत्ता वीतहव मुनीश्वर एक काल में शरीर गणों को मन से विचारने लगा कि कई नष्ट हो गये हैं। उन अनष्टों में पृथ्वी के मध्य जो उसका स्थित था उसको देखा कि कन्दरा की धूलि में वर्षा से फँस गया है और ऊपर तृणजाल जम गया है। उसको देखकर कहने लगा कि इसमें प्रवेश करूँ पर फिर विचार किया कि यह तो जड़ गूँगा और फँसा हुआ है और इसको मैं नहीं निकाल सकता, इससे सूर्य- मण्डल को जाऊँ कि सूर्य के सारथी अरुण पंगु इसको निकालेंगे, अथवा इसके साथ मेरा क्या प्रयोजन है ? यह नाश हो जावे अथवा रहे इतना यत्न मैं किस निमित्त करूँ ? मैं अपने निर्गुण स्वरूप में स्थित होऊँ देह से मेरा क्या है। इस प्रकार विचार वीतहव तूष्णीम हो गया और एक क्षण के अनन्तर फिर चिन्तन करने लगा कि पृथ्वी में न कुछ त्यागने योग्य है और न कुछ ग्रहण करने योग्य है, इससे देह को त्यागना और रखना समान है तो यह शरीर किस निमित्त दवा रहे । कुछ काल और इसका प्रारब्ध वेग है इसलिये जो आकाश में सूर्य स्थित है उसमें प्रवेश करूँ-जैसे आदर्श में प्रतिबिम्ब प्रवेश करता है और उस शरीर को सूर्य के सारथी से निकलवाऊँ । हे रामजी ! ऐसे विचारकर मुनीश्वर पुर्यष्टकरूप से आकाशमार्ग में चढ़ा और प्रणाम करके सूर्य के भीतर वायुरूप हो प्रवेश किया-जैसे शस्त्र पिण्ड में अग्नि प्रवेश करती है। सूर्य भगवान् ने जाना कि वीतहव मुनीश्वर ने प्रवेश किया है और सर्वज्ञ थे इससे जाना कि पृथ्वी में इसका शरीर कीचड़ और तृणों से दवा हुआ है उसके निकलवाने के निमित्त आया है। ऐसे विचार सूर्य ने अपने सारथी से कहा। हे सारथी ! विन्ध्याचल पर्वत की कन्दरा में वीतहव मुनीश्वर का शरीर दवा पड़ा है उसको तू जाकर निकाल दे। तब अरुण नामक सारथी ने जिसका शरीर हाथी के समान है विन्ध्या- चल पर्वत में आकर नखों से वह शरीर निकाला। उसके नख ऐसे थे जिनसे वह पहाड़ उखाड़ डाले उन नखों से धराकोटर में गड़े हुए उस
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शरीर को उसने निकाला जैसे समुद्र के तीरे भीह की तन्तु को कीड़ा पाते हैं तैसे ही पर्वत की कन्दरा से उस शरीर को निकाल डाला । तब मुनीश्वर ने पुर्य्यष्टका से उस शरीर में प्रवेश किया-जैसे पक्षी आकाश मार्ग से उड़ता-उड़ता आलय में आ प्रवेश करे । सावधान होकर अरुण को नमस्कार किया और अरुण ने भी वीतह्य को नमस्कार किया और अपने-अपने कार्य की ओर हुए । अरुण तो आकाशमार्ग को गया और मुनीश्वर का शरीर कीचड़ से भरा हुआ था इससे उसने तालाब पर जाकर डुबकी मारी और जैसे हाथी मल धोता है तैसे ही स्नान करके सन्ध्यादिक कर्म किये और सूर्य भगवान् का पूजन किया । जैसे प्रथम तप से शरीर शोभता था तैसे ही भूषित किया और मैत्री, समता, सत्, मुदिता आदिक गुणों से सम्पन्न होकर ब्रह्मलक्ष्मी से सुशोभित हुआ और सबके सङ्ग से रहित भी रहा कि इन गुणों को भी स्वरूप में स्पर्श न करे और आपको शुद्ध स्वरूप जाने ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे वीतहवसमाधियोगोपदेशो नामैकाशीतितमस्सर्गः ॥ ८१ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार जब कुछ दिन व्यतीत हुए तब समाधि के निमित्त मुनीश्वर का मन उदय हुआ और विन्ध्याचल पर्वत की कन्दरा में जा बैठा । पूर्व जो विचार अभ्यास किया था और परावर परमात्मादृष्टि हुई थी उससे फिर चित्त को कहा कि हे चित्त और इन्द्रियों ! मैंने तुम्हारा पूर्व प्रहार कर छोड़ा है । अब तुम्हारे अचित्त में अर्थ अनर्थ कोई नहीं, क्योंकि अस्ति नास्ति कलना मेरी नष्ट हुई है । अस्ति नास्ति के पीछे जो शेष रहता है उसमें स्थित हूँ । जैसे पहाड़ का शृंग अचल होता है तैसे ही अचल हूँ । सदा उदयरूप आत्मा की नाईं स्थित हूँ और सदा ज्ञानस्वरूप प्रकाशवान् हूँ । असत् की नाईं इस प्रकार कि सदा अक्रियरूप हूँ और असतरूप उदय की नाईं स्थित हूँ । असत् इस प्रकार से मन इन्द्रियों का विषय नहीं और उदय की नाईं इस कारण से कि सबका साक्षीभूत हूँ और सदा समरस प्रकाशरूप अपने आप में स्थित हूँ । प्रबुद्ध और सुषुप्तिविषय स्थित हूँ । प्रबुद्ध इस कारण कि जो