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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 755, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 755

७६४ | योगवाशिष्ठ ।

क्योंकि उसको आत्मा जगत्रूप भासता है और सम्यक्दर्शी को केवल आत्मा भासती है । जैसे रस्सी में असम्यक्दर्शी को सर्प भासता है और सम्यक्दर्शी को रस्सी ही भासती है । सर्वसंवेदन और संकल्प से रहित शुद्ध संवित् परमात्मा है उसको जो जानता है वही परमात्मा का जाननेवाला बुद्धीश्वर है । इससे भिन्न अविद्या है । हे रामजी ! आत्म-तत्त्व सदा अपने आपमें स्थित है उसमें द्वैतकल्पना कोई नहीं । ऐसा जो यथार्थदर्शी है वही सम्यक्दर्शी है । सर्व आत्मा पूर्ण है उसमें भाव, अभाव, बन्ध, मोक्ष कोई नहीं और न एक है, न द्वैत है, ब्रह्मा ही अपने आपमें स्थित है जो सब चिदाकाश है तो बन्ध किसे कहिये और मोक्ष कौन हो ? ऐसा जिसको ज्ञान है उसको काष्ठ-पाषाण ब्रह्मा से च्यूटी पर्यन्त सम भासता है अल्पमात्र भी भेद नहीं भासता तो वह कल्पना के सम्मुख कैसे हो ? हे रामजी ! वस्तु के आदि-अन्त अन्वय व्यति-रेक करके आत्मा सिद्ध होता है अर्थात् पदार्थ है तो भी आत्मसत्ता से सिद्ध होता है और जो पदार्थ का अभाव हो जाता है तो भी आत्म-सत्ता शेष रहती है । तुम उसी के परायण हो रहो । वही अनुभवसत्ता जगत्रूप होकर भासती है और जरा-मरण आदिक जो नाना प्रकार मे विकार वस्तुरूप भासते हैं वह वस्तु अपने आपमें ही फुरती है । जैसे जल में द्रवता से नाना प्रकार के तरङ्गबुद्बुदे होते हैं सो वे जलरूप हैं । कुछ भिन्न नहीं, तैसे ही चित्त के फुरने से जो नाना प्रकार के पदार्थ भासते हैं सो आत्मरूप हैं । आत्मतत्त्व ही अपने आपमें स्थित हैं, जब उसमें स्थित होता है तब फिर दीन नहीं होता जो पुरुष दृढ़ विचारवान् है वह भोगों से चलायमान नहीं होता-जैसे मन्द पवन से सुमेरु पर्वत चलायमान नहीं होता-और जो अज्ञानी है और विचार से रहित मूढ़ है उसको भोग ग्रास कर लेते हैं-जैसे जल से रहित मछली को बगुला खा लेता है । जिसको सर्व आत्मा भासता है वह सम्यक्दर्शी पुरुष कहलाता है-वही मुक्तरूप है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे सम्यक्ज्ञानवर्णनन्नाम चतुःसप्ततितमसर्गः ॥ ७४ ॥