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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 773, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 773

७८२ योगवाशिष्ठ ।

यह कैसे भासित हुई ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! चित्त सर्वात्मरूप है, जैसा जैसा उसमें फुरना होता है तैसा ही भासता है । जैसे जैसे देश काल का फुरना होता है जैसे ही अनुभव होता है । हे रामजी ! जितना प्रपञ्च है वह मनोमात्र है । जैसा फुरना तीव्र होता है वैसे ही अनुभवसत्ता में भासित हो वहाँ स्थित होता है । जब और भ्रम में गया तो नियम के अनुसार तैसे ही होता जाता है । जो अज्ञानी होता है उसको वासना से नाना प्रकार का जगत् भासता है और जो ज्ञानवान् होता है वह सब आत्मा को देखता है, उसका फुरना भी अफुरना है और वासना भी अवासना है । बीतव मुनीश्वर ने चित्त के फुरने से इतना देखा परन्तु स्वस्थरूप था इससे उसकी वासना भी अवासना थी । जैसे भुना बीज नहीं उगता तैसे ही उसकी वासना भी अवासना थी और भ्रान्ति का कारण न था । फिर कल्पपर्यन्त वह चन्द्रधार सदाशिवजी का गण हो समस्त विद्याओं का ज्ञाता और सर्वज्ञ त्रिकालदर्शी जीवन्मुक्त होकर विचरा । हे रामजी ! जैसा किसी का संस्कार दृढ़ होता है तैसा ही उसको अनुभव होता है । जैसे बीतव चित्त को स्पन्द करके जीवन्मुक्ति का अनुभव करता था । रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! जो ऐसे हैं तो जीवन्मुक्ति के मत में बन्ध मोक्ष हुआ ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जीवन्मुक्ति को सब ब्रह्मस्वरूप भासता है बन्ध व मोक्ष अवस्था उसमें कहाँ है ? ज्ञानमात्र आकाश में जैसा फुरना होता है तैसा ही भासता है । हे अङ्ग ! यह सब चिन्मात्रस्वरूप है और जगत् नाना प्रकार का मन से भासता है, वास्तव में न जगत् है, न अजगत् है केवल ब्रह्मसत्ता स्थित है । जगत् में भूत भविष्यत् केवल ब्रह्मसत्ता भासती है । चिन्मात्र से भिन्न जगत् मन के फुरने से भासता है जिनको ऐसा ज्ञान नहीं उनको जगत् वज्रसार से भी दृढ़ हो भासता है और ज्ञानवान् को आकाशवत् भासता है । हे रामजी ! अज्ञान से मन उपजा है उससे सम्पूर्ण जगत् हुआ है वास्तव में और कुछ नहीं । जैसे समुद्र में तरङ्ग और उल्लास होते हैं तैसे ही चिदाकाश में आकर भासते हैं । जब चित्त अचित्त हो जाता है तब कुछ द्वैत नहीं भासता ।

इति श्रीयोग० उपशम० बीतवमनोयज्ञवर्णनन्नामाशीतितमसर्गः ॥८०॥