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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 785, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 785

७६४ योगवाशिष्ठ ।

कारण छेदी नहीं जाती । हे रामजी ! जिस-जिस पदार्थ में चित्त लगता है वही-वही पदार्थ स्वरूप में भासते हैं, यह पदार्थ की शक्ति है । जैसी पदार्थों में शक्ति होती है तैसे ही भासती है, इस कारण बहुत वर्ष व्यतीत होते हैं तो भी समाधि के बल से उसका शरीर ज्यों का त्यों रहता है, क्योंकि चित्त जिस पदार्थ में लगता है उसका रूप हो जाता है । जैसे मित्र को मित्रभाव से देखता है तो स्वाभाविक ही प्रसन्न होता है और शत्रु को देखकर चित्त में स्वाभाविक ही अप्रसन्नता फुर आती है, मीठी वस्तु को देखकर चित्त स्वाभाविक ही लोलुप हो जाता है और कटुक में विरसता को प्राप्त होता है, मार्ग चलनेवाले का चित्त मार्ग के पर्वत और वृक्षों के राग से बन्धायमान नहीं होता, चन्द्रमा के निकट गये से शीतलता होती है और सूर्य के निकट उष्णता प्राप्त होती है सो पदार्थ की शक्ति है । जिस पदार्थ के साथ वृत्ति का स्पर्श होता है उसका स्वाभाविक आरम्भ सफल होता है । तैसे ही योगी जब देह और इन्द्रियों की वासना और ममत्वभाव को त्याग करके समभाव में प्राप्त होता है तब उसको समभाव का अनुभव होता है अर्थात् सबमें एक ही भासता है । इस कारण शरीर को सिंहादिक कोई भोजन नहीं कर सकते और जो जीव उसके घात करने को आते हैं वे हिंसाभाव को त्याग अहिंसक हो जाते हैं । वीतव का शरीर जो छेद को न प्राप्त हुआ और न पृथ्वी में पृथ्वी हो गया उसका यह कारण है कि सर्वत्र समता आकाश एक ही स्थित है और काष्ठ, लोष्ट, पत्थर ब्रह्मादि तृणपर्यन्त सबमें एक अनुस्यूत है, जहाँ पुर्यष्टका होती है वहाँ भासता है और जहाँ पुर्यष्टका नहीं होती वहाँ नहीं भासता, जैसे सूर्य का प्रतिबिम्ब सब ठौर में पूर्ण है परन्तु जहाँ स्वच्छ ठौर, दर्पण, जल आदि होते हैं वहाँ भासता है और जहाँ उज्ज्वल ठौर नहीं होता वहाँ प्रतिबिम्ब नहीं भासता तैसे ही जहाँ पुर्यष्टका है वहाँ संवित् भासती है, अन्यथा नहीं भासती । इस कारण वीतव की संवित् जो समभाव में स्थित है उसको किसी तत्त्व और जीव का क्षोभ नहीं होता । पंचतत्त्वों का क्षोभ तब होता है जब प्राण फुरते हैं और जब प्राण फुरने में गदित होते हैं तब तत्त्वों का क्षोभ