योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 774, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपशम प्रकरण ।
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रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! वीतहव मुनीश्वर का जो शरीर विन्ध्या- चल पर्वत में फँसा था फिर उसकी क्या अवस्था हुई ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! उसके अनन्तर आत्मवेत्ता वीतहव मुनीश्वर एक काल में शरीर गणों को मन से विचारने लगा कि कई नष्ट हो गये हैं। उन अनष्टों में पृथ्वी के मध्य जो उसका स्थित था उसको देखा कि कन्दरा की धूलि में वर्षा से फँस गया है और ऊपर तृणजाल जम गया है। उसको देखकर कहने लगा कि इसमें प्रवेश करूँ पर फिर विचार किया कि यह तो जड़ गूँगा और फँसा हुआ है और इसको मैं नहीं निकाल सकता, इससे सूर्य- मण्डल को जाऊँ कि सूर्य के सारथी अरुण पंगु इसको निकालेंगे, अथवा इसके साथ मेरा क्या प्रयोजन है ? यह नाश हो जावे अथवा रहे इतना यत्न मैं किस निमित्त करूँ ? मैं अपने निर्गुण स्वरूप में स्थित होऊँ देह से मेरा क्या है। इस प्रकार विचार वीतहव तूष्णीम हो गया और एक क्षण के अनन्तर फिर चिन्तन करने लगा कि पृथ्वी में न कुछ त्यागने योग्य है और न कुछ ग्रहण करने योग्य है, इससे देह को त्यागना और रखना समान है तो यह शरीर किस निमित्त दवा रहे । कुछ काल और इसका प्रारब्ध वेग है इसलिये जो आकाश में सूर्य स्थित है उसमें प्रवेश करूँ-जैसे आदर्श में प्रतिबिम्ब प्रवेश करता है और उस शरीर को सूर्य के सारथी से निकलवाऊँ । हे रामजी ! ऐसे विचारकर मुनीश्वर पुर्यष्टकरूप से आकाशमार्ग में चढ़ा और प्रणाम करके सूर्य के भीतर वायुरूप हो प्रवेश किया-जैसे शस्त्र पिण्ड में अग्नि प्रवेश करती है। सूर्य भगवान् ने जाना कि वीतहव मुनीश्वर ने प्रवेश किया है और सर्वज्ञ थे इससे जाना कि पृथ्वी में इसका शरीर कीचड़ और तृणों से दवा हुआ है उसके निकलवाने के निमित्त आया है। ऐसे विचार सूर्य ने अपने सारथी से कहा। हे सारथी ! विन्ध्याचल पर्वत की कन्दरा में वीतहव मुनीश्वर का शरीर दवा पड़ा है उसको तू जाकर निकाल दे। तब अरुण नामक सारथी ने जिसका शरीर हाथी के समान है विन्ध्या- चल पर्वत में आकर नखों से वह शरीर निकाला। उसके नख ऐसे थे जिनसे वह पहाड़ उखाड़ डाले उन नखों से धराकोटर में गड़े हुए उस