योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
उपशम प्रकरण । ७६५
नहीं होता, वीतहव की प्राणों के भीतर और बाहर की स्पन्दकला शान्त हो गई थी और प्राण और चित्तकला दोनों फुरने से रहित थीं, इससे उसका हृदय भी क्षोभित न हुआ । हे रामजी ! देहरूपीगृह में जब चित्त और वायु का स्पन्द शान्त हो जाता है तब शरीर नष्ट हो जाता है और सब सुमेरु की नाईं स्थित हो जाता है, तब किसी की सामर्थ्य नहीं होती कि इसको क्षोभ करे और नाश करे । योगीश्वर का चित्त और प्राण निस्पन्द हो जाते हैं । वह इनको वश करके लगाता है तब उसको न तत्त्वों का क्षोभ होता है, न पित्त, कफ का क्षोभ होता है और न और कुछ क्षोभ होता है । इस कारण योगी का शरीर सहस्र वर्ष पर्यन्त भी ज्यों का त्यों रहता है, नष्ट नहीं होता । जैसे वज्र को कोई चूर्ण नहीं कर सकता तैसे ही उसके शरीर को कोई नष्ट नहीं कर सकता—सब की शक्ति उसपर कुण्ठित हो जाती है । इस कारण वीतहव का शरीर ज्यों का त्यों रहा । पहले वह विदेहमुक्त क्यों न हुआ सो भी सुनो । हे रामजी ! जो तत्त्वज्ञ और विदितवेद, वीतराग महाबुद्धिमान हैं जिनकी अभिमानरूपी गाँठि टूट पड़ी है वे पुरुष स्वतन्त्र स्थित होते हैं, उनका न कोई प्रारब्धकर्म है, न संचितकर्म है और न वर्त्तमान का कर्म है । तत्त्ववेत्ता सबसे मुक्त, स्वतन्त्र और स्वेच्छित बिचरता है और जैसी इच्छा करे तैसी शीघ्र ही होती है । हे रामजी ! वीतहव को जब अकस्मात् से जीने का स्पन्द फुर आया तब वह कुछ काल जीता रहा और जब उसकी संवित् में विदेहमुक्त होने का स्पन्द फुरा तब विदेहमुक्त हो गया । ज्ञानवानों की स्थिति स्वाभाविक स्वतन्त्र होती है, जिसकी वे वाञ्छा करते हैं सो तत्काल ही हो जाता है, और मन आत्मपद में स्थित होता है, उनको कुछ कृत और कर्तव्य नहीं ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे सिद्धिलाभविचारो नाम पञ्चाशीतितमसर्गः ॥ ८५ ॥
रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! आपने कहा कि जब विचार से वीतहव का चित्त शान्त हो गया तब उसको मैत्री, करुणादिक गुण प्राप्त हुए, परन्तु जब विवेक से उसका चित्त नष्ट हो गया तो फिर मैत्री आदिक
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गुण कहाँ आन प्राप्त हुए ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! चित्त का नाश दो प्रकार का है। जीवन्मुक्त का चित्त अचित्तरूप हो जाता है और विदेह-मुक्त का चित्त स्वरूप से नष्ट हो जाता है। जैसे भुना दाना होता है तैसे ही जीवन्मुक्त का चित्त देखने में चित्तरूप है सार्थक नहीं और जैसे दाना नष्ट हो जावे तैसे ही विदेहमुक्त का चित्त देखनेमात्र भी नहीं रहता। हे रामजी ! चित्त की सत्यता ही दुःखों का कारण है और चित्त की असत्यता ही सुखों का कारण है। जिस चित्त में विषयों की वासना फुरती है सो चित्त जन्मों का देनेवाला है और दुःखों का कारण है। गुणों के संग से अहंमम भाव में रहता है और चित्त की सत्यता से जीव कहाता है। हे रामजी ! जब तक चित्त विद्यमान है तब तक अनन्त दुःख होता है। दुःखरूपी वृक्ष का बीज चित्त ही है। जब चित्त नष्ट होता है तब कल्याण होता है। रामजी ने पूछा, हे ब्राह्मण ! मन किसका नाम है ? कैसे नष्ट होता है और कैसे अस्त होता है सो कहिये ? वशिष्ठजी ने कहा, हे प्रश्नकर्त्ताओं में श्रेष्ठ ! चित्तसत्ता का लक्षण मैंने तुमसे कहा है, अब चित्त मृतक का लक्षण सुनो। जिसको सुख और दुःख की दशा स्वरूप से चला नहीं सकती। जैसे सुमेरु को पवन चला नहीं सकता तैसे ही जिसके चित्त को दुःख चला नहीं सकता तिसका चित्त मृतक जानो, अर्थात् जो चित्त सत्पद को प्राप्त हुआ है उस चित्त से मिथ्या चिन्ता नष्ट हो जाती है। जैसे भुने दाने में अंकुर नष्ट हो जाता है तैसे ही उसका चित्त नष्ट हो जाता है। जिसको आत्मा से भिन्न कुछ नहीं फुरता वह चित्त मृतक हुआ है। हे रामजी ! जिसके चित्त को अहं इच्छा द्वेषादिक विकार तुच्छ न कर सके उसका चित्त मृतक जानो और जिसको इन्द्रियों के विषय इष्ट-अनिष्ट न कर सके और रागद्वेष और ग्रहण त्याग की द्वैतभावना न उपजे ज्यों का त्यों रहे उसी पुरुष का चित्त मृतक जानो। जिसका चित्त नष्ट हुआ है उसे जीवन्मुक्त जानो। जिसको संसार के इष्ट पदार्थों में राग होता है वह ग्रहण की इच्छा करता है और अनिष्ट की प्राप्ति में द्वेष करके त्यागने की इच्छा करता है। अहंममभावसंयुक्त देह में जो अभिमान है इससे आपको सुखी दुःखी मानता है यदि वासना संयुक्त है सो चित्त जीता है—यह चित्त-
उपशम प्रकरण । ७६७
सत्यता है जब चित्त संसार से विरक्त हो और सत्संग और सत्शास्त्रों का श्रवण और मनन और स्वरूप का अभ्यास करे तब चित्त अचित्त हो जाता है और परमानन्द की प्राप्ति होती है और तभी जीवन्मुक्त होकर विचरता है । जिस प्रकार मैत्री आदिक गुण जीवन्मुक्त में होते हैं सो भी सुनो । हे रामजी ! चित्त में जो संसार की सत्यतारूपी मैल है यही चित्त-भाव है । वह जब आत्मज्ञान से नष्ट हो जाता है तब मैत्री आदिक गुण आन प्राप्त होते हैं । जैसे सूर्य के उदय हुए तम नष्ट जाता है और प्रकाश उदय होता है और जैसे भूने दाने का अंकुर जल जाता है तैसे ही ज्ञान से चित्त का चित्तत्वभाव नष्ट हो जाता है और मैत्री आदिक गुण उदय होते हैं । तब देखनेमात्र चित्त दीखता है ब्रह्मवेत्ता अज्ञानी की नाईं यत्न करता भासता है परन्तु अज्ञानी का चित्त जन्म का कारण है ज्ञानी का चित्त जन्म का कारण नहीं। जैसे कच्चा दाना उगता है, भुना नहीं उगता, तैसे ही