योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 756, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपशम प्रकरण । ७६५
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! विवेकी पुरुष को जो भोग निकट आ प्राप्त होते हैं तो भी उनकी इच्छा नहीं करता, क्योंकि उसको उसमें अर्थबुद्धि नहीं—जैसे चित्र की लिखी हुई सुन्दर कमलिनी के निकट भँवरा आन प्राप्त होता है तो भी उसकी इच्छा नहीं करता । हे रामजी ! सुख दुःख की प्राप्ति और निवृत्ति में इच्छा तब तक होती है जब तक देहाभिमान होता है, जब देहाभिमान निवृत्त हुआ तब कुछ इच्छा नहीं होती । हे रामजी ! ममता करके दुःख होता है, जब रूप को नेत्र देखता है तब उसको इष्ट मानकर प्रसन्न होता है और अनिष्ट मानकर द्वेष करता है जैसे बैल भारवाहक की चेष्टा करता है उसको लाभ और हानि कुछ नहीं और जिसको उसमें ममत्व होता है वह लाभ-हानि का हर्ष शोक करता है, तैसे ही ममत्व से जीव इन्द्रियों के विषयों में हर्ष शोकवान् होता है । जैसे गर्दभ कीचड़ में डूबे और राजा शोक करे कि मेरे नगर का गर्दभ डूबा है, तैसे ही ममत्व करके इन्द्रियों के विषयों में जीव दुःख पाता है, नहीं तो गर्दभ कीचड़ में डूबे तो राजा का क्या नष्ट होता है । हे रामजी ! यह इन्द्रियाँ तो अपने विषयों को ग्रहण करती हैं और इनमें जीव तपायमान होता है सो ही आश्चर्य है । जिन विषयों की जीव चेष्टा और इच्छा करते हैं सो क्षण में नष्ट हो जाते हैं । हे रामजी ! जो मार्ग में किसी के साथ स्नेह हो जाता है तो ममत्व और प्यार से दुःख होता है । जो देह में ममत्व करेगा उसको दुःख क्यों न होगा ? चाहे कैसा ही बुद्धिमान् हो वा शूरमा हो तो भी संग से बन्धवान् होता ही है अर्थात् इन्द्रियों के विषयों का अहंमम भाव ग्रहण करेगा तो उनके नाश होने से वह भी नष्ट होवेगा । जिन नेत्रों का विषय रूप है सो नेत्र साक्षी होकर रूप को ग्रहण करता है और जीव ऐसा मूर्ख है कि औरों के धर्म आपमें मान लेता है और उनमें तपायमान होता है । जैसे भ्रम दृष्टि से आकाश में मोर पुच्छवत् तरुवरे और दूसरा चन्द्रमा भासता है, तैसे ही मूर्खता से जीव इन्द्रियों के धर्म अपने में मान लेता है । जैसे इन्द्रियों का साक्षी होकर जीव विषयों को ग्रहण करता है तैसे ही चित्त भी अभिमान से रहित साक्षी होकर ग्रहण करे तो रागद्वेष से तपायमान न हो जैसे जल