योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपशम प्रकरण । ७६३
सकते। हे रामजी ! जिस द्रव्य में मारने की सत्ता है वह मारता है और मद्य में मत्त करने की शक्ति है तैसे ही द्रव्य योग, काल आदिक में सिद्धता शक्ति नियत हुई है। जैसे एक औषध में क्लेश करने की शक्ति है तो उसके खाने से क्लेश होता है तैसे ही इनमें अपनी-अपनी शक्ति है । जो इनको साधता है उसको ये प्राप्त होती हैं । आत्मज्ञानी जो उसको साधन करे तो वह कर्त्ता में भी अकर्त्ता है। आत्मज्ञान के पाने में सिद्धि कुछ उपकार नहीं कर सकती परन्तु जो इनकी वाञ्छा करे तो यत्न करके पाता है—यत्न बिना नहीं पाता । आत्मज्ञानी को इच्छा भी नहीं होती क्योंकि आत्मलाभ से उसकी सब इच्छाएँ शान्त हो जाती हैं। हे रामजी ! जितने लाभ हैं उनसे परम उत्तम आत्मलाभ है । आत्मा को पाकर फिर किसी की इच्छा नहीं होती । जैसे अमृत के पान किये और जल की इच्छा नहीं होती तैसे ही आत्मा के लाभ से और इच्छा नहीं होती । ऐसा आत्मलाभ जिसने पाया है उसको इन सिद्धियों की इच्छा कैसे हो ? जैसी-जैसी किसी की इच्छा होती है उसको वैसा ही प्राप्त होता है । ज्ञानी हो अथवा ज्ञान से रहित हो इच्छा और प्रयत्न के अनुसार ही प्राप्त होती है । यह जो वीतहव था उसको इच्छा कुछ न थी और प्रथम जो सूर्य के पास जाने की शक्ति दृष्टि आई थी सो क्रिया के साधने से थी, पीछे जब ज्ञान उपजा तब इच्छा कुछ न रही । हे रामजी ! जो कुछ किसी को फल प्राप्त होता है सो अपने प्रयत्न से प्राप्त होता है । जो ज्ञानवान् है वह सदा तृप्त रहता है उसको इष्ट-अनिष्ट की इच्छा कुछ नहीं फुरती । फिर रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! तीन सौ वर्ष वीतहव्य मुनीश्वर समाधि में रहा तो उसका शरीर पृथ्वी में पृथ्वी क्यों न हो गया और सिंह, भेड़िये, सियार आदिक उसको क्यों न भोजन कर गये ? पीछे विदेह-मुक्त हुआ, प्रथम क्यों न हुआ ? पृथ्वी में दबे हुए शरीर को निकालने के निमित्त बड़ा यत्न क्यों किया, इन संशयों को निवारण करो !
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! संवित् वासना के साथ बँधी हुई सुख दुःख को भोगती है और मलीनभाव से घिरी हुई है, जो वासना से रहित शुद्ध सत्तारूप है और जो सुख दुःख के भोग से रहित है और किसी