योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 802, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपशम प्रकरण। ८११
जो विचार से रहित है वह जगत् को सत् मानता है । सांसारिक पदार्थों में रत मनुष्य गुरु और शास्त्रों के मार्ग से विमुख है और मूढ़ होकर खाने पीने में सावधान है वह विचार से शून्य व मृतक समान है । उसको यह विचार कर्तव्य है कि 'मैं कौन हूँ' 'यह जगत् क्या है' 'कैसे उत्पन्न हुआ है' और 'कैसे निवृत्त होगा' । इस प्रकार विचारकर सन्तों के संग और अध्यात्मशास्त्र के विचार से जो पुरुष दृश्यभाव को त्यागकर आत्मतत्त्व में स्थित होता है वह परमपद पाता है । जैसे दीपक के प्रकाश से पदार्थ पाया जाता है, तैसे ही विचार से आत्मतत्त्व पाया जाता है । हे रामजी ! जिसको शास्त्रविचार से आत्मतत्त्व का बोध होता है वह ज्ञानी कहलाता है और वह ज्ञान ज्ञेय के साथ अभिन्नरूप है । अध्यात्मविद्या के विचार करके आत्मज्ञान प्राप्त होता है । जैसे दूध से मथकर मक्खन निकाला जाता है, तैसे ही विचार से आत्मज्ञान प्राप्त होता है । ज्ञेय जो भीतर है सोई परब्रह्मस्वरूप है और सत्य है पर असत्य की नाई होकर स्थित है । ज्ञानवान् उसको पाकर तृप्त होता है और जीवन्मुक्त होकर अपने आपमें प्रकाशता है । जैसे चक्रवर्ती राज्य से आनन्द और तृप्ति होती है तैसे ही ज्ञानवान् ब्रह्मानन्द में इन्द्रियों की इच्छा से रहित शोभता है और शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध पाँचों इन्द्रियों के विषयों में आसक्त नहीं होता । सुन्दर राग, तन्त्री के शब्द, स्त्रियों के गाने और कोकिलापक्षी और गन्धर्व गन्धर्वी आदि के जो गायन हैं उनमें वह आसक्त नहीं होता । अगर, चन्दन, मन्दार कल्पवृक्ष के सुन्दर फूलों की सुगन्ध, अप्सरा और नागकन्याओं की नाईं सुन्दर स्त्रियों का स्पर्श करने और हीरे, मणि और भूषण और नाना प्रकार के वस्त्रों में वह बन्धवान् नहीं होता । जैसे चन्द्रमा सुन्दर और शीतल है परन्तु सूर्यमुखी कमलों को विकाश नहीं कर सकता तैसे ही सुन्दर स्पर्श ज्ञानी के चित्त को हर्षवान् नहीं करता । जैसे मरुस्थल में हंस प्रसन्न नहीं होता तैसे ज्ञानवान् स्पर्श से प्रसन्न नहीं होता और रसादिक में भी बन्धवान् नहीं होता । दूध, दही, घृतादिक रस, भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्य, यह चारों प्रकार के भोजन और कटु, तीक्ष्ण, मीठा, खारा आदि जितने रस हैं इनकी इच्छा ज्ञानवान् नहीं