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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 803, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 803

८१२ योगवाशिष्ठ ।

करते और किसी में बन्धवान् नहीं होते। वे आत्मबोध से नित्य तृप्त हैं और किसी भोग की इच्छा नहीं करते जैसे ब्राह्मण मुर्गी के मांस के खाने की इच्छा नहीं करते तैसे ही ज्ञानवान् उर्वशी, रम्भा मेनका आदि अप्सराओं की इच्छा नहीं करते और चन्दन, अगर, कस्तूरी, मन्दार आदि वृक्षों के फूलों की सुगन्ध की इच्छा नहीं करते। जैसे मछली मरुस्थल की इच्छा नहीं करती तैसे ही ज्ञानवान् सुगन्ध की इच्छा नहीं करते और रूप की इच्छा भी नहीं करते। सुन्दर स्त्रियाँ बाग, तालाब, नदियाँ इत्यादिक जो रूपवान् पदार्थ हैं तिनकी इच्छा ज्ञानवान् नहीं करते। जैसे चन्द्रमा बादलों की इच्छा नहीं करते तैसे ही ज्ञानवान् रूप की इच्छा नहीं करते। और की क्या बात है, इन्द्र, यम, विष्णु, रुद्र, ब्रह्मा, समुद्र, कैलास, मन्दराचल, रत्न, मणि और कञ्चन ये जो बड़े-बड़े पदार्थ हैं उनकी भी वे इच्छा नहीं करते। जैसे राजा नीच पदार्थों की इच्छा नहीं करता तैसे ही ज्ञानवान् पदार्थों की इच्छा नहीं करते। समुद्र और सिंह के गर्जने और बिजली के कड़कने का जो भयानक शब्द है उसको भी सुनकर वह भयवान् नहीं होते-जैसे शूरमा धनुष का शब्द सुनकर भयवान् नहीं होता। ज्ञानवान् मतवाले हाथी, वैताल, पिशाच और इन्द्र के वज्र के शब्द सुनते और देखते हुए भी कम्पायमान नहीं होते और सत्स्वरूप की स्थिति से कभी चलायमान नहीं होते। शरीर को जो आरे से काटिये, खड्ग से कणकण करिये और बाणों से वेधिये तो भी कम्पायमान नहीं होते। उसको रागद्वेष भी किसी में नहीं होता, यदि शरीर पर एक ओर जलता अङ्गारा रखिये और एक ओर फूलों की माला रखिये तो भी वह हर्ष-शोकवान् नहीं होता। एक ओर असिधारावत् तीक्ष्णस्थान ही और एक ओर पुष्पशय्या हो तो उसको दोनों तुल्य हैं। एक ओर शीतल स्थान हो और एक ओर गरम शिला हो तो दोनों उसको तुल्य हैं। एक ओर मारनेवाला विष हो और दूसरी ओर जियानेवाला अमृत हो तो उसको दोनों तुल्य हैं। हे रामजी ! चाहे सम्पदा प्राप्त हो, चाहे आपदा हो, चाहे मृत्यु हो, चाहे उत्साह हो इनमें व्यवहार करता भी वह दृष्टि आता है परन्तु हृदय से हर्ष और