योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 775, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७८४ | योगवाशिष्ठ । |
|---|
शरीर को उसने निकाला जैसे समुद्र के तीरे भीह की तन्तु को कीड़ा पाते हैं तैसे ही पर्वत की कन्दरा से उस शरीर को निकाल डाला । तब मुनीश्वर ने पुर्य्यष्टका से उस शरीर में प्रवेश किया-जैसे पक्षी आकाश मार्ग से उड़ता-उड़ता आलय में आ प्रवेश करे । सावधान होकर अरुण को नमस्कार किया और अरुण ने भी वीतह्य को नमस्कार किया और अपने-अपने कार्य की ओर हुए । अरुण तो आकाशमार्ग को गया और मुनीश्वर का शरीर कीचड़ से भरा हुआ था इससे उसने तालाब पर जाकर डुबकी मारी और जैसे हाथी मल धोता है तैसे ही स्नान करके सन्ध्यादिक कर्म किये और सूर्य भगवान् का पूजन किया । जैसे प्रथम तप से शरीर शोभता था तैसे ही भूषित किया और मैत्री, समता, सत्, मुदिता आदिक गुणों से सम्पन्न होकर ब्रह्मलक्ष्मी से सुशोभित हुआ और सबके सङ्ग से रहित भी रहा कि इन गुणों को भी स्वरूप में स्पर्श न करे और आपको शुद्ध स्वरूप जाने ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे वीतहवसमाधियोगोपदेशो नामैकाशीतितमस्सर्गः ॥ ८१ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार जब कुछ दिन व्यतीत हुए तब समाधि के निमित्त मुनीश्वर का मन उदय हुआ और विन्ध्याचल पर्वत की कन्दरा में जा बैठा । पूर्व जो विचार अभ्यास किया था और परावर परमात्मादृष्टि हुई थी उससे फिर चित्त को कहा कि हे चित्त और इन्द्रियों ! मैंने तुम्हारा पूर्व प्रहार कर छोड़ा है । अब तुम्हारे अचित्त में अर्थ अनर्थ कोई नहीं, क्योंकि अस्ति नास्ति कलना मेरी नष्ट हुई है । अस्ति नास्ति के पीछे जो शेष रहता है उसमें स्थित हूँ । जैसे पहाड़ का शृंग अचल होता है तैसे ही अचल हूँ । सदा उदयरूप आत्मा की नाईं स्थित हूँ और सदा ज्ञानस्वरूप प्रकाशवान् हूँ । असत् की नाईं इस प्रकार कि सदा अक्रियरूप हूँ और असतरूप उदय की नाईं स्थित हूँ । असत् इस प्रकार से मन इन्द्रियों का विषय नहीं और उदय की नाईं इस कारण से कि सबका साक्षीभूत हूँ और सदा समरस प्रकाशरूप अपने आप में स्थित हूँ । प्रबुद्ध और सुषुप्तिविषय स्थित हूँ । प्रबुद्ध इस कारण कि जो