योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 772, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपशम प्रकरण । ७८१
रूप हूँ, सब ताप मेरे नष्ट हुए हैं और नित्यशुद्ध निदानन्द परब्रह्मस्व- रूप हूँ । जगत् की सत्य-असत्य कलना मेरी नष्ट हुई है, क्योंकि कलना सब चित्त में थी, जब चित्त निर्वाण हो गया तब कलना कहाँ रही ? मैं केवल शुद्ध आत्मा हूँ, मेरा प्रतियोगी कोई नहीं और न व्यवच्छेद है, क्योंकि दूसरा कोई नहीं केवल चित्त की चेतना फुरती थी सो निर्वाण हो गई है और अब मैं स्वस्थ हुआ हूँ । जैसे तरङ्गों से रहित समुद्र अचल होता है तैसे ही सर्वकलना से रहित मैं वीतराग हूँ और संवेदन से रहित समसत्तामात्र अपने आपमें स्थित हूँ ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उपशमप्रकरणे वीतद्योपाख्याने चित्तोपदेशोनाम- कोनाशीतितमसर्गः ॥ ७९ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार वीतहव्य ने निर्वासनिक हो निर्णय करके विन्ध्याचल पर्वत की कन्दरा में समाधि लगाई और आकाशवत् निर्मलचित्त हो इन्द्रियों की वृत्ति बाहर से खींचकर अचल की और फिर ग्रीवा को सम करके चित्त की वृत्ति अनन्तआत्मा साक्षीभूत में स्थित की । जैसे लकड़ियों को जलाकर अग्नि की ज्वालाशान्त हो जाती है तैसे ही उसके प्राण और मन की वृत्ति का स्पन्द मिट गया और जैसे शिला में खोदी हुई पुतली होती है और मूर्ति की लिखी हुई पुतली होती है तैसे ही स्थित हो गया । मेघों की वर्षा शिर पर हो, मण्डलेश्वर शिकार खेलें बड़े शब्द रीझ हों, और वानर शब्द करें, वारहसिंहों और हाथियों के शब्द हों, वन में अग्नि लगे, पत्थरों की वर्षा हों, वायु चले और धूप पड़े तो भी वह समाधि से न जागे और जैसे पहाड़ में शिला दबी होती है तैसे ही उसका शरीर दब गया । जब तीन सौ वर्ष इसी प्रकार व्यतीत हुए तब चित्त फुर आया कि शरीर मेरे साथ है परन्तु प्राण नहीं फुरे और चित्त के फुरने में आपको कैलास पर्वत के ऊपर और कदम्ब के वृक्ष के नीचे देखा । सौ वर्ष पर्यन्त मौन होकर जीवन्मुक्त और निर्मल आत्मा हो बिचरा । सौ वर्ष पर्यन्त विद्याधर होकर विद्याधरों में बिचरा, उसके अनन्तर और पद्म- युग बीतकर इन्द्र हुआ तब देवता उसे नमस्कार करते थे । रामजी ने पूछा हे भगवन् ! देश काल और मनादिक प्रतिभा उसको अनियत अग्नि-