अज्ञानी जन्मता है, ज्ञानी नहीं जन्मता । जैसे चन्द्रमा राहु से छूटता तब चित्त में मैत्री, करुणा आदिक गुण उदय होते हैं और जैसे वसन्तऋतु के आये बेलें सब प्रफुल्लित हो जाती हैं तैसे ही चित्तभाव मिटे से मैत्री आदिक गुण स्वाभाविक फुरते हैं। जो विदेहमुक्त होता है उसका चित्त स्वरूप से भी नष्ट हो जाता है और वहाँ गुण कोई नहीं रहता वह अवस्था और कोई नहीं जानता, विदेहमुक्त ही जानता है । उसमें द्वैतकल्पना कुछ नहीं फुरती और निर्मल पावन पद है । हे रामजी ! जीवन्मुक्त का चित्त स्वरूप में अचित्त होकर रहता है और विदेहमुक्त में चित्त स्वरूप से नष्ट हो जाता है इस कारण जीवन्मुक्त में मैत्री आदिक गुण पाये जाते हैं । आत्मा जो निर्मल और निष्कङ्क है सो चित्त के नष्ट हुए विदेहमुक्त में रहता है, उसमें गुणों की कल्पना कोई नहीं फुरती वह परमपावन निर्मल पद में स्थित होता है और शान्ति आदिक गुण भी नष्ट हो जाते हैं, क्योंकि चित्त स्वरूप से नष्ट हो जाता है । चित्त के नष्ट हुए चित्त की अवस्था कहाँ रही । तब न कोई गुण रहता है न अवगुण रहता है, न वह गुणों से उत्पन्न हुआ सार कहाता है और न अवगुणों से उत्पन्न हुआ असार कहाता है, न लोलुप
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है, न लक्ष्मी है, न अलक्ष्मी है, न उदय है न अस्त है, न हर्ष है, न शोक है, न तेज है, न तम है, न दिन है, न रात्रि है, न संध्या है, न दिशा है, न आकाश है, न अर्थ है, न अनर्थ है, न वासना है, न अवासना है, न अञ्जन है, न निरञ्जन है, न सत्य है, न असत्य है, न चन्द्रमा है, न तारे हैं और न सूर्य है ऐसा जो सर्वकल्पना से रहित शरत्काल के आकाश की नाईं निर्मल और बुद्धि से परे पद है उसमें और की गम नहीं। जैसे आकाश के स्थान को पवन जानता है तैसे ही उसकी अवस्था को वही जाने। वहाँ स्थित हुए सब दुःख शान्त हो जाते हैं और ब्रह्मानन्द में लीन हो जाता है। ज्ञानवान् आकाश की नाईं निर्मलपद को प्राप्त होता है जिसके पाये से और पाना कुछ नहीं रहता।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे ज्ञानावविचारो नाम षडशीतितमस्सर्गः ॥ ८६ ॥
रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! परमाकाश के कोश में एक पहाड़ है उस पर जगतरूपी एक वृक्ष है, तारे उसके फूल हैं, मेघ पत्र हैं, सूर्य, चन्द्रमा स्कन्ध है और देवता, दैत्य, मनुष्यादिक सब जीव उस पर पखेरू हैं। सातों समुद्र उस पहाड़ पर बावलियाँ हैं और अनन्त नदियाँ उसमें प्रवेश करती हैं। चतुर्दश प्रकार के भूतजात उसमें उत्पन्न होते हैं और सुखदुःखरूपी फलों से पूर्ण है, और मोहरूपी जल से वह सींचा जाता है सो दृढ़ होकर स्थित हुआ है। उसका बीज कौन है ? बोध की वृद्धि के निमित्त यह ज्ञानरूपी सार मुझसे संक्षेप से कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस संसार का बड़ा बीज चित्त (अहंता) है, जिसके भीतर आरम्भ की घनता है। जब शुभ अशुभ का आरम्भ शरीर का अंकुर होता है तब शुभ अशुभ करता है, इससे संसार का बीज चित्त ही है, और शरीर का बीज भी चित्त ही है, राजस, सात्त्विक और तामस वृत्ति उसकी टहनियाँ हैं। वही जन्ममरण का भंडार है और सुखदुःखरूपी रत्नों का डब्बा है। ऐसा जो चित्त है वह इस शरीर का कारण है। हे रामजी ! जो कुछ जगज्जाल दृष्टि आता है वह सब असद्रूप है। चित्त के फुरने से नाना प्रकार के आडम्बर भासते हैं। जैसे गन्धर्वनगर नाना प्रकार के आरम्भ सहित भ्रम
उपशम प्रकरण ।
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से भासता है और संकल्पपुर भासता है सो असत् है तैसे ही यह जगत् असत् है। जैसे मृत्तिका में घटभाव होता है तैसे चित्त में जगत् का सद्भाव होता है। चित्तरूपी अंकुर के वृत्तिरूपी दो टास होते हैं—एक प्राणों का फुरना और दूसरा दृढ़भावना। जब प्राणस्पन्द होता है और हृदयमात्र में जो एकसौ एक नाड़ी हैं उनकी ओर संवेदनरूप चित्त उदय होता है तब प्राणस्पन्द फुरता है। जब प्राण फुरता है तब शुद्ध सात्त्विक चित्त उपजता है और उसमें जगत् भासता है। जैसे आकाश में नीलता भासती है तैसे ही प्राणों में नीलता भासती है। जब प्राणस्पन्द होता है तब चित्तसंवित् उछलती है—जैसे हाथ से ताड़ना किया गेंद उछलता है। जैसे प्राणस्पन्द में सर्वगत संवित् उपलब्धरूप होती है और वहाँ प्रतिबिम्बरूप होकर सात्त्विकभाग में स्थित होती है और महासूक्ष्म से सूक्ष्म है—जैसे वायु में गन्ध रहती है। वही संवित्रूप को त्यागकर जब बहिर्मुख धावती है तब उससे नाना प्रकार के जगत् भासते हैं और नाना प्रकार की वासना उठती हैं और उनसे अनेक दुःखों को प्राप्त होता है। इससे हे रामजी ! संवित् को अन्तर्मुख रोकना ही कल्याण का कारण है। जब संवित् स्वरूप में स्थित होती है तब क्षोभ मिट जाता है और जब शुद्ध संवित् में अहं उल्लेख फुरता है तब वेदनरूप होती है सो ही चित्त है, चित्त से अनेक दुःख होते हैं और चित्त का अनर्थ का होना कारण है। जब चित्त न उपजे तब शान्ति हो जाती है और चित्त तब निवृत्त होता है जब प्राणस्पन्द रोकिये अथवा वासना नष्ट हो ध्यान और प्राणायाम से योगीश्वर प्राणों को रोकता है तब चित्त स्थित हो जाता है। यह योग से अनुभव करता है। ज्ञान से जो अनुभव होता है सो भी सुनो। हे रामजी ! चित्त वासना से उत्पन्न होता है और वासना विचार से रहित फुरती है जैसे बालकों को जन्म से ही स्तनों से दूध पीने की वृत्ति फुरती है तैसे ही अकस्मात् भावना की दृढ़ता से वासना फुर आती है। हे रामजी ! जिसमें पुरुष की तीव्र भावना होती है वही रूप पुरुष का होता है। स्वरूप के प्रमाद से जो भासित होता है उसमें दृढ़ प्रतीत हो जाती है तब उसकी भावना करता है और जगत् की वासना से मोह प्राप्त होता है
