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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 798, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 798

उपशम प्रकरण । ८०७

से उखाड़ना कठिन है तैसे ही वासना का त्याग कठिन है । वह वासना मन से होती है, जब तक मन क्षय नहीं होता तब तक वासना भी क्षय नहीं होती । तत्त्वज्ञान बिना मन का नाश नहीं होता । वासना और मन का आवरण एक साथ दूर होता है । यह परस्पर कारणरूप है । इससे हे रामजी ! तुम पुरुषप्रयत्न करके मन के संकल्प विकल्प को निवृत्त करो और अभ्यास और विचार करके विवेक का उपाय करो और भोगों की वासना दूर से त्यागो—इसी से तुम शान्तिमान होगे । इन तीनों के सम अभ्यास से तत्त्वज्ञान, मनोनाश और वासनाक्षय का बारम्बार अभ्यास करो । जबतक इनको न साधोगे तबतक अनेक उपायों से भी शान्ति को न प्राप्त होगे । हे रामजी ! वासना क्षय हो और मनोनाश और तत्त्वज्ञान से वासना क्षय न करे तो कार्य सिद्ध नहीं होता और जो मनोनाश करे और तत्त्वज्ञान से वासना क्षय न करे तब भी कल्याण न होगा और तत्त्वज्ञान का विचार करे और वासना क्षय न हो तो भी कुशल न होगी । जब इन तीनों का सम अभ्यास हो तब फल की प्राप्ति हो । हे रामजी ! एक के सेवन से सिद्धता नहीं प्राप्त होती—जैसे मन्त्र को कोई प्रतिबन्ध लय न करे तो मन्त्र फलदायक नहीं होता और एक-एक चरण पढ़े तो भी फलदायक नहीं होता जबतक सब मन्त्र संध्यादिक एक ठौर नहीं होते तबतक मन्त्र नहीं फुरते, तैसे ही अकेले से कार्य सिद्ध नहीं होता । जब चिरकाल इनको इकट्ठा सेवे तब कार्य हो । जैसे सेनासंयुक्त बड़ा शत्रु हो और उसके मारने को एक शूरमा जावे तो शत्रु को मार नहीं सकता और यदि इकट्ठे सेना पर जा पड़ें तब उसको जीत लेवें, तैसे ही संसाररूपी शत्रु के नाश के लिये जब तत्त्वज्ञान, मनोनाश और वासनाक्षय का इकट्ठा अभ्यास हो तब संसाररूपी शत्रु का नाश हो । हे रामजी ! जब तीनों का अभ्यास करोगे तब हृदय की 'अहं' 'मम' ग्रन्थि टूट पड़ेगी । अनेक जन्मों की संसारसत्यता जो इसके हृदय में स्थित हो रही है सो अभ्यासयोग से टूट पड़ेगी इससे चलते, बैठते, खाते, पीते, सुनते, सूँघते, स्पर्श करते और जागते इन तीनों का अभ्यास करो । हे रामजी ! वासना के त्याग से प्राणस्पन्द रोका जाता है । जब प्राणों