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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 786, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 786

उपशम प्रकरण । ७६५

नहीं होता, वीतहव की प्राणों के भीतर और बाहर की स्पन्दकला शान्त हो गई थी और प्राण और चित्तकला दोनों फुरने से रहित थीं, इससे उसका हृदय भी क्षोभित न हुआ । हे रामजी ! देहरूपीगृह में जब चित्त और वायु का स्पन्द शान्त हो जाता है तब शरीर नष्ट हो जाता है और सब सुमेरु की नाईं स्थित हो जाता है, तब किसी की सामर्थ्य नहीं होती कि इसको क्षोभ करे और नाश करे । योगीश्वर का चित्त और प्राण निस्पन्द हो जाते हैं । वह इनको वश करके लगाता है तब उसको न तत्त्वों का क्षोभ होता है, न पित्त, कफ का क्षोभ होता है और न और कुछ क्षोभ होता है । इस कारण योगी का शरीर सहस्र वर्ष पर्यन्त भी ज्यों का त्यों रहता है, नष्ट नहीं होता । जैसे वज्र को कोई चूर्ण नहीं कर सकता तैसे ही उसके शरीर को कोई नष्ट नहीं कर सकता—सब की शक्ति उसपर कुण्ठित हो जाती है । इस कारण वीतहव का शरीर ज्यों का त्यों रहा । पहले वह विदेहमुक्त क्यों न हुआ सो भी सुनो । हे रामजी ! जो तत्त्वज्ञ और विदितवेद, वीतराग महाबुद्धिमान हैं जिनकी अभिमानरूपी गाँठि टूट पड़ी है वे पुरुष स्वतन्त्र स्थित होते हैं, उनका न कोई प्रारब्धकर्म है, न संचितकर्म है और न वर्त्तमान का कर्म है । तत्त्ववेत्ता सबसे मुक्त, स्वतन्त्र और स्वेच्छित बिचरता है और जैसी इच्छा करे तैसी शीघ्र ही होती है । हे रामजी ! वीतहव को जब अकस्मात् से जीने का स्पन्द फुर आया तब वह कुछ काल जीता रहा और जब उसकी संवित् में विदेहमुक्त होने का स्पन्द फुरा तब विदेहमुक्त हो गया । ज्ञानवानों की स्थिति स्वाभाविक स्वतन्त्र होती है, जिसकी वे वाञ्छा करते हैं सो तत्काल ही हो जाता है, और मन आत्मपद में स्थित होता है, उनको कुछ कृत और कर्तव्य नहीं ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे सिद्धिलाभविचारो नाम पञ्चाशीतितमसर्गः ॥ ८५ ॥

रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! आपने कहा कि जब विचार से वीतहव का चित्त शान्त हो गया तब उसको मैत्री, करुणादिक गुण प्राप्त हुए, परन्तु जब विवेक से उसका चित्त नष्ट हो गया तो फिर मैत्री आदिक