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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 799, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 799
८०८योगवाशिष्ठ ।

का स्पन्द रोका तब चित्त अचित्त हो जाता है। एक प्राणों के रोकने से ही वासना क्षय हो जाती है, तब भी चित्त अचित्त हो जाता है। आत्म-योग से अथवा वासना के त्याग से आत्मतत्त्व प्रकाशेगा। इनमें जो तुम्हारी इच्छा हो वही करो, चाहे प्राणों को योग से रोको और चाहे वासना का त्याग करो। प्राणायाम तब होता है जब गुरु की दी हुई युक्ति स्थित होती है और आसन और आहार के संयम से प्राणों का स्पन्द रोका जाता है। जब सम्यक्ज्ञान से जगत् को अवास्तव जानता है तैसे वासना नहीं प्रवर्त्तती । जो जगत् के आदि और अन्त में स्थित है उसमें मन जब स्थित होता है तब वासना नहीं उपजती । हे रामजी ! जब व्यवहार में निःसंग और संसार की भावना से विवर्जित होता है और शरीर में असत् बुद्धि होती है तब भी वासना नहीं प्रवर्त्तती और जब विचार करके वासना क्षय हो तब चित्त भी नष्ट हो जावेगा जैसे वायु के ठहरने से धूल नहीं उड़ती तैसे ही वासना के क्षय हुए चित्त नहीं उपजता । जो प्राणस्पन्द है वही चित्तस्पन्द है। जब वासना फुरती है तब जगतभ्रम उपजता है। जैसे पवन से धूल उपजती है तैसे ही चित्त से वासना उपजती है जब प्राणस्पन्द ठहरता है तब चित्त भी ठहर जाता है, इससे यत्न करके प्राणस्पन्द अथवा वासना के जीतने का अभ्यास करो तब शान्तिमान् होगे और जो यह उपाय न करो और दूसरे यत्न से चित्त वश करने का उपाय करोगे तो बहुत काल में आत्म-पद को पावोगे। हे रामजी ! इस युक्ति के बिना मन के जीतने का और कोई उपाय नहीं है । जैसे मतवाले हाथी को अंकुश बिना वश करने का उपाय और कोई नहीं तैसे ही मन भी युक्ति बिना वश नहीं होता । वह युक्ति यह है, कि सन्तों की संगति और सत्शास्त्रों का विचार करना । इस उपाय से तत्त्वज्ञान, वासनाक्षय और प्राणों का स्पन्द रोकना होता है । चित्त वश करने की यह परमयुक्ति है-इससे चित्त शीघ्र ही जीता जाता है। जो इन उपायों का त्यागकर हठ से मन वश किया चाहते हैं वे क्या करते हैं ? जैसे तम के नाश करने को दीपक जलावे तो नाश हो जाता है और शस्त्रों से तम को काटे तो तम नाश न