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स्वतः सिद्ध जो अनुभवरूप आत्मा है उसको जान नहीं सकता। वासना की प्रबलता से स्वरूप का त्याग करता है और भ्रान्तिरूप जगत् को सत्य देखता है—जैसे मद्य से मत्त को पदार्थ और के और भासते हैं तैसे ही मूर्खों को वासना के बल से जगत् के पदार्थ सत्य भासते हैं। हे रामजी ! असम्यक्ज्ञान से जीव दुःखी होता है, शान्ति को नहीं प्राप्त होता और मन की चिन्ता से जलता है। मन किसका नाम है सो सुनो। जो सम्यक्ज्ञान से अनात्मा में आत्मभावना हो और वस्तु आत्मा में अवस्तु अनात्मभावना हो उसका नाम मन है। वह मन ऐसे उत्पन्न होता है कि प्रथम चेतन संवित् में पदार्थों की चिन्तना होती है फिर तीव्र पदार्थों की दृढ़भावना होती है तब वही चेतन संवित् चित्त-रूप हो जाती है। उस चित्त में फिर जन्ममरणादिक विकार उपजते हैं और फिर किसी का ग्रहण और किसी का त्याग करता है। जब ग्रहण और त्याग का संकल्प हृदय से निवृत्त हो तब चित्त भी मृतक हो जावै। जब वासना नष्ट हो जाती है तब मन आत्मपद को प्राप्त होता है। मन का अमन होना ही परम उपशम का कारण है। हे रामजी ! जो कुछ जगत् के पदार्थ हैं उनकी अभावना कीजिये और सब अवस्तुभूत जगत् का त्याग कीजिये तब हृदय आकाश में चित्त शान्त होगा। हे रामजी ! चित्त का स्वरूप इतना है। जब पदार्थों से रस उठ जावे तब चित्त फिर नहीं उपजता। जबतक पदार्थों का रस फुरता है तबतक स्थल रहता है और असम्यक्ज्ञान से अनात्मा में जो आत्मभावना है ज्यों ज्यों यह दृढ़ होती है त्यों त्यों चित्तरूपी वृक्ष अनर्थ के निमित्त बढ़ता जाता है और ज्यों ज्यों अनात्मा से आत्मबुद्धि निवृत्त हो जाती है अर्थात् अव-स्तु में वस्तुबुद्धि नहीं होती त्यों त्यों चित्तरूपी वृक्ष क्षीण होता जाता है सो कल्याण के निमित्त है। जब चित्त यथार्थ देखता है तब चित्त अचित्त हो जाता है, सब आशा निवृत्त हो जाती है और परम शान्ति और शीतलता हृदय में स्थित होती है तब पदार्थों को ग्रहण भी करता है परन्तु हृदय से रागसंयुक्त वासना निवृत्त होती है तो उससे चित्त शान्ति की प्राप्त होता है। हेरामजी ! जीवन्मुक्त में भी चेष्टा दृष्टि आती है परन्तु जन्मका
उपशम प्रकरण ।
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कारण नहीं होती क्योंकि मन में मन का सद्भाव नहीं होता है। जैसे नटुवा अभिमान से रहित अनेक प्रकार के स्वाँग धरता है तैसे ही वह अभिमान से रहित चेष्टा करता है और जैसे कुम्हार का चक्र भ्रमता भ्रमता तोड़ना से रहित हुआ शनैःशनैः स्थिर हो जाता है तैसे ही ज्ञानवान् का चित्त चेष्टा करता दृष्ट भी आता है परन्तु जन्म का कारण नहीं होता और प्रारब्धभोग समाप्त होता है तब स्वाभाविक ठहर जाता है। जैसे भुना बीज नहीं उगता तैसे ही राग से रहित ज्ञानी की चेष्टा जन्म का कारण नहीं होती, देखने मात्र ज्ञानी और अज्ञानी की चेष्टा तुल्य होती है। जैसे भुना और कच्चा बीज एक समान भासता है परन्तु कच्चा उगता है और भुना नहीं उगता तैसे ही ज्ञानी की चेष्टा जन्म का कारण नहीं होती क्योंकि उसका चित्त शान्त हो जाता है। हे रामजी! जिसकी चेष्टा अभिमान से रहित है वह जीवन्मुक्त कहाता है। उसका चित्त केवल चिन्मात्र को प्राप्त हुआ है और वह जब शरीर को त्यागता है तब अचित्तरूप चिदाकाश होता है। हे रामजी! चित्त के दो बीज हैं—एक प्राणों का फुरना और दूसरा वासना का फुरना। जब दोनों में एक का अभाव हो जाता है तब दोनों नष्ट हो जाते हैं—ये परस्पर कारणरूप हैं। जैसे ताल से मेघ जल पान करके फिर वर्षा से ताल को पुष्ट करता है सो परस्पर कारणरूप है, तैसे ही प्राणस्पन्द और वासना परस्पर कारणरूप हैं। जैसे बीज से अंकुर होते हैं और अंकुर से बीज होते हैं तैसे ही प्राणस्पन्द से वासना होती है और वासना से प्राणस्पन्द होता है। ये दोनों चित्त के कारण हैं। जैसे फूल बिना सुगन्ध नहीं और सुगन्ध बिना फूल नहीं होता तैसे ही वासना बिना प्राण नहीं होते और प्राण बिना वासना नहीं होती। हे रामजी! जब वासना फुरती है तब संवित् में क्षोभ होता है और वह प्राणों को जगाती है तब उससे जगत् उपजता है। जब हृदय में प्राणस्पन्द के धर्म होते हैं तब संवित् क्षोभवान् होता है और चित्त-रूपी बालक उपजता है। इस प्रकार वासना और प्राण दोनों चित्त के कारण हैं। जब दोनों में एक का नाश हो जावे तब दोनों नाश हो जावें और चित्त का भी नाश हो जावे। हे रामजी! चित्तरूपी एक वृक्ष
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है, सुखदुःखरूपी उसके स्कन्ध हैं, चिन्तारूपी फल है, कार्यरूपी पत्र हैं, वृत्तिरूपी बेल से वेष्टित हुआ है और रागद्वेषरूपी दो बगले उस पर आन बैठे हैं तृष्णारूपी काली सर्पिणी से वेष्टित है और इन्द्रियाँरूपी पक्षी उस पर आन बैठे हैं, इच्छादिक रोगों से पुष्ट होता है और अज्ञान इसका मूल है । जब अवासणारूपी खड्ग से शीघ्र ही काटा जाता है तब संसार की अभावना और स्वरूप की भावना से शीघ्र ही नष्ट हो जाता है । जैसे तीक्ष्ण पवन से पका हुआ फल वृक्ष से शीघ्र ही गिर पड़ता है तैसे ही आत्मभाव से फल गिर पड़ता है । हे रामजी ! चित्तरूपी आँधी ने सब दिशा मलीन करके प्रकाश को घेर लिया है और तृष्णारूपी तृण उसमें उड़ते हैं। शरीररूपी स्तम्भाकार बायगोला अज्ञानरूपी कुण्ड से उपजा हुआ बड़े क्षोभ को प्राप्त करता है । जब हृदय में प्रकाश हो तब तम को दूर करे और जब स्पन्द रोकिये तब धूलि शान्त हो जाती है । आत्मविचार से जब वासना रहित हो तब शरीररूपी धुआँ शान्त हो जावे । हे रामजी ! प्राणों के रोकने से शान्ति होती है और वासना के न उदय होने से चित्त स्थिर हो जाता है । प्राणस्पन्द और वासना का बीज संवेदन है, जब शुद्ध संवित्मात्र से संवेदन को त्याग करे तब वासना और प्राण दोनों न फुरैं । जैसे वृक्ष का बीज और मूल काट डालिये तो फिर नहीं उगता, तैसे ही इनका मूल संवेदन है । जब संवेदन का अभाव हो तब दोनों नहीं बनते । संवेदन का बीज आत्मसत्ता है, संवित्सत्ता से संवेदन प्रकट हुआ है उससे भिन्न नहीं । जैसे तिलों में तेल के सिवा और कुछ नहीं होता तैसे ही संवित्सत्ता के सिवा हृदय में और कुछ नहीं पाया जाता-वही संकल्प द्वारा संवेदन को देखता है । जैसे स्वप्न में मनुष्य अपनी मृत्यु देखता है और देशान्तर को प्राप्त होता है तैसे ही आत्मसत्ता संवेदनरूप होती है अर्थात् चिन्मात्र संवित् में संवेदन का उत्थान होता है कि 'अहं अस्मि' तब संवेदन जगत्जाल दिखाती है । अपना ही संवेदन उठकर आपको भ्रम दिलाता है—जैसे बालक को अपने संकल्प से उपजा वैताल सत्य भासता है और जैसे स्थाणु में पुरुष भासता है तैसे ही संवित् में संवेदन भासता है । हे रामजी ! असम्पक्ज्ञान से संवेदनरूप हो जाता
उपशम प्रकरण । ८०३
हैं तो उसमें आत्मबुद्धि होती है और सम्यक्ज्ञान से लीन हो जाता है । जैसे रस्सी में असम्यक्ज्ञान से सर्प भासता है तैसे ही आत्मा में संवेदन भासता है । तीनों जगत् ब्रह्म संवित् रूप हैं, संवेदन भी कुछ भिन्न नहीं । जिनको यह निश्चय दृढ़ होता है उनको बुद्धेश्वर सम्यक्ज्ञानी कहते हैं । प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष जो जगत् है उसमें वस्तुबुद्धि त्याग करने से भी संसार के पार होता है और जो अवस्तुरूप जानकर न त्यागेगा तो जगत् बड़े विस्तार को पावेगा । हे रामजी ! संवेदन का जो उत्थान होता है सो बड़े दुःखों का देनेवाला है और संवेदन जो जड़वत् अजड़ है वह परम सुख सम्पदा का कारण है सो उत्थान से रहित आनन्दस्वरूप है । जिसको संवेदन उत्थान से रहित असंवेदन संवित् आत्मा की बुद्धि हुई है वह संसारसमुद्र से पार होता है । रामजी ने पूछा, हे प्रभो ! जड़ता से रहित असंवेदन कैसे होता है और असंवेदन से जड़ता कैसे निवृत्त होती है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जो सब ठौर में आसक्त नहीं होता और कहीं चित्त की वृत्ति नहीं लगती और जिसमें जीवत्व को कुछ ज्ञान न रहे वह असंवेदन जड़ता से रहित संवेदन स्पन्दरूप है जिससे दृश्य भासता है सो दृश्य की ओर से जड़ है और स्वरूप में चेतन है वह अजड़ कहलाता है । हे रामजी ! हृदयाकाश जो चेतन संवित् है उससे संवेदन का स्पर्श कुछ न हो ऐसा संवित् अजड़ है । देवता, नाग, दैत्य, राक्षस, हाथी, मनुष्य आदिक स्थावर जङ्गमरूप सब वही धारती है । हे रामजी ! अपनी चेष्टा से संवित् आपको आप ही बँधाती है । जैसे कुसवारी आप ही आपको गृह में बँधाती है तैसे ही संवित् आपको बँधाती है । जब अपनी ओर आती है तब आप ही आपको प्राप्त होती है । हे रामजी ! जगत् जाग्रत् रूपी समुद्र है उसमें संवित् रूपी जल है जिससे सब स्थान पूर्ण हो गये हैं । अन्तरिक्ष, पृथ्वी, आकाश, पर्वत, नदी आदिक सब संवित् रूपी जल की लहरें हैं इससे सब जगत् संवित् मात्र है और उसमें द्वैतकल्पना का अभाव है । यह सम्यक्ज्ञान है । इस संवित् का बीज चिन्मात्र है उसमें द्वैतकल्पना का अभाव है । यह सम्यक्ज्ञान है इस संवित् का बीज चिन्-मात्र है और चिन्मात्रसत्ता से संवित् उदय हुआ है—जैसे प्रकाश से ज्योति
८०४ योगवाशिष्ठ ।
उदय होती है । इस सत्ता के दो रूप हैं-एक रूप नाना प्रकार हो भासता है और दूसरा एक ही रूप है । घट, पट, तत्त्व आदिक एक सत्ता के नाना प्रकार विभाग स्थित हैं और विभाग से रहित एक सत्ता स्थित है-वह सत्तासमान अद्वैतरूप परमार्थ है । हे रामजी ! विषय को त्यागकर जो चिन्मात्र है वह अलेप एक रूप है सो ही महासत्ता है । उसको ज्ञानवान् परमसत्ता कहते हैं । नाना आकार भी वह सत्ता कभी नहीं धारती । यह संवेदन से हुए हैं इस कारण अवस्तुरूप हैं । एक रूप जो परम सत्ता निर्मल अविनाशी है वह न कभी नष्ट होता है और न विस्मरण होता है, क्योंकि अनुभवरूप है । हे रामजी ! एक कालसत्ता है और एक आकाशसत्ता है सो यह सत्ता अवस्तुरूप है। इस विभागसत्ता को त्यागकर चिन्मात्रसत्ता के परायण हो । कालसत्ता और आकाशसत्ता यद्यपि उत्तम है परन्तु वास्तव नहीं । जहाँ नाना विभागकल्पना, आकार और नाना कारण हैं वह पवित्रकर्त्ता पावन नहीं । इसी से कहा है कि आकाश काल आदिक सत्ता वास्तव नहीं और सत्तासमान जो संवित्मात्र है वह सबका बीज है उसी से सबकी प्रवृत्ति होती है । हे रामजी ! जो कुछ पदार्थ हैं उनकी कलना सत्तासमान में हुई है । उस अनन्त, अनादि बीजरूप परमपद का बीज और कोई नहीं । जब उसका भान हो तब यह निर्विकार होकर स्थित हो । जीवन्मुक्त उसी को कहते हैं जिसे दृश्य की भावना कुछ न फुरे । जैसे बालक मूक और अभिमान से रहित होता है तैसे ही ज्ञान से जीव निर्वासनिक हो तब जड़ता से मुक्त होता है और सर्व आत्मभाव को प्राप्त होता है । जिस संवित् में दृश्य का स्पर्श होता है वह संवित् जड़ है, क्योंकि शुद्धस्वरूप में मलीन का स्पर्श होता है। जो संवित् द्वैत फुरने से रहित है वह शुद्ध और अजड़ है और द्वैतभाव को ग्रहण करती है वह स्वरूप की ओर से जड़ है । हे रामजी ! जिसकी स्वरूप की ओर स्थित हुई है और दृश्यभाव का लेप नहीं होता है वह सर्ववासना को त्यागकर निर्विकल्प समाधि में लगता है । जैसे आकाश में नीलता स्वाभाविक वर्तती है तैसे ही योगी आनन्द में वर्तती है और निस्संवेदन संवित् में प्रविष्ट होकर वही रूप हो जाता है जिसके मन की
उपशम प्रकरण। ८०५
वृत्ति वहाँ स्थिर हो जाती है और बैठते, चलते, स्पर्श करते, सुगन्ध लेते, देखते, सुनते और सब इन्द्रियों की क्रिया करते भी मन स्थिर रहता है दृश्य का अभिमान नहीं फुरता वह अजड़ कहाता है और संवेदन से रहित सुखी होता है। हे रामजी ! ऐसी दृष्टि प्रथम तो कष्टरूप भासती है परन्तु पीछे सब दुःख का नाशकर्ता होती है, इससे इसी दृष्टि का आश्रय करके दुःखरूप जो संसारसमुद्र है उससे तर जाओ। जैसे वट का बीज सूक्ष्म होता है पर विस्तार को पाकर आकाश को स्पर्श करने लगता है तैसे ही सूक्ष्म संवेदन से जब संकल्प फैलता है तब वही बड़े जगत् के विस्तार को धारता है और जन्म के जाल को प्राप्त होता है। बीजरूप से आपही अपने को जन्मों में डालता और फिर फिर मोह में गिरता है। जब संवित् अपनी ओर होती है तब मोक्ष को प्राप्त होता है और जैसी भावना स्वरूप में दृढ होती है वही सिद्ध होती है। जैसे नटुआ अनेक स्वाँग को धारता है तैसे ही संवित् अनेक आकारों को धारती है। जब नट भूमिका को त्यागता है तब अपने स्वरूप में प्राप्त होता है। हे रामजी ! संवित्स्वरूप नटकी जगतरूप धारकर नृत्य करती है। जो दुःखरूप संसार-समुद्र में न गिरे सो सत्ता सब कारणों की कारण है और उसका कारण कोई नहीं और वही सब सारों का सार है उसका सार कोई नहीं। उसी चेतनरूपी बड़े दर्पण में समस्त जगत् प्रतिबिम्बित होता है। जैसे ताल में किनारे के वृक्ष प्रतिबिम्बित होते हैं तैसे ही सब वस्तु चिद्दर्पण में प्रतिबिम्बित होती है। हे रामजी! जो कुछ पदार्थ हैं वे सब आत्मसत्ता से सिद्ध होते हैं और उसी अनुभव में सबका अनुभव होता है। जैसे षड्रसों का स्वाद जिह्वा से सिद्ध होता तैसे ही सब पदार्थ चिदाकाश के आश्रय सिद्ध होते हैं। जगद्गण उसी से उपजते हैं, उसी में वर्तते और बढ़ते हैं, उसी में स्थित दिखते हैं और उसी में लय होते हैं। सबका अधिष्ठान वही सत्ता है और गुरु का गुरु, लघु की लघुता, स्थूल की स्थूलता, सूक्ष्म की सूक्ष्मता, द्रव्यों का द्रव्य, कष्टों में कष्ट, बड़े में बड़ाई, तेज का तेज, तम का तम, वस्तु की वस्तु, द्रष्टा का द्रष्टा, किंचन में किंचन, निष्किंचन में निष्किंचन, तत्त्वों का तत्त्व, असत्य का असत्य, सत्य का सत्य, आश्रय में आश्रय और
८०६ योगवाशिष्ठ ।
अनाश्रम में अनाश्रम वही है। हे रामजी! ऐसी जो परमपावन सत्ता है उसमें प्रयत्न करके स्थित हो, फिर जैसे इच्छा हो तैसे करो। वह आत्मतत्त्व निर्मल, अजर, अमर, शान्तरूप और चित्त के क्षोभ से रहित है, उसमें भव (संसार) से मुक्ति के निमित्त स्थित हो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे स्मृतिबीजविचारो नाम सप्तशीतितमस्सर्गः ॥८७॥
रामजी ने पूछा, हे महानन्द के देनेवाले! यह जो बीजों का बीज आपने कहा है सो किस प्रकार प्राप्त हो? जिस प्रकार उस पद की शीघ्र प्राप्ति हो वह उपाय कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! इन सबके बीज का जो उत्तर दिया है उस उपाय से परमपद की प्राप्ति होती है। अब और भी जो तुमने पूछा है वह सुनो। सत्तासमान में स्थित होने के निमित्त यत्न कर्तव्य है। जो कुछ संसार की वासना है बल करके उसको त्याग करिये और शुद्ध आत्मा में तीव्र अभ्यास करिये तब शीघ्र ही अविघ्न आत्म-स्वरूप की प्राप्ति होगी। हे तत्त्ववेत्ता! उस पद में एक क्षण भी स्थित होगे तो अक्षयभाव को प्राप्त होगे। हे रामजी! सत्तासमान संवित्-मात्र तत्त्व है उसमें स्थित होके जो इच्छा हो सो करो तब उसके सिवा और कुछ सिद्ध न होगा—सब वही भासेगा। ऐसा जो अनुभवतत्त्व है वह तुम्हारा स्वरूप है उसके ध्यान में स्थित हुए तुमको कुछ खेद न होगा। संवेदन के साथ ऐसा ध्यान नहीं होता और वह ऊँचा पद है पुरुष प्रयत्न से उस पद को प्राप्त हो। हे रामजी! केवल संवेदन के साथ ध्यान नहीं होता क्योंकि सर्वत्रसम्भव संवित् तत्त्व है। संवित् सर्वदा सर्व-काल सहायक होती है और सबसे मिली हुई है जो कुछ चित्तवे जो इच्छित हो, जो कुछ करे सो सब संवित् से सिद्ध होता है। हे रामजी! आत्मतत्त्व प्रत्यक्ष है पर उसका भान नहीं होता और जो कुछ भासता है वही अविद्या आवरण है सो इसका दुःख होता है। स्वरूप के प्रसाद से जो दृश्य की वासना करता है उसकी दृढ़ता से अन्तःकरण दुःख पाता है। जब यत्न करके वासना का त्याग करिये तब मन और शरीर के दुःख सब नाश हो जायेंगे। पूर्व जो मोह दृढ़ हो रहा है—जैसे मेरु को मूल
उपशम प्रकरण । ८०७
से उखाड़ना कठिन है तैसे ही वासना का त्याग कठिन है । वह वासना मन से होती है, जब तक मन क्षय नहीं होता तब तक वासना भी क्षय नहीं होती । तत्त्वज्ञान बिना मन का नाश नहीं होता । वासना और मन का आवरण एक साथ दूर होता है । यह परस्पर कारणरूप है । इससे हे रामजी ! तुम पुरुषप्रयत्न करके मन के संकल्प विकल्प को निवृत्त करो और अभ्यास और विचार करके विवेक का उपाय करो और भोगों की वासना दूर से त्यागो—इसी से तुम शान्तिमान होगे । इन तीनों के सम अभ्यास से तत्त्वज्ञान, मनोनाश और वासनाक्षय का बारम्बार अभ्यास करो । जबतक इनको न साधोगे तबतक अनेक उपायों से भी शान्ति को न प्राप्त होगे । हे रामजी ! वासना क्षय हो और मनोनाश और तत्त्वज्ञान से वासना क्षय न करे तो कार्य सिद्ध नहीं होता और जो मनोनाश करे और तत्त्वज्ञान से वासना क्षय न करे तब भी कल्याण न होगा और तत्त्वज्ञान का विचार करे और वासना क्षय न हो तो भी कुशल न होगी । जब इन तीनों का सम अभ्यास हो तब फल की प्राप्ति हो । हे रामजी ! एक के सेवन से सिद्धता नहीं प्राप्त होती—जैसे मन्त्र को कोई प्रतिबन्ध लय न करे तो मन्त्र फलदायक नहीं होता और एक-एक चरण पढ़े तो भी फलदायक नहीं होता जबतक सब मन्त्र संध्यादिक एक ठौर नहीं होते तबतक मन्त्र नहीं फुरते, तैसे ही अकेले से कार्य सिद्ध नहीं होता । जब चिरकाल इनको इकट्ठा सेवे तब कार्य हो । जैसे सेनासंयुक्त बड़ा शत्रु हो और उसके मारने को एक शूरमा जावे तो शत्रु को मार नहीं सकता और यदि इकट्ठे सेना पर जा पड़ें तब उसको जीत लेवें, तैसे ही संसाररूपी शत्रु के नाश के लिये जब तत्त्वज्ञान, मनोनाश और वासनाक्षय का इकट्ठा अभ्यास हो तब संसाररूपी शत्रु का नाश हो । हे रामजी ! जब तीनों का अभ्यास करोगे तब हृदय की 'अहं' 'मम' ग्रन्थि टूट पड़ेगी । अनेक जन्मों की संसारसत्यता जो इसके हृदय में स्थित हो रही है सो अभ्यासयोग से टूट पड़ेगी इससे चलते, बैठते, खाते, पीते, सुनते, सूँघते, स्पर्श करते और जागते इन तीनों का अभ्यास करो । हे रामजी ! वासना के त्याग से प्राणस्पन्द रोका जाता है । जब प्राणों
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का स्पन्द रोका तब चित्त अचित्त हो जाता है। एक प्राणों के रोकने से ही वासना क्षय हो जाती है, तब भी चित्त अचित्त हो जाता है। आत्म-योग से अथवा वासना के त्याग से आत्मतत्त्व प्रकाशेगा। इनमें जो तुम्हारी इच्छा हो वही करो, चाहे प्राणों को योग से रोको और चाहे वासना का त्याग करो। प्राणायाम तब होता है जब गुरु की दी हुई युक्ति स्थित होती है और आसन और आहार के संयम से प्राणों का स्पन्द रोका जाता है। जब सम्यक्ज्ञान से जगत् को अवास्तव जानता है तैसे वासना नहीं प्रवर्त्तती । जो जगत् के आदि और अन्त में स्थित है उसमें मन जब स्थित होता है तब वासना नहीं उपजती । हे रामजी ! जब व्यवहार में निःसंग और संसार की भावना से विवर्जित होता है और शरीर में असत् बुद्धि होती है तब भी वासना नहीं प्रवर्त्तती और जब विचार करके वासना क्षय हो तब चित्त भी नष्ट हो जावेगा जैसे वायु के ठहरने से धूल नहीं उड़ती तैसे ही वासना के क्षय हुए चित्त नहीं उपजता । जो प्राणस्पन्द है वही चित्तस्पन्द है। जब वासना फुरती है तब जगतभ्रम उपजता है। जैसे पवन से धूल उपजती है तैसे ही चित्त से वासना उपजती है जब प्राणस्पन्द ठहरता है तब चित्त भी ठहर जाता है, इससे यत्न करके प्राणस्पन्द अथवा वासना के जीतने का अभ्यास करो तब शान्तिमान् होगे और जो यह उपाय न करो और दूसरे यत्न से चित्त वश करने का उपाय करोगे तो बहुत काल में आत्म-पद को पावोगे। हे रामजी ! इस युक्ति के बिना मन के जीतने का और कोई उपाय नहीं है । जैसे मतवाले हाथी को अंकुश बिना वश करने का उपाय और कोई नहीं तैसे ही मन भी युक्ति बिना वश नहीं होता । वह युक्ति यह है, कि सन्तों की संगति और सत्शास्त्रों का विचार करना । इस उपाय से तत्त्वज्ञान, वासनाक्षय और प्राणों का स्पन्द रोकना होता है । चित्त वश करने की यह परमयुक्ति है-इससे चित्त शीघ्र ही जीता जाता है। जो इन उपायों का त्यागकर हठ से मन वश किया चाहते हैं वे क्या करते हैं ? जैसे तम के नाश करने को दीपक जलावे तो नाश हो जाता है और शस्त्रों से तम को काटे तो तम नाश न
उपशम प्रकरण । ८०६
होवेगा तैसे ही और उपायों से चित्त वश न होगा। इस बिना जो और उपाय करते हैं वे मूर्ख हैं। जैसे मतवाला हाथी कमल की ताँत से बाँधा नहीं जाता और जो कोई इससे बाँधने लगे तो महामूर्ख है, तैसे ही मन के जीतने को और प्रकार जो हठ करते हैं सो महामूढ़ हैं। और उपाय करके क्लेश प्राप्त होगा आत्मसुख प्राप्त न होगा। जैसे दुर्भागी जीवों को कहीं सुख नहीं होता है। हे रामजी! जिसने तीर्थ, दान, तप और देवताओं की पूजा—यह चारों साधन किये हैं और मन जीतने का उपाय नहीं किया वह मृग की नाईं भ्रमता फिरता है और पहाड़ों की कन्दरा में फल और पत्र खाता फिरता है, क्योंकि उसने मन का नाश नहीं किया इससे आत्मपद को नहीं पाया वह पशुओं के समान है, जैसे और पशु होते हैं तैसे ही वह भी है। हे रामजी! जिस पुरुष ने मन को वश नहीं किया उसको शान्ति नहीं होती। जैसे कोमल अङ्गवाला मृग घाम में जाने से शान्ति पाता और जैसे जल में पड़ा तृण नदी के वेग से भटककर कष्टवान् होता है तैसे ही वह पुरुष कर्म करता है और मन को स्थित किये बिना कष्ट पाता है। कभी दुःख से जलता है और कभी कर्मों के वश से स्वर्ग को प्राप्त होता है पर वह भी नष्ट हो जाते हैं। जैसे जल में तरंग उछलते हैं, कभी अधः को जाते और कभी ऊर्ध्व को जाते हैं तैसे ही कर्मों के वश से जीव स्वर्ग नरक में भ्रमते हैं। इससे ऐसी दृष्टि का त्याग करके शुद्ध संवित्मात्र का आश्रय करे और वीतराग होकर स्थित हो। हे रामजी! जगत् में ज्ञान-वान ही सुखी है और जीता भी वही है, और सब दुःखी और मृतक समान हैं। और बली भी ज्ञानवान् ही है जो मोहरूपी शत्रु को मारकर संसारसमुद्र के पार होता है और सब निर्बल हैं। इससे तुम भी ज्ञानवान् हो संवेदन रहित जो संवित्मात्र तत्त्व है उसमें स्थित हो वह एक है और सबके आदि, सबसे उत्तम, कलना से रहित और सबमें स्थित है तो कर्त्ता हुए भी अकर्त्ता होगे और परब्रह्म उदय होगा।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे अष्टाशीतितमस्सर्गः ॥ ८८ ॥
८१० | योगवाशिष्ठ ।
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जिस पुरुष ने आत्मविचार कर अपना चित्त अल्प भी निग्रह किया है वह सम्पूर्ण फल को प्राप्त होगा और उसी का जन्म सफल होगा । हे रामजी ! जिस चित्त में विचाररूपी कण का उदय हुआ है वह अभ्यास से बड़े विस्तार को पावेगा । हृदय में जो वैराग पूर्वक विचार उपजता है तो वह बढ़ता जाता है और अविद्या रूपी अवगुणों को काट डालेगा और सब शुभगुण आन उसमें आलय करेंगे—जैसे जल से पूर्ण हुए ताल का सब पक्षी आन आश्रय करते हैं । हे रामजी ! जिसको सम्यक्ज्ञान प्राप्त होता है और निर्मल बोध से यथादर्शन होता है उसको इन्द्रियाँ चला नहीं सकतीं । जबतक स्व-रूप का प्रमाद होता है तबतक आधि-व्याधि दुःख होते हैं और जब स्व-रूप में स्थित होती है तब शरीर और मन के दुःख वश नहीं कर सकते—जैसे बिजली को कोई ग्रहण नहीं कर सकता, तैसे पुष्टिकर मेघों को कोई पकड़ नहीं सकता, जैसे आकाश के चन्द्रमा को मुष्टि में कोई नहीं पकड़ सकता और मूढ़ ली चन्द्रमा को मोह नहीं सकती, तैसे ही ज्ञानवान् को कोई दुःख वश नहीं कर सकता । हे रामजी ! जो हाथी मद से मत्त है और जिसके मस्तक से मद झरता है और भँवरे उसके आगे शब्द करते हैं उसको मच्छरों के प्रहार और स्त्री के श्वास नहीं छेद सकते, तैसे ही ज्ञानवान् को विषयों के रागद्वेष नहीं चला सकते । जिस हाथी के मस्तक से मोती निकलता है ऐसे बलवान् हस्ती को नखों से विदारनेवाले सिंह को हरिण नहीं मार सकता, तैसे ही ज्ञानवान् को दुःख नहीं चला सकता जिसके फूत्कार से वन के वृक्ष जल जाते हैं ऐसे सर्प को दर्दुर नहीं ग्रास कर सकते, तैसे ही ज्ञानवान् को रागद्वेष नहीं चला सकते । जैसे राज-सिंहासन पर बैठे राजा को तस्कर दुःख दे नहीं सकते तैसे ही जो ज्ञानी स्वरूप में स्थित है उसको इन्द्रियों के विषय दुःख नहीं दे सकते । जो विचार से रहित देहाभिमानी हैं और आत्मतत्त्व को नहीं प्राप्त हुए उनको विषय उड़ा ले जाते हैं—जैसे सूखे पत्र को पवन उड़ा ले जाता है—और ज्ञानवान् को नहीं चला सकते । जैसे पर्वत मन्द पवन से चलायमान नहीं होता, तैसे ही ज्ञानवान् सुख दुःख में चलायमान नहीं होता और
उपशम प्रकरण। ८११
जो विचार से रहित है वह जगत् को सत् मानता है । सांसारिक पदार्थों में रत मनुष्य गुरु और शास्त्रों के मार्ग से विमुख है और मूढ़ होकर खाने पीने में सावधान है वह विचार से शून्य व मृतक समान है । उसको यह विचार कर्तव्य है कि 'मैं कौन हूँ' 'यह जगत् क्या है' 'कैसे उत्पन्न हुआ है' और 'कैसे निवृत्त होगा' । इस प्रकार विचारकर सन्तों के संग और अध्यात्मशास्त्र के विचार से जो पुरुष दृश्यभाव को त्यागकर आत्मतत्त्व में स्थित होता है वह परमपद पाता है । जैसे दीपक के प्रकाश से पदार्थ पाया जाता है, तैसे ही विचार से आत्मतत्त्व पाया जाता है । हे रामजी ! जिसको शास्त्रविचार से आत्मतत्त्व का बोध होता है वह ज्ञानी कहलाता है और वह ज्ञान ज्ञेय के साथ अभिन्नरूप है । अध्यात्मविद्या के विचार करके आत्मज्ञान प्राप्त होता है । जैसे दूध से मथकर मक्खन निकाला जाता है, तैसे ही विचार से आत्मज्ञान प्राप्त होता है । ज्ञेय जो भीतर है सोई परब्रह्मस्वरूप है और सत्य है पर असत्य की नाई होकर स्थित है । ज्ञानवान् उसको पाकर तृप्त होता है और जीवन्मुक्त होकर अपने आपमें प्रकाशता है । जैसे चक्रवर्ती राज्य से आनन्द और तृप्ति होती है तैसे ही ज्ञानवान् ब्रह्मानन्द में इन्द्रियों की इच्छा से रहित शोभता है और शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध पाँचों इन्द्रियों के विषयों में आसक्त नहीं होता । सुन्दर राग, तन्त्री के शब्द, स्त्रियों के गाने और कोकिलापक्षी और गन्धर्व गन्धर्वी आदि के जो गायन हैं उनमें वह आसक्त नहीं होता । अगर, चन्दन, मन्दार कल्पवृक्ष के सुन्दर फूलों की सुगन्ध, अप्सरा और नागकन्याओं की नाईं सुन्दर स्त्रियों का स्पर्श करने और हीरे, मणि और भूषण और नाना प्रकार के वस्त्रों में वह बन्धवान् नहीं होता । जैसे चन्द्रमा सुन्दर और शीतल है परन्तु सूर्यमुखी कमलों को विकाश नहीं कर सकता तैसे ही सुन्दर स्पर्श ज्ञानी के चित्त को हर्षवान् नहीं करता । जैसे मरुस्थल में हंस प्रसन्न नहीं होता तैसे ज्ञानवान् स्पर्श से प्रसन्न नहीं होता और रसादिक में भी बन्धवान् नहीं होता । दूध, दही, घृतादिक रस, भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्य, यह चारों प्रकार के भोजन और कटु, तीक्ष्ण, मीठा, खारा आदि जितने रस हैं इनकी इच्छा ज्ञानवान् नहीं
८१२ योगवाशिष्ठ ।
करते और किसी में बन्धवान् नहीं होते। वे आत्मबोध से नित्य तृप्त हैं और किसी भोग की इच्छा नहीं करते जैसे ब्राह्मण मुर्गी के मांस के खाने की इच्छा नहीं करते तैसे ही ज्ञानवान् उर्वशी, रम्भा मेनका आदि अप्सराओं की इच्छा नहीं करते और चन्दन, अगर, कस्तूरी, मन्दार आदि वृक्षों के फूलों की सुगन्ध की इच्छा नहीं करते। जैसे मछली मरुस्थल की इच्छा नहीं करती तैसे ही ज्ञानवान् सुगन्ध की इच्छा नहीं करते और रूप की इच्छा भी नहीं करते। सुन्दर स्त्रियाँ बाग, तालाब, नदियाँ इत्यादिक जो रूपवान् पदार्थ हैं तिनकी इच्छा ज्ञानवान् नहीं करते। जैसे चन्द्रमा बादलों की इच्छा नहीं करते तैसे ही ज्ञानवान् रूप की इच्छा नहीं करते। और की क्या बात है, इन्द्र, यम, विष्णु, रुद्र, ब्रह्मा, समुद्र, कैलास, मन्दराचल, रत्न, मणि और कञ्चन ये जो बड़े-बड़े पदार्थ हैं उनकी भी वे इच्छा नहीं करते। जैसे राजा नीच पदार्थों की इच्छा नहीं करता तैसे ही ज्ञानवान् पदार्थों की इच्छा नहीं करते। समुद्र और सिंह के गर्जने और बिजली के कड़कने का जो भयानक शब्द है उसको भी सुनकर वह भयवान् नहीं होते-जैसे शूरमा धनुष का शब्द सुनकर भयवान् नहीं होता। ज्ञानवान् मतवाले हाथी, वैताल, पिशाच और इन्द्र के वज्र के शब्द सुनते और देखते हुए भी कम्पायमान नहीं होते और सत्स्वरूप की स्थिति से कभी चलायमान नहीं होते। शरीर को जो आरे से काटिये, खड्ग से कणकण करिये और बाणों से वेधिये तो भी कम्पायमान नहीं होते। उसको रागद्वेष भी किसी में नहीं होता, यदि शरीर पर एक ओर जलता अङ्गारा रखिये और एक ओर फूलों की माला रखिये तो भी वह हर्ष-शोकवान् नहीं होता। एक ओर असिधारावत् तीक्ष्णस्थान ही और एक ओर पुष्पशय्या हो तो उसको दोनों तुल्य हैं। एक ओर शीतल स्थान हो और एक ओर गरम शिला हो तो दोनों उसको तुल्य हैं। एक ओर मारनेवाला विष हो और दूसरी ओर जियानेवाला अमृत हो तो उसको दोनों तुल्य हैं। हे रामजी ! चाहे सम्पदा प्राप्त हो, चाहे आपदा हो, चाहे मृत्यु हो, चाहे उत्साह हो इनमें व्यवहार करता भी वह दृष्टि आता है परन्तु हृदय से हर्ष और
उपशम प्रकरण। ८१३
शोक नहीं। उसका मन ज्ञानसंयुक्त है और सदा सम रहता है। हे रामजी! लोहे के कुल्हाड़े से उसका मांस तोड़िये, नरक में डालिये और ऊपर शस्त्रों की वर्षा हो तो भी ज्ञानवान् भय न पावेगा और न उद्वेगवान् और न व्याकुल होगा, न दीन होगा। ज्ञानवान् इनमें सदा समदृष्टि होकर पहाड़ की नाई धैर्यवान् स्थित रहता है। हे रामजी! ज्ञानवान् रागद्वेष से रहित है और देह अभिमान से मुक्त हुआ है। उसका शरीर अग्नि में पड़े, वा खाई में गिरे अथवा स्वर्ग में हो उसको दोनों तुल्य हैं और वह हर्ष शोक से रहित है। हे रामजी! जिसके स्वरूप में दृष्टि स्थित हुई है वह चलायमान नहीं होता—जैसे मेरु स्थित है—उसको पवित्र पदार्थ हो अथवा अपवित्र पदार्थ हो, पथ्य हो व कुपथ्य हो, विष हो अथवा अमृत हो, मीठा, खट्टा, सलोना, कड़ुवा, दूध, दही, छास, रस, रक्त, मांस, मद्य, अस्थि, तृण आदिक जो भक्ष्य, भोज्य, लेह्य चोष्य भोजन हैं वह सम हैं। न इष्ट में वह रागवान् होता है और न अनिष्ट में द्वेषवान् है। यदि एक पुरुष प्राणों के निकालने को सम्मुख आवे और दूसरा प्राणों की रक्षा निमित्त आवे तो दोनों को वह आत्मस्वरूप, शान्तमन और मधुररूप देखता है और रागद्वेष से रहित है। रमणीय अरमणीय पदार्थों को वह सम देखता है क्योंकि उसने संसार की आस्था त्याग दी है। बोधस्वरूप में वह निश्चल है, चित्त नीरागपद को प्राप्त हुआ है और सब जगत् उसको आत्मस्वरूप भासता है और शब्द, स्पर्श, रूप, रस गन्ध पञ्चविषयों के भोग अपना अवसर नहीं पाते। जैसे दर्पण देखने से प्रतिबिम्ब भासता है, दर्पण की सुरत रहती तैसे ही वह विषयों में आत्मा देखता है, विषयों की सुरत नहीं रहती। अज्ञानी को इन्द्रियाँ ग्रास लेती हैं—जैसे तृणों को मृग ग्रास लेता है। जिसने आत्मपद में विश्रान्ति पाई है उसको इन्द्रियाँ ग्रास नहीं सकतीं। हे रामजी! अज्ञानरूपी समुद्र में जो पड़ा है और वासनारूपी लहरों से मिलकर उछलता और गिरता है, उसको आशारूपी तेंदुआ ग्रास कर बैठा है और हाय हाय करता है, शान्ति नहीं पाता। जो विचार करके आत्मपद को प्राप्त हुआ है वह विश्रान्ति को पा चलायमान
८१४ योगवाशिष्ठ ।
नहीं होता । जैसे सुमेरु पर्वत जल के समूह से चलायमान नहीं होता तैसे ही वह संकल्प विकल्प में चलायमान नहीं होता । जिसकी आत्मपद में विश्रान्ति हुई है वह उत्कृष्टता को प्राप्त हुआ है । हे रामजी ! उसको यह जगत् ज्ञानमात्र भासता है और वह उसे संवित्मात्र जानकर विचार करता है, न किसी का ग्रहण है और न त्याग करता है । इससे भ्रान्ति को त्यागकर संवित्मात्र ही तेरा स्वरूप है, किसका त्याग करता है और किसका ग्रहण करता है ? जो आदि में भी न हो, अन्त में भी न रहे और मध्य में भासे उसे भ्रममात्र जानिये । इस प्रकार जानकर, भाव अभाव की बुद्धि को त्यागकर और निस्संवेदन रूप होकर संसारसमुद्र से तर जाओ और मन, बुद्धि और इन्द्रियों से कर्म करो चाहे न करो, निसङ्ग होगे तब तुमको लेप न होगा । हे रामजी ! जिसका मन अभिमान से रहित हुआ है वह कर्म करता भी लेपायमान नहीं होता । जैसे मन और ठौर गया होता है तो विद्यमान शब्द अथवा रूप पदार्थों को प्रस्तुत होते भी नहीं जानता, तैसे ही जिसका मन आत्म-पद में स्थित हुआ है उसको सुख दुःख कर्म नहीं लगता जो पुरुष अभिमान से रहित है वह कर्मों में सुख दुःख भोगता दृष्टि आता है परन्तु वह उसको स्पर्श नहीं करते । देखो, यह बालक भी जानते हैं कि मन और ठौर जाता है तो सुनता भी नहीं सुनता, तैसे ही वह पुरुष करता भी नहीं करता । हे रामजी ! जिसका मन असंग हुआ है वह देखता है परन्तु नहीं देखता, सुनता है परन्तु नहीं सुनता, स्पर्श करता है परन्तु नहीं करता, सूंघता और रस लेता है परन्तु नहीं लेता इत्यादिक जो कुछ चेष्टा है सो कर्त्ता भी वह अकर्त्ता है और उसका चित्त आत्मपद में लीन हुआ है । जैसे कोई पुरुष देशान्तर को जाता है तो वह उस देश में व्यवहार कर्म करता है परन्तु उसका चित्त गृह में रहता है तैसे ही ज्ञान-वान् का चित्त आत्मपद में रहता है । यह बात मूर्ख भी जानता है । जैसा वेग मन में तीव्र होता है उसकी सिद्धि होती है और वही भासता है और नहीं भासता । हे रामजी ! सब अनर्थों का कारण संग है, संसार के संग से ही जन्म-मरण के बन्धन को प्राप्त होता है, इससे